Dozens of fishes held in a small pool on a fish farm

मत्स्य कृषि

मत्स्य कृषि मुख्य रूप से भोजन के लिए मछलियों और अन्य जानवरों (जैसे कि परुषकवची और उभयचर) को पैदा करने और मारने की क्रिया है | मत्स्य कृषि महत्वपूर्ण रूप से दशकों से बढ़ रही है | वर्ष 1970 से 2006 के मध्य यह उद्योग 6.9%1 प्रति वर्ष की दर से बढ़ा, और हाल के वर्षों में मनुष्यों द्वारा खाए गए जलीय जानवरों के उत्पादों के क़रीब आधा,पाली गई मछलियाँ रही हैं |2 ये मछलियाँ अन्य जानवरों को खिलाने के लिए भी उपयोग में लाई गईं: 2.5 मिलियन टन से अधिक मछलियों का उपयोग प्रति वर्ष बिल्लियों का भोजन उत्पादित करने हेतु किया गया |3

यह आकलन किया गया है कि हर वर्ष 37 से 120 बिलियन मछलियाँ मारी गई हैं,4 जिसमें वे संवेदनशील जानवर शामिल नहीं हैं जो जलीय खेतों में मारे गए हैं, या तो मनुष्यों के उपयोग के लिए पैदा होकर या अन्य जानवरों का भोजन बनकर | मत्स्य कृषि में पैदा किये गए परुषकवची आम तौर पर घोंघे को खिलाये जाते हैं जो पीसने की चक्कियों से गुज़रे हैं जो उनके कवच को तोड़ता है, साथ ही साथ बाकी मछलियों सहित मछली पकड़ने के सहउत्पादों को |

मत्स्य कृषि में मछलियों की कई प्रजातियाँ पैदा की गई हैं; हालांकि कुछ, अन्य के मुक़ाबले बड़ी मात्रा में पैदा की गई हैं | कार्प, तिल्प्यास, सैल्मन और कैटफ़िश सबसे अधिक प्रचलित हैं |5 परुषकवची के मामले में, इनकी कई प्रजातियाँ उनके छोटे आकर और मत्स्य कृषि में होने वाली बीमारियों से पीड़ा के कारण, कृषि में पैदा नहीं की जा सकतीं | वो जो भी कृषि में पैदा की गई हैं वे पसिफ़िक वाइट श्रिम्प और गैंट टाइगर प्रोन (पेनयास मोनोदों) हैं |

जो मत्स्य कृषि का बचाव करते हैं, वे कहते हैं कि यह मछली पकड़ने के कारण होने वाली मछलियों और अन्य जलीय जानवरों की कमी की समस्या को हल करेगा | यह बचाव मछलियों की पीड़ा सहने की क्षमता या उनकी जीवित रहने की रुचियों में नहीं गिना जाता है | यह जलीय जानवरों के शोषण का मनुष्यों के लिए लाभ को ध्यान में रखता है | मत्स्य कृषि का उद्देश्य कम से कम लागत पर उपभोग के लिए मछलियों और अन्य जानवरों के उत्पादन को प्राप्त करता है | यह शोषित जलीय जानवरों की रुचियों की उपेक्षा की ओर ले जाता है, परिणामतः असहज या दुखी जीवन और अक्सर समयपूर्व दर्दनाक मौतें |

मत्स्य कृषि में जानवरों को बिना नुकसान पहुंचाए रखना संभव नहीं है | मछलियों को मापने के लिए नियमित रूप से पानी से बाहर निकाला जाता है, उनके टैंक हानिकारक रसायनों द्वारा साफ़ किये जाते हैं, और शारीरिक निगरानी और आवास में गड़बड़ी द्वारा उनका जीवन आम तौर पर बुरा कर दिया जाता है | इसके अलावा, परिभाषा के अनुसार, उपभोग के लिए खेतों में जानवरों को पैदा करने का अर्थ है,वे आख़िरकार मार दिए जाते हैं |

