जंगली जानवरों की पीड़ा पर वीडियो पाठ्यक्रम – पाट 3

जंगली जानवरों की पीड़ा पर वीडियो पाठ्यक्रम – पाट 3

 



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बीमारियाँ और परजीविता

प्रकृति में बीमारियाँ

अब हम जानवरों की दुर्दशा और समय पूर्व मृत्यु के अन्य महत्वपूर्ण कारकों की ओर ध्यान देंगे, जो कि बीमारी है| यह ध्यान देने के लिए कि बीमारी कैसे जानवरों के लिए हानिकारक हो सकती है, उस अत्यधिक पीड़ा के बारे में सोचिये जो आधुनिक औषधि के आगमन से पहले बीमारी के कारण मनुष्यों को हुई| सहज ही, यह स्थिति जंगल में जानवरों की है| उपचार की पहुँच में कमी और, कभी-कभी आराम और स्वस्थ होने के अवसर में कमी के कारण बीमारियों की वजह से होने वाली हानियाँ बदतर हैं| कार्य करने और स्वस्थ होने की शरीर की क्षमता पर उनके कमज़ोर करने वाले प्रभावों के अलावा, ये जंगली जानवरों द्वारा सामना करने वाले बुखार और बीमारियाँ पर्यावरणीय परिस्थितियों और अन्य तनावकारकों के नकारात्मक प्रभावों को बाधा सकते हैं| परिणाम पीड़ा में बढ़ोतरी और मृत्यु हो सकते हैं|1

प्रकृति में अमानुष जानवरों को प्रभावित करने वाली यहाँ कई बीमारियाँ हैं जो यहाँ सारी सूचीबद्ध नहीं की जा सकती| इनमें से कुछ बीमारियाँ जिससे मनुष्य भी पीड़ित हो सकते हैं जैसे कि फ्लू, प्नुमोनिया, ट्यूबरक्लोसिस, कॉलरा, इबोला, अन्थ्रोक्स, साल्मोनेला, डिप्थेरिया, और रेबीज़ हैं|2 कैंसर भी स्थलीय और जलीय दोनों जानवरों में सामान्य है| व्हेल की कुछ आबादी मनुष्यों की सामान दर से कैंसर से पीड़ित होती है|3 अन्य सामान्य बीमारियाँ जो जंगल में रहने वाले जानवरों को संक्रमित कर सकती हैं वे डिस्टेंपर, क्रोनिक वेस्टिंग डिजीज, अफ्रीकन स्वाइन बुखार, वर्म्स और विभिन्न फफुन्दीय संक्रमण हैं|4

अकशेरुकियों में बीमारियाँ

बहुत से लोग अकशेरुकी कैसे पीड़ित हो सकते हैं इस बारे में ज्यादा नहीं सोचते हैं, किन्तु वे अन्य जानवरों की भांति ही जीवाणुकारक, वायरल और फफुन्दीय संक्रमणों से संपर्क में आते हैं| कुछ बहुत विशेष होते हैं उन जानवरों के प्रति जिन्हें वे संक्रमित करते हैं और कशेरुकियों में नहीं फैलते, किन्तु वे टीकों, प्रतिजैविक, और एंटीफंगल से सामान रूप से उपचारित किये जा सकते हैं|5 यहाँ जमीन पर रहने वाले और जलीय अकशेरुकियों में पाई गई कुछ सामान्य बीमारियाँ हैं|

ग्रेटर येलोस्टोन क्षेत्र में रहने वाले जंगली एल्क और बायसन की जनसँख्या के बीच ब्रुसेलोसिस प्रचलित है| यह आकलन किया गया है कि इस क्षेत्र में 14 हज़ार से ज़्यादा जानवर संक्रमित हैं|6 जबकि ब्रुसेलोसिस प्रजातियों के बीच फ़ैल सकती है, येलोस्टोन के ये जानवर बीमारी के लिए “कोश” की तरह कार्य करते हैं| इससे लड़ने के लिए, येलोस्टोन में बायसन की जनसँख्या के लिए एक टीका विकसित किया गया है|