मत्स्य कृषि में मछलियाँ प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (झीलों, नदियों, या सागरों) या मत्स्य कृषि टैंकों में पैदा की जा सकती हैं | जानवरों को पैदा करने के बताये गए तरीकों द्वारा,यहाँ तीन मुख्य प्रकार की मत्स्य कृषि है: व्यापक, अर्ध व्यापक और सघन |

व्यापक प्रणालियों में जानवर अपने पर्यावरण से भोजन ग्रहण करते हैं और उन्हें मनुष्यों द्वारा भोजन नहीं खिलाया जाता; मनुष्य केवल वातावरण को नियंत्रित करते हैं जहां जानवर रखे गए हैं | वातावरणीय विविधताओं में हेर फेर द्वारा जनसँख्या को काबू में किया गया है जैसे कि पोषक तत्त्व, प्रकाश और जल की स्थिति | मछलियाँ इस तरह से रखी जाती हैं जो उनके निकल जाने को रोकता है और आसानी से पकड़ लिए जाने योग्य बनाता है | इन मछलियों का पकड़ा जाना कभी-कभी ‘संग्रह’ या ‘कटाई’ के रूप में पेश किया जाता है, ये शब्द जिनका इस्तेमाल मृदु भाषी और अनुचित है जबकि वे आमतौर पर केवल असंवेदनशील वनस्पति के लिए इस्तेमाल हो रहा है |

अर्ध व्यापक प्रणालियों में मछलियाँ अर्ध नियंत्रित वातावरण में होती हैं | उनके भोजन का एक हिस्सा किसानों से आता है जबकि बाकी पर्यावरण से आता है | उनके वातावरण में अन्य विविधताएँ भी व्यवस्थित होती हैं जैसे कि पानी का संचार | यह मछलियों के व्यापक मत्स्य कृषि की सम्भावना की बजाय उच्च घनत्व में पैदा होने को संभावित करता है जिसके कारण होने वाली असहजता, बीमारी, और चोट हम नीचे देखेंगे |

अंत में,सघन खेतों में मछलियों की स्थिति, भोजन देना और पुनरुत्पादन पुर्णतः मनुष्य के नियंत्रण में होता है | सघन खेतों में मछली घनत्व अत्यधिक उच्च है |

मौजूदा मत्स्य खेतों के अलावा, उन जलीय प्रणालियों को जो इसके क़रीब या लगभग क़रीब हैं, बड़े व्यापक या अर्ध सघन खेतों के रूप में पानी के बड़े प्राकृतिक स्रोतों में बदलने हेतु अनुसन्धान जारी है |

परुषकवची कैसे पैदा होते हैं

परुषकवची अंडे का संचय कई बंदी वंश-वृद्धि तकनीकों द्वारा बढ़ाया जाता है जिनमें से एक विधि, जिसमें कैद की गई मादाओं को उष्मीय आघात में शामिल किया जाता है, जो उन्हें अंडे देने को बाध्य करता है |

ये जानवर सैकड़ों हज़ार अंडे दे सकते हैं, जो कम से कम एक दिन में अंडे से निकल सकते हैं | बंदी वंशवृद्धि तकनीक की अन्य विधि में लारवा का संचय होता है | अंडे की स्फुटनशाला में लारवा रखे जाते हैं जहां पानी का संचार नियंत्रण में हो | दो तीन हफ़्तों के बाद, वे लारवा के बाद के स्थिति में आ जाते हैं और नर्सरी कहलाने वाली, पानी के खुले संचार वाली बड़ी जगह पर लाये जाते हैं, जहां वे एक से डेढ़ महीने गुजारते हैं | जब लारवा के बाद की स्थिति में उनके वजन एक से दो ग्राम तक पहुँचता है तो वे बंदी दशा में अपने जीवन के मोटा होने के प्रारंभिक चरण में प्रवेश करते हैं,और उपभोग के लिए “मोटा करने वाले टैंकों” में भेज दिए जाते हैं | हालांकि जानवरों के पैदा करने और मोटा करने की विधियाँ अक्सर एक तरीके से लागू की जाती हैं, यहाँ कई विशेषज्ञ कम्पनियाँ बंदी पुनरुत्पादन के लिए कई तरीके उपयोग में लाती हैं (जिन्हें “नर्सरी फार्मिंग” के तौर पर जानते हैं) | फैटनिंग पोंड (मोटा करने वाले तालाब) अंतर्ज्वारीय क्षेत्र में हो सकते हैं, जालीयुक्त बाड़ों के साथ जो पानी के संचार को सुगम करे |

परुषकवची जलद्वार युक्त पानी के टैंकों में भी पैदा किये जा सकते हैं जो सागर, झील, या नदी से नये पानी को टैंक में आने दें | वे बाद में मोटे करने वाले तालाब में स्थानांतरित कर दिए जाते हैं | लारवा के बाद वाली स्थिति में कई झींगे इस प्रक्रिया के दौरान मर जाते हैं | मोटे किये जाने वाले तालाब में जीवित बचने वालों को कुछ महीनों के बाद जल द्वारा या तालाब को खाली कर पकड़ लिया जाता है |

मछलियाँ कैसे पैदा होती हैं

परुषकवची की तरह, मछलियाँ पैदा करने के यहाँ कई स्तर हैं | पहले, फ्राइज(शिशु मछलियाँ) आमतौर पर कैद में पैदा होती हैं, हालांकि वे पकड़ी भी जा सकती हैं | पुनरुत्पादक उम्र की युवा मछलियाँ भी पकड़ी जा सकती हैं, किन्तु वे भी अक्सर कैद में (तेजी से) पैदा की और बढाई जाती हैं | इल्स जैसी कुछ मछलियाँ हमेशा जंगल में रखी जाती हैं क्योंकि उन्हें कैद में पैदा करना संभव नहीं है |

मछलियों के पुनरुत्पादन करने के क्रम में उनका तनाव वाले वातावरण में रहना अनिवार्य है | पैदा किये जाने वाले जानवर बढ़ने (मोटे होने) वाले जानवरों की बजाय बहुत कम घनत्व वाले जानवरों के साथ टैंकों में रखे जाते हैं | उनके घेरे में कम से कम जगह होती है और कम से कम एक घन मीटर प्रति मछली हो सकती है | प्रजनन के लिए उपयोग में लायी जाने वाली मछलियां कभी-कभी उसके ख़ुद के हिसाब से पुनरुत्पादन हेतु छोड़ दी जाती हैं, किन्तु वे अक्सर अपने अंडे देने हेतु प्रेरित की जाती हैं |

अंडे देने के लिए प्रेरित करना कई प्रकार के होर्मोन्स से किया जा सकता है, जैसे कि गोनादोत्रोफिन या मनुष्य के कोरोनिक गोनादोत्रोफिन (जो कि महिला के मूत्र से लिया जा सकता है) का अन्तःक्षेपण |

कभी-कभी दिए गए अंडे आसानी से एकत्रित किये जा सकते हैं, क्योंकि निषेचित अंडे तैरते हैं जबकि अनिषेचित अंडे डूब जाते हैं | अन्य मामलों में, अण्डों का संग्रह एक सौम्य तरीके जिसे “अब्डोमिनल मसाज (उदरीय मालिश)” कहते हैं, से किया जाता है | सरल रूप में, मछली के उभरे हुये पेट को दबाया जाता है जब तक कि अंडे शरीर से बाहर ना आ जाएँ, एक विधि जो उनकी सेहत के लिए अत्यंत तनावपूर्ण और हानिकारक है | कुछ मामलों में, इस प्रक्रिया के लिए कृत्रिम नलिका इस्तेमाल में लाई जाती है | मादा के शरीर गुहा में डिम्ब ग्रंथि कीपों को खोलने के क्रम में उसके मूत्र जननांग खोलने के द्वारा नलिका डाली जाती है | फ़िर, अण्डों को नलिका में धकेलने के लिए पेट पर दबाया जाता है जिससे वे पात्र में गिरते हैं |6