तितलियों में ब्लैक डेथ

एक मुख्य बीमारी जो तितलियों को संक्रमित करती है न्यूक्लीयर पोलीहेड्रोसिस विषाणु, या ब्लैक डेथ है| इसे यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि इससे संक्रमित होने वाले शिथिल हो जाते हैं और उनके शरीर का क्षरण होना शुरू हो जाता है काला पड़ने लगता है| उनके आतंरिक हिस्से फिर तरलित होते हैं और उनके क्षरित होते शरीर से बाहर निकलते हैं| आमतौर पर विषाणु इल्ली के चरण में आक्रमण करता है| यह बड़ी मात्र में इल्ली को तनाव पहुंचाता है, जो खाने को नकार देगी और हो सकता है भोजन को बहा दे| विषाणु इल्ली को मारने के लिए तीन दिन तक का समय ले सकता है| तरलीकृत शरीर की संक्रमित बूँदें आसानी से पत्तियों पर फैलती है और आगे परजीवियों द्वारा फैलती है, उन पत्तियों को खाने वाली इल्लियों को संक्रमित करते हुए|7

क्रिकेट पक्षाघात विषाणु

क्रिकेट को पीड़ा देना वाली बड़े पैमाने पर फैलने वाली बीमारी क्रिकेट पैरालिसिस वायरस के नाम से जानी जाती है| संक्रमित क्रिकेट कुपोषित हो जाते हैं, कूदने में कठिनाई, संतुलन खोना, और फिर उनके पैर लंगड़े हो जाते हैं और वे अपने पीछे की और गिर जाते हैं, जहाँ वे मरने से कुछ दिन पहले तक पड़े रहते हैं| यह अन्य कीटों को भी संक्रमित कर सकते हैं, और समान नस्लें मधुमक्खियों और मक्खियों को भी संक्रमित करती हैं|8

लॉबस्टर कवच बीमारी

लॉबस्टर शेल डिजीज के नाम से जानी जाने वाली एक सामान्य बीमारी के संपर्क में आ सकते हैं| स्वस्थ लॉबस्टर में एक चिकनाई युक्त सुरक्षात्मक परत होती है जो उन्हें जीवाणु द्वारा घिसे जाने से बचाती है| शेल डिजीज के साथ, यह बाधा हटती है, शेल को घिसना सुलभ करती है| बीमारी अपने आप में हमेशा घातक नहीं है, किन्तु यह लॉबस्टर के लिए तनाव (संकट) और कमज़ोरी का कारक होती है जो अन्य हानियों जैसे घाव और शिकार के प्रति उनकी लाचारी को बढ़ाता है|9

कशेरुकियों में बीमारियाँ और संक्रमण

कशेरुकियों को प्रभावित करने वाली बीमारियों के बारे में अधिकतर ज्ञात हैं| कशेरुकी बीमारियाँ अध्ययन के प्रति आसान हैं क्योंकि कई कशेरुकी बीमारियाँ, मनुष्यों और घरेलू जानवरों सहित अनेक कशेरुकियों के बीच फैलने योग्य रूप में ज्ञात हैं| नीचे दी गई बीमारियाँ कशेरुकियों में होने वाली सामान्य बीमारियों के उदाहरण हैं|

पक्षियों में हैज़ा

एवियन हैज़ा उष्ण और आर्कटिक मौसम दोनों में रहने वाले पक्षियों में एक सामान्य जीवाणु बीमारी है| कई पक्षियों में यह बीमारी होती है, किन्तु यह तभी सक्रिय होती है जब पक्षी शारीरिक या मानसिक रूप से तनावग्रस्त होते हैं| अत्यधिक ठंडा मौसम या उच्च जल स्तर पक्षियों को उनके घर छोड़ कर उष्ण क्षेत्रों में जाने पर बाध्य करता है, सामान्य तनावकारक हैं जो संक्रमित पक्षियों में बीमारी ला सकता है| इसके कारण वजन में कमी, बलगम आना, दस्त, और सांस फूलने की परेशानी होती है| यह तुरंत ही निमोनिया की ओर ले जाता है| यह लीवर, स्प्लीन, और त्वचा पर आक्रमण कर सकता है और ज्वलन के कारण गठिया का कारक हो सकता है| एवियन हैज़ा बहुत अधिक मृत्यु दर का कारक हो सकता है, खासतौर से तब जब यह पहले कॉलोनी के अंतर्गत फैलता है| यह सीधे संपर्क, और दूषित जल या मिटटी के अंतर्ग्रहण द्वारा फैलता है|10