अण्डों को संग्रहित करने के बाद, वे कई दिनों तक स्फुटनशालाओं में रखे जाते हैं जब तक कि अण्डों से लारवा, अण्डों से बाहर ना आ जाए | फ़िर लारवा, लारवा संचय में डाले जाते हैं जो सामान्यतः नये पानी की आपूर्तियुक्त छोटे बेलनाकार टैंक होते हैं | यह करने के प्रारंभिक कारण यह हैं कि यदि ऐसा ना करें तो बड़ी संख्या में लारवा मर जायेंगे | जितने अधिक लारवा जीवित होंगे, लाभ उतना अधिक |

ये जानवर एक बार लारवा से फ्राइज में विकसित होने और उनका वजन क़रीब एक या दो ग्राम हो जाने पर, वे या तो मोटे करने वाले बड़े टैंकों में, अन्य व्यापारिक मत्स्य पालन को बेचने हेतु भेज दिए जाते हैं, या बाद में बाहर निकालने हेतु जंगल में छोड़ दिये जाते हैं | प्रीफैटनिंग (मोटा होने) की प्रक्रिया का उद्देश्य एक प्रकार के भोजन के लिए मछली को आदी करना है जो उन्हें मोटा करने की प्रक्रिया के दौरान दिया जाता है और भीड़भरी स्थिति के लिए, जिसे सहने के लिए वे बाध्य होंगी | कुछ मामलों में, मछलियों को ताज़े पानी से खारे पानी में बदलने हेतु अनुकूल होना चाहिए |

मछली विकसित करने के सभी चरणों के दौरान, सामान्य पालने की प्रक्रिया भीड़ लाने से प्रभावित होती है जो उनके सामान्य विकास को नुक्सान पहुंचा सकने के रूप में बदल देता है |7

जब मछलियों को उनका आकार ले जाने के क़ाबिल बनाता है, ले जाने के दौरान कई मौतों के खतरे में, तो वे मोटा करने वाले टैंकों में भेज दी जाती हैं |8 मोटा करने वाले टैंकों में जानवर अक्सर भोजन के लिए होड़ लगाते हैं, इसलिए उन्हें नियमित और कम मात्रा में भोजन उपलब्ध कराना चाहिए ताकि मजबूत मछलियाँ पूरा ना खाएं और कमजोरों को भूखा ना छोड़े |

मछली कारख़ानों (उद्योगों) में जानवर कैसे पीड़ित होते हैं

मछली खेतों में मछलियों को कई तरह से नुकसान पहुंचता है | स्थलीय जानवरों के साथ, यहाँ तक कि यदि उनका जीवन अच्छा था, उन्हें तब भी असमय मृत्यु से नुकसान पहुँच सकता था, जो उन्हें भविष्य में संभावित सकारात्मक अनुभवों से वंचित करता है | लेकिन वे भी पीड़ित हैं क्योंकि उनका जीवन स्तर बुरा है | इसके कुछ कारण हैं:

संभालना और परिवहन

जानवरों को मछली कारख़ानों तक ले जाना उन पर बड़ा मानसिक तनाव डालता है जिससे उबरने में एक लम्बा समय लगता है |9 शारीरिक व्याकुलता (आवेश) तनाव के लक्षणों को सक्रिय करता है,10 और जानवरों को बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील बनता है |11 उदाहरण के लिए, यह प्रमाणित हो चुका है कि तनावग्रस्त मछलियाँ सफ़ेद धब्बे की बीमारी से ज्यादा पीड़ित होती हैं |12

जगह की कमी और भीड़ (सघन) की स्थितियां

मछली कारख़ानों में, आमतौर पर मछलियाँ छोटी जगहों में भीड़भरी होती हैं | यह नियोजित रूप से ट्रोड्स, सैल्मन,13 सीबास,14 सीब्र्राम15 या गिल्ट-हेड ब्रीम16 के मामले में होता है |17

मछली सकेन्द्रण और भोगी गई हानि के बीच संबंध आवश्यक रूप से रेखीय नहीं हैं | उदाहरण के लिए, सैल्मन के मामले में नकारात्मक प्रभाव केवल तभी देखे जा सकते हैं जब एक खास घनत्व पहुँच चुका हो, और फिर नकारात्मक प्रभावों में बढ़ोत्तरी, हो सकता है समानुपातिक बदलावों से अधिक हो, जब नई इकाइयाँ मिलाई जाती हैं |18 इसके अलावा, भीड़भाड़ के तनाव में, अन्य करक जैसे पानी की गुणवत्ता का कम होना उनके तनाव और असहजता को बढ़ाते हैं |19 भीड़ भरी परिस्थितियां ऑक्सीजन की उपलब्धता को भी प्रभावित करती हैं | मछलियाँ पानी में घुले हुये ऑक्सीजन पर निर्भर करती हैं, और जब ऑक्सीजन स्तर एक ख़ास स्तर से नीचे गिर जाता है, तो वे बड़े तनाव और स्वास्थ्य परेशानियों से पीड़ित हो सकती हैं | गंभीर मामलों में, वे एस्फीजियेसन से मर सकती हैं |

जगह में कमी का जो प्रभाव ख़ास मछलियों पर है वह उन जानवरों के लिए और भी बुरा है जो सामाजिक वर्गीकरण (अनुक्रम)20 बनाते हैं और राक्षसपन (नर भक्षण)21 सहित उग्र व्यवहार की ओर ले जा सकता है |22

प्रकाश से व्यवधान

कभी-कभी पानी के नीचे बत्तियों द्वारा किया गया कृत्रिम प्रकाश मछली को बढाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है |23 यह फ्राइज के सोने के समय में कटौती और खाने के लिए अधिक समय उपलब्ध कराकर, ख़ासतौर से स्फुटनशालाओं में किया जाता है | सल्मोनिड्स जैसी प्रजातियों में, यह जानवरों के वयस्क होने के समय को बदलता है, जिससे कि वे मारे जाने के वक़्त बड़े होते हैं | तेज बत्तियां उन्हें परेशान कर सकती हैं और यहाँ तक कि उनके भोजन चक्र को भी प्रभावित करती हैं, जब वे बत्तियों को नज़रंदाज़ करने की कोशिश करते हैं |24

सामान्य सैल्मन के मामले में प्रकाश परिवर्तन और उच्च तापमान दोनों ही कशेरुकी विकृतियों के मुख्य कारणों के रूप में पहचाने गये हैं |25

भूख

मछली कारख़ानों में भूख और कुपोषण जानवरों के विकास के कई चरणों में आ सकते हैं, जानवरों के बीच भोजन के लिए होड़ जैसे कारणों से | भूख के अलावा, यहाँ भोजन में कमी के अन्य तरीके जानवरों को हानि पहुंचाते हैं, उदाहरण के लिए, भोजन से वंचित रहने का अर्थ ट्रौट्स फिन26 में पृष्ठीय फिन क्षरण में एक वृद्धि भी है, जो तैरने में कठिनाई का कारण हो सकता है और जीवित रहने की संभावना को कम करता है | यह भी देखा गया है कि अटलांटिक सैल्मन ज्यादा धीरे तैरते हैं और ख़ुद को खिलाने के लिये कम प्रयास करते हैं जब उन्हें ठीक से खाना नहीं दिया जाता |27