डिस्टेंपर

डिस्टेंपर मीसल्स से सम्बंधित एक संक्रामक बीमारी है जो स्तनधारियों के जठरांत्र, श्वसन और तंत्रिका तंत्र पर आक्रमण करता है| यह आमतौर पर कुत्तों से सम्बंधित है किन्तु रेकुन, लोमड़ी, जंगली बिल्ली, हिरन, बन्दर, और सील सहित जंगल में कई जानवरों को भी प्रभावित करते हैं| संक्रामिट जानवर समान व्यव्हार प्रदर्शित कर सकते हैं जो लार टपकाना, गोल घूमना, चबाना, पर्यावरण के प्रति ग़ैर ज़िम्मेदारी, मनुष्यों के प्रति डर में कमी सहित अन्य व्यव्हार जो रबीज़ के कारण होते हैं| यह बुखार, उलटी, ऐंठन, और पक्षाघात का कारण हो सकता है| वे जो बच जाते हैं उनका तंत्रिका तंत्र स्थायी रूप से ख़राब हो सकता है|11

उभयचर, सरीसृप और मछलियों में त्वचा रोग

उभयचर प्राणी घटक त्वचा रोगों के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं, जैसे फफुन्दीय संक्रमण और रनावायरस| रिकॉर्ड में जलीय फफुन्दीय संक्रमण साइट्रीडीयोमिकोसिस प्राणघातक रोगजनकों में से एक है| यह नम मौसम में मेंढकों, सालामैंडर और अन्य उभयचर प्राणियों को पीड़ा देते हैं| फफूंद एक जानवर की त्वचा द्वारा खाती है, चयापचय परिवर्तनों का कारण होती है, और अंततः हृदयाघात उतपन्न कर जानवर को मार देती है| त्वचा के अलावा, कई आतंरिक अंगों और मांसपेशियों में घाव विकसित होते हैं| यह नियमित रूप से प्रतिरक्षित उभयचरों से उनमें फैलता है जो कमज़ोर हैं|12

रोगपूर्ण व्यवहार

बीमारी कई लोगों की समझ से कहीं अधिक प्रकृति में फैलती है| इसके जंगल में रहने वाले जानवरों को प्रभावित करने के लक्षणों को लोगों द्वारा ना पहचान पाने के कई कारणों में से एक यह है कि जानवरों ने बीमारी की पहचान छुपाने के तरीके विकसित कर लिए हैं| जो जानवर कमज़ोर और लाचार दिखते हैं वे शिकारियों के प्रमुख लक्ष्य हैं| इसके अलावा, जो समूहों में रहते हैं वे सामाजिक स्तर खो सकते हैं या परित्यक्त हो सकते हैं और जब वे कम से कम सक्षम होते हैं तो उनसे दूर छोड़ दिए जाते हैं|

वैकल्पिक रूप से, कभी-कभी जानवर चुने हुए रूप में बीमारी के लक्षण प्रदर्शित करते हैं, जैसे कि सुस्ती और निद्रता| यह तब होता है जब बीमारी के लक्षण खुद बीमारी के कारक नहीं होते हैं, बल्कि बीमारी से लड़ने में ऊर्जा खर्च करने से होता हैं| वर्ष के समय और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करते हुए, बीमारी की पहचान प्रदर्शित करना पुनरुत्पादन की क्षमता को कम कर सकती है या मूल्यवान क्षेत्र को बचाना असंभव करती है| बच्चे पैदा करने के मौसम से इतर एक जानवर आराम करने और ठीक होने में अधिक समय ले सकता है, बजाय कि अपने क्षेत्र का बचाव करने के| बच्चे पैदा करने के मौसम के दौरान, वे अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल पुनरुत्पादन करने और अपने घोंसलों या मांद की सुरक्षा करने में कर सकते हैं बजाय कि रोग निवृत्ति पर |13