खेती किये गए समुद्री जानवरों को स्वास्थ्य नुकसान

ऊपर दिखाई गई स्थिति जानवरों में तनाव का कारण होती है, जो आगामी नुकसान की ओर ले जाता है, जो उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है |28 लेकिन उनके स्वास्थ्य के खराब होने के यहाँ अन्य कारण हैं | जानवर अक्सर भीड़भाड़ के कारण घावों से पीड़ित होते हैं, जो उन्हें आसानी से संक्रमण की ओर ले जाता है | मछलियों के शरीर और उनके घरों, साथ ही साथ अन्य मछलियों के शरीर से क़रीबी संपर्क, उन्हें खरोंचें पहुंचाता है, जो कि यह भी आसानी से संक्रमित हो सकते हैं |

पानी में रासायनिक विभिन्नताएं, जो अति भीड़भाड़ के कारण आसानी से हो सकती हैं, जानवरों को बिमारी के प्रति ख़ासतौर से संवेदनशील कर सकता है जो उन्हें अन्य प्रकार से नहीं होता | कभी-कभी ये रोगग्रस्त मछलियाँ मारी जाती हैं |

इस बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारा पृष्ठ “मछली और परुषकवची की बीमारियाँ” देखें |

संक्रमण और बड़ी मात्रा में मौतें रोकने के लिए मछली खेतों में जानवरों को एंटीबायोटिक्स (प्रतिजैविक) दिया जाता है, उनमें से कईयों में प्रतिरोधक क्षमता घटने सहित इसके नकारात्मक प्रभाव हैं |29 कुछ प्रतिजैविक तनाव बढ़ाते हैं |30 यह ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है कि बीमारियाँ और प्रतिजैविक दोनों ना केवल मछली खेतों में रखे जानवरों को प्रभावित करते हैं बल्कि आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले अन्य जंगली जानवरों को भी |31

मत्स्य खेतों पर मृत्यु

सभी कारणों की वजह से जो हमने ऊपर देखा है, कारखाने के पहले की मृत्यु दर मछली खेतों में बहुत ऊँची है |32 लेकिन ज़ाहिर है वे सभी या तो बीमारी से या मनुष्य के हाथों समय पूर्व मौत के रूप में मरते हैं | मछलियाँ और अन्य संवेदनशील जलीय जानवर विभिन्न दर्दनाक तरीकों से मारे जाते हैं, कई मामलों में वे पूरी तरह चेतना (होश) में होते हैं | उनकी पीड़ा उनकी मौत से पहले शुरू होती है, जबकि वे आमतौर पर दर्द और तनाव में होते हैं, जब उन्हें मारे जाने वाली जगह ले जाया जाता है |33 इसके अलावा, उनकी मौतों से पहले वे अक्सर भूखे रहते हैं | उनके शरीर में और मांस बनाने के लिए भोजन को पचने और मिल जाने में समय लगता है, और उनकी मौत के ठीक पहले जानवरों को दिया गया कोई भी भोजन नये मांस (वसा) में नहीं बदलेगा | यह अक्सर माना जाता है कि जानवरों को खिलाये जाने वाले भोजन जो नया मांस (वसा) नहीं बनाते वो बर्बादी है, इसलिए उन्हें नहीं खिलाया जाता और क़त्ल किये जाने के पहले वे भूखे रहते हैं |34

मत्स्य कृषि में जानवरों के भरण (खिलाने) हेतु अन्य जानवरों की हत्या

यह ध्यान देना भी ज़रूरी है कि अन्य जानवर (मुख्य रूप से परुषकवची और मछलियाँ) जलीय खेतों में पाले गए जानवरों के भरण (खिलाने) के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं | इस तरह ये जानवर भी मछलियों और अन्य जलीय जानवरों के मानवीय उपभोग का शिकार हैं | इसके अलावा मत्स्य खेतों में अन्य मछलियों के शरीर से अन्य जानवरों का भरण (खिलाना), खेतों में रखी या पाली गई मछलियों से प्राप्त मछली वसा उत्पादन का आधे से अधिक सैल्मन के भरण में इस्तेमाल होता है |


आगे की पढ़ाई

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टिप्पणियाँ

1 Bostock, J.; McAndrew, B.; Richards, R.; Jauncey, K.; Telfer, T.; Lorenzen, K.; Little, D.; Ross, L.; Handisyde, N.; Gatward, I. & Corner, R. (2010) “Aquaculture: Global status and trends”, Philosophical Transactions of The Royal Society B: Biological Sciences, 365, pp. 2897-2912.

2 हाल के वर्षों में मत्स्य कृषि के महत्व पर एक अध्ययन यह बताता है: “वर्ष 2007 में (मछली, क्रस्टे सियन और मोलस्कस, लेकिन स्तनधारियों, सरीसृप और जलीय पौधों को छोड़कर) मनुष्य उपभोग के लिए भोजन रूप में जलीय जानवरों का 43 प्रतिशत मत्सय कृषि ने योगदान दिया। और भविष्य की मांग को पूरा करने के लिए इसका बढ़ना अपेक्षित है।“ Ibid.

3 Silva, S. S. de & Turchini, G. M. (2008) “Towards understanding the impacts of the pet food industry on world fish and seafood supplies”, Journal of Agricultural and Environmental Ethics, 21, pp. 459-467.

4 Mood, A. & Brooke, P. (2012) “Estimating the number of farmed fish killed in global aquaculture each year”, fishcount.org.uk [अभिगमन तिथि 18 जनवरी 2013].

5 Food and Agriculture Organization of the United Nations (2011) Fisheries and aquaculture statistics: Aquaculture production, [Rome]: Food and Agriculture Organization of the United Nations [अभिगमन तिथि 11 जनवरी 2013].

6 Szczepkowski, M. & Kolma, R. (2011) “A simple method for collecting sturgeon eggs using a catheter”, Archives of Polish Fisheries, 19, pp. 123-128.

7 Moreau, D. T. R. & Fleming, I. A. (2011) “Enhanced growth reduces precocial male maturation in Atlantic salmon”, Functional Ecology, 26, pp. 399-405.

8 परिवहन के लिए एक स्वीकार्य आकार प्रजातियों और वजन के अनुरूप बदलता है। उदाहरण के लिए, इल्स जब 5 ग्राम की होती है तब भेजी जाती हैं, जबकि बासेस और टर्नोपस के मामले में परिवहन के समय यह 40 ग्राम तक हो सकता है। सलमोनिड्स के मामले में, उनका वजन वर्ष के परिवहन करने के समय के हिसाब से महत्वपूर्ण रूप से बदलता है, बसंत में 15-20 ग्राम से 100 ग्राम तक गिरने तक। कुछ प्रजातियों के लिए, जैसे कि ट्राउत्स, यदि उन्हें शीत ऋतु में मोटा करने वाले टैंकों से निकाला जाए, तो वे तब तक 200 ग्राम तक वजनी हो सकते हैं।

9 Bandeen, J. & Leatherland, J. F. (1997) “Transportation and handling stress of white suckers raised in cages”, Aquaculture International, 5, pp. 385-396. Iversen, M.; Finstad, B. & Nilssen, K. J. (1998) “Recovery from loading and transport stress in Atlantic salmon (Salmo salar L.) smolts”, Aquaculture, 168, pp. 387-394. Rouger, Y.; Aubin, J.; Breton, B.; Fauconneau, B.; Fostier, A.; Le Bail, P.; Loir, M.; Prunet, P. & Maisse, G. (1998) “Response of rainbow trout (Oncorhynchus mykiss) to transport stress”, Bulletin Francais de la Peche et de la Pisciculture, 350-351, pp. 511-519. Barton, B. A. (2000a) “Salmonid fishes differ in their cortisol and glucose responses to handling and transport stress”, North American Journal of Aquaculture, 62, pp. 12-18. Sandodden, R.; Findstad, B. & Iversen, M. (2001) “Transport stress in Atlantic salmon (Salmo salar L.): Anaesthesia and recovery”, Aquaculture Research, 32, pp. 87-90. Chandroo, K. P.; Cooke, S. J.; McKinley, R. S. & Moccia, R. D. (2005) “Use of electromyogram telemetry to assess the behavioural and energetic responses of rainbow trout, Oncorhynchus mykiss (Walbaum) to transportation stress”, Aquaculture Research, 36, pp. 1226-1238.