इस प्रकार, एक जानवर बड़े पैमाने पर एक बीमारी या रोग से पीड़ित हो सकता है जिसकी पहचान हम बिना चिकित्सकीय जांच किये नहीं कर सकते| जैसे जंगल में बीमारियों द्वारा जानवर कैसे प्रभावित होते हैं इसके लिए और अनुसन्धान जारी है, इस क्षेत्र में हमारा ज्ञान बढ़ना जारी है|14 इसी बीच में, इस बात का कोई महत्व नहीं है कि यहाँ कुछ जानवरों में पहचाने जा सकने वाले व्यावहारिक लक्षण हैं जो सुस्ती, भूख में कमी, ठीक दिखने में कमी सहित बुखार का अनुभव कर रहे हैं, हालाँकि जैसा मैंने पहले बताया है, हो सकता है जानवर ये व्यव्हार प्रदर्शित ना करना चुनें यदि इसका नुकसान काफी अधिक हो|15 मनुष्य अस्पताल में बड़े जानवरों के निरीक्षण या शव परीक्षा करने द्वारा भी बहुत कुछ सीख सकते हैं, और यहाँ जंगल में बीमारियों के ग़ैर आक्रामक पहचान का पता लगाने के बढ़ते संवेदनशील तरीके हैं|

कुछ जानवरों का अवलोकन करना बहुत ही मुश्किल है, जैसे कि छोटे जानवर जो अपने जीवन का अधिकतर समय जमीन के अंदर बिताते हैं और बहुत अधिक संख्या में छोटे कशेरुकी होते हैं| जलीय जानवर भी अध्ययन के लिए कठिन हो सकते हैं क्योंकि उनकी अधिक संख्या के कारण और इसलिए भी क्योंकि उनका ग़ैर आक्रामक तरीके से अध्ययन करना ज्यादा मुश्किल है| परिणामस्वरूप, जंगल में बीमारियों द्वारा होने वाली पीड़ा की मात्रा कई लोगों की कल्पना से कहीं अधिक है|

इसके अलावा, जानवरों के स्वास्थ्य को अक्सर होने वाला एक अन्य घातक ख़तरा है जो कभी-कभी बीमारी द्वारा छुप जाता है| यह परजीविता है|

परजीविता और परजीवीवाद

जानवरों और पौधों की सारी प्रजातियों में से लगभग आधी उनके जीवन चक्र के कुछ चरणों में परजैविक होते हैं, और कुछ, यदि कोई, प्रजातियाँ किसी भी परजीवी द्वारा पीड़ित नहीं हैं| बहुत से परजीवी सूक्ष्मजीवी रोगजनक हैं जो अपने पोषिताओं को बीमारियों द्वारा हानि पहुंचा सकते हैं| अन्य बड़े प्राणी हैं, जानवरों सहित|

कुछ परजीवी जानवरों को कम नुकसान पहुंचाते हैं| कुछ हालाँकि उन्हें दर्द और कमज़ोरी देते हैं| परजीव्याभ अंततः रोगग्रस्त किये जानवरों को मार देते हैं|

परजीवी के क्रियाकलाप थकान के कारक हो सकते हैं, पोषिता के लिए भोजन की खोज और शिकारियों से बचना मुश्किल करते हुए| कुछ परजीवी अपने पोषिताओं उनके अन्य तंत्र को छोड़ते हुए उन्हें नपुंसक कर देते हैं जिससे पोषिता जीवित रह सके, उनकी ऊर्जा को बदलते हुए जो पुनरुत्पादन में जानी थी वह परजीवी को पाले रखने में जाती है|

कुछ परजीवी अपने पोषिताओं में व्यावहारिक परिवर्तनों के कारक होते हैं (खासतौर से मध्यवर्ती पोषिता) जो उन्हें शिकारियों (अंतिम पोषिता) के प्रति और अतिसंवेदनशील बनाता है|16 मध्यवर्ती पोषिता वातावरण उपलब्ध कराते हैं अल्पविकसित परजीवियों के विकास और बढ़ने के लिए और अंतिम पोषिता जहाँ यौन रूप से विकसित परजीवी पुनरुत्पादन करते हैं|

उदाहरण के लिए, एक परजैविक फ्लूक है जो इसके अंतिम पोषिता में पुनरुत्पादन करता है, जो चराई कर जुगाली करने वाले होते हैं जैसे गाय, और इसके अंडे पोषिताओं के मल में उत्सर्जित होते हैं| पहले मध्यवर्ती पोषिता सामान्य घोंघे हैं, जो मल खाते हैं और लार्वा परजीवियों द्वारा पीड़ित हो जाते हैं| एक पीड़ित घोंघा परजीवियों के आसपास सिस्ट बनाते हैं, जिसे फिर वह उगलता है| ये सिस्ट द्वितीयक मध्यवर्ती पोषिता एक चींटी द्वारा खाए जाते हैं| परजीवी चींटी के व्यवहार को नियंत्रित करने में सक्षम है, उसे घास के पत्ते के शीर्ष पर चढ़ने के लिए बाध्य करते हुए जहाँ वह चरने वाले जानवरों द्वारा खा लिया जायेगा, जहाँ अब विकसित परजीवी पुनरुत्पादन कर सकते हैं|

कुछ परजीवी परात्परजीवी कहलाते हैं क्योंकि वे अन्य परजीवियों को खाते हैं| वे सुपर परजीवी द्वारा दुविधा में नहीं आते, जो एक अकेले पोषिता (जैसे की वास्प जिनके लार्वा इल्लियों के परजीवी होते हैं) में बड़ी संख्या में रहते हैं|17 नीचे जंगली जानवरों के बीच प्रचलित परजीवियों के कुछ उदाहरण हैं|

सर्कोप्टिक मेंज

सर्कोप्टिक मेंज बिलों में रहने वाले परजीवी घुन के कारण होने वाला एक त्वचा रोग है| इसका संक्रमण घुन को एक एलर्जिक प्रतिक्रिया देता है, परिणामस्वरूप बहुत खुजली और चबाना होता है| यह कुत्तों, बिल्लियों, कोयोटेस, भालू, और वोम्बैट सहित अमानुष स्तनधारियों की कई प्रजातियों को प्रभावित करता है| वोम्बैट खासतौर पर मेंज द्वारा प्रभावित होते हैं| यह माना गया है कि वोम्बैट में बिल जैसा होने की स्थिति के कारण यह खासतौर से सर्कोप्टिक घुनों के रहने और संचरण के लिए आसान है| पीड़ित वोम्बैट खुनी घाव, बाल झड़ना, उनको त्वचा पपड़ीयुक्त और संक्रमित हो जाती है, और उनकी आँखों और कान के ऊपर पपड़ी जम जाती है| यह बीमारी अंधेपन और बहरेपन का कारण हो सकती है| गंभीर मामलों में, यह धीमी और सुस्त मौत की और ले जा सकती है|

पक्षियों में परजीवी संक्रमण

त्रिकोमोनोसिस

जंगली पक्षी सामान्यतः परजीवियों द्वारा होने वाली एक बीमारी त्रिकोमोनोसिस से पीड़ित होते हैं| यह कमज़ोर करने वाली और कभी-कभी जानलेवा बीमारी हो सकती है जो आमतौर पर पक्षियों के मुंह, एसोफेगस, पंख, और ग्लानडूलर पेट के साथ ही साथ अन्य अंगों जैसे लीवर को प्रभावित करते हैं|

नीचे दिया गया वीडियो पक्षियों में चोंच ख़राब होना, निगलने में कठिनाई, उनींदापन, और असगता सहित बीमारियों के लक्षणों को दिखाता है|

पक्षियों में बड़े पैमाने पर पाया गया अन्य परजीवी ट्रकल इल्ली है| ये त्रेका और ब्रोंची को रोकते हैं, जिससे बड़ी श्वसन तकलीफ़ होती है| प्रतिक्रियास्वरूप, परजीवी से छूटने के प्रयास में पीड़ित पक्षी आमतौर पर खांसते, छींकते, और अपने सिर को हिलाते हैं| परिणामतः, वे वजन खो सकते हैं, एनीमिया प्रदर्शित करना, और अक्सर भूख से मर सकते हैं| एक समान दुर्बलकारी इल्ली ह्रदय इल्ली है, जो हंसों और गीस में पाई गई हैं|

सरीसृप और उभयचर में सामान्य परजीवी

प्रोटोज़ोवा संक्रमण

हैमोप्रोटीस, खून चूसने वाले कीड़े द्वारा संचरित होने वाला एक प्रोटोज़ोआ परजीवी है, रेंगनेवाले और उभयचरों की कई प्रजातियों में पाया गया है, मुख्या रूप से कछुओं और कच्छपों में| इसके दुर्बलकारी प्रभाव कन्कालीय पेशियों और अन्य अंगों जैसे लीवर पर हैं| एक प्रोटोज़ोआ परजीवी संक्रमण कोलोटिस, लीवर और अन्य अंगों के फोड़े, और कभी-कभी मृत्यु का कारक होता है| स्पिरोचिद त्रेमातोड़ कछुओं और घोंघों को संक्रमित करता है, मुख्या आर्ट्रीस और ह्रदय को संक्रमित करते हुए| अन्य प्रोटोज़ोआ संक्रमण कई रेंगनेवाले जानवरों, मुख्य रूप से सांप, छिपकली में पाए गए हैं, उलटी, दस्त, वजन में कमी और गैस्ट्रिक झिल्ली के बड़ा होने का कारण होते हुए|18

अकशेरुकियों में परजीविता

इक्नेमोनिडा और ब्राकोनिडा कीट

अकशेरुकियों के बीच ज्ञात परजीविता का बेहतर उदाहरण नयूमोनिडा और ब्राकोनीडा वास्प है| ये जानवर अपने अंडे अन्य कीड़ों के शरीर में देते हैं, जैसे की इल्ली और चींटी| इन वास्प में से कुछ परात्परजीवी हैं, जो अपने अंडे अन्य परजीवी वास्प के शरीर में देते हैं| जब अंडे फूटते हैं, तो लार्वा अपने पोषिता को जीवित खाने लगते हैं पोषिता के महत्वपूर्ण अंगों को अंत में निष्क्रीय करते हुए| पोषिता के खाने योग्य ग़ैर महत्वपूर्ण अंगों को खा चुकने के बाद अंततः पोषिता मार दिया जाता है, शायद बहुत दर्द सहने के बाद |19


 

टिप्पणियाँ

1 बेल्डोमेनीको, पी. एम.; टेल्फ़र, एस.; गेबरट, एस.; लुकोम्स्की, एल.; बेनेट, एम. और बेगन, एम. (2008) “कमज़ोर स्थिति और संक्रमण: प्राकृतिक आबादी में एक दुष्चक्र”, प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन बी: बायोलॉजिकल साइंसेज़, 275, पृ. 1753-1759 [18 नवम्बर 2019 को देखा गया]।

2 सिम्पसन, वी. आर. (2002) “यूके में संक्रामक रोगों के जलाशय के रूप में जंगली जानवर”, द वेटरनरी जर्नल, 163, पृ. 128-146; गोर्टाज़ार, सी.; फेरोग्लियो, ई.; होफ़्ले, यू.; वोबेसर, जी. ए. (2005) एसेंशियल्स ऑफ़ डिज़ीज़ इन वाइल्ड एनिमल्स, न्यूयॉर्क: जॉन वाइली एंड सन्स; फ्रॉलीच, के. और विसेंटे, जे. (2007) “वन्यजीव और पशुधन के बीच साझा रोग: एक यूरोपीय दृष्टिकोण”, यूरोपियन जर्नल ऑफ़ वाइल्ड रिसर्च, 53, पृ. 241-256; विलियम्स, ई. एस. और बार्कर, आई. के. (सम्पा.) (2008 [2001]) इन्फ़ेक्शियस डिज़ीज़ेज़ ऑफ़ वाइल्ड मैमल्स, तीसरा संस्करण, न्यूयॉर्क: जॉन वाइली एंड सन्स; मार्टिन, सी.; पास्टोरेट, पी. पी.; ब्रॉशियर, बी.; हम्बलेट, एम. एफ. और सैगर्मन, सी. (2011) “यूरोप में जंगली और घरेलू खुरदारों के बीच संक्रामक रोगों/संक्रमणों के प्रसार का सर्वेक्षण”, वेटरनरी रिसर्च, 42 (1) [22 नवम्बर 2019 को देखा गया]; वाशिंगटन स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ (2019) “पशु-प्रसारित रोग”, इलनेस एंड डिज़ीज़, वाशिंगटन स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ [26 जून 2019 को देखा गया]।

3 मार्टिन्यू, डी.; लेमबर्गर, के.; डाल्लेयर, ए.; लेबेल, एल.; लिप्सकॉम्ब, टी. पी.; पास्कल, एम. और मिकेलियन, आई. (2002) “वन्यजीव में कैंसर, एक केस अध्ययन: सेंट लॉरेंस एस्टुअरी, क्यूबेक, कनाडा से बेलुगा”, एनवायरनमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव्स, 110, पृ. 285-292; अल्बुकर्क, टी. ए. एफ.; ड्रमोंड दो वाल, एल.; डोहर्टी, ए. और डे मागल्हैस, जे. पी. (2018) “मनुष्य से हाइड्रा तक: जीवन वृक्ष में कैंसर के पैटर्न”, बायोलॉजिकल रिव्यूज़, 93, पृ. 1715-1734।

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6 हैडली, डी. (2019) “राजा तितली के कैटरपिलर काले क्यों हो रहे हैं?”, थॉटको, 12 जुलाई [14 अगस्त 2019 को देखा गया]।

7 स्टेयर्स, जी. आर. (1966) “टेंट कैटरपिलर आबादी में वायरस का संचरण”, एंटोमोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ कनाडा, 98, पृ. 1100-1104।

8 लियू, के.; ली, वाई.; जूस्सेट, एफ.-एक्स.; ज़ाडोरी, ज़.; स्जेलेई, जे.; यू, क्यू.; फाम, एच. टी.; लेपाइन, एफ.; बर्गोइन, एम. और टिज्सेन, पी. (2011) “यूरोपीय हाउस क्रिकेट से अलग किया गया Acheta domesticus डेंसोवायरस, एक अभिव्यक्ति रणनीति विकसित करता है जो पार्वोवायरसों में अद्वितीय है”, जर्नल ऑफ़ वायरोलॉजी, 85, पृ. 10069-10078; स्जेलेई, जे.; वुडरिंग, जे.; गोटेल, एम. एस.; ड्यूक, जी.; जूस्सेट, एफ.-एक्स.; लियू, के. वाई.; ज़ाडोरी, ज़.; ली, वाई.; स्टायर, ई.; बूसियास, डी. जी.; क्लेस्पीज़, आर. जी.; बर्गोइन, एम. और टिज्सेन, पी. (2011) “उत्तर-अमेरिकी और यूरोपीय झींगुरों की Acheta domesticus डेंसोवायरस (AdDNV) के प्रति संवेदनशीलता और संबंधित महामारी”, जर्नल ऑफ़ इनवर्टेब्रेट पैथोलॉजी, 106, पृ. 394-399।

9 ग्रोनर, एम. एल.; शील्ड्स, जे. डी.; लैंडर्स, डी. एफ.; स्वेनार्टन, जे. और होएनिग, जे. एम. (2018) “बढ़ते तापमान, गलन कालक्रम और अमेरिकी लॉब्स्टर में महामारी खोल रोग”, द अमेरिकन नेचुरलिस्ट, 192, पृ. E163-E177।

10 आइवरसन, एस. ए.; गिलक्रेस्ट, एच. जी.; सूज़, सी.; बटलर, आई. आई.; हार्म्स, एन. जे. और फोर