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14 Vazzana, M.; Cammarata, M.; Cooper, E. L. & Parrinello, N. (2002) “Confinement stress in seabass (Dicentrarchus labrax) depresses peritoneal leukocyte cytotoxicity”, Aquaculture, 210, pp. 231-243.

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21 Greaves, K. & Tuene, S. (2001) “The form and context of aggressive behaviour in farmed Atlantic halibut (Hippoglossus hippoglossus L.)”, Aquaculture, 193, pp. 139-147.

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24 प्रयोग पूर्ण अनुसंधान ने दर्शाया है कि कई मछलियां तेज़ रोशनी से दूर रहती हैंहैं। उदाहरण के लिए, अटलांटिक सेल्मन पानी की सतह पर तेज़ रोशनी को नज़रंदाज़ करती हैं, जब तक कि उन्हें भोजन खाने के लिए रुकने की ज़रूरत ना पड़े। देखे Fernö, A.; Huse, I.; Juell, J. E. & Bjordal, A. (1995) “Vertical distribution of Atlantic salmon (Salmo salar L.) in net pens: Trade-off between surface light avoidance and food attraction”, Aquaculture, 132, pp. 285-296; Juell, J. E.; Oppedal, F.; Boxaspen, K. & Taranger, G. L. (2003) “Submerged light increases swimming depth and reduces fish density of Atlantic salmon Salmo salar L. in production cages”, Aquaculture Research, 34, pp. 469-477.

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26 Winfree, R. A.; Kindschi, G. A. & Shaw, H. T. (1998) “Elevated water temperature, crowding and food deprivation accelerate fin erosion in juvenile steelhead”, Progressive Fish-Culturist, 60, pp. 192-199 [अभिगमन तिथि 6 मई 2017].

27 Andrew, J. E.; Noble, C.; Kadri, S.; Jewell, H. & Huntingford, F. A. (2002) “The effects of demand feeding on swimming speed and feeding responses in Atlantic salmon Salmo salar L., gilthead sea bream Sparus aurata L. and European sea bass Dicentrarchus labrax L. in sea cages”, Aquaculture Research, 33, pp. 501-507.

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32 मत्स्य खेतों में मछलियों, साथ ही साथ रखे गए अन्य जानवरों में ऐसा होने के लिए जो अन्य कारक हैं, वे r-strategists हैं जिसमें आनुवांशिक लक्षण आसानी से नहीं पहचाने जा सकते और वे मनुष्यों द्वारा चुने होते हैं जो अभिलाक्षणिक रूप से k-strategists अधिक हैं। यह उन्हें चुनना और कठिन बनाता है कि कौन ख़ास स्थितियों में प्रतिरोध कर सकते हैं, और उनके कारण मरने की प्रायिकता को ऊंचा करते हैं।

33 Erikson, U.; Sigholt, T. & Seland, A. (1997) “Handling stress and water quality during live transportation and slaughter of Atlantic salmon (Salmo salar)”, Aquaculture, 149, pp. 243-252. Iversen, M.; Finstad, B.; McKinley, R. S.; Eliassen, R. A.; Carlsen, K. T. & Evjen, T. (2005) “Stress responses in Atlantic salmon (Salmo salar L.) smolts during commercial well boat transports, and effects on survival after transfer to sea”, Aquaculture, 243, pp. 373-382. Alanara, A. & Brannas, E. (1996) “Dominance in demand-feeding behaviour in Arctic charr and rainbow trout: The effect of stocking density”, Journal of Fish Biology, 48, pp. 242-254.

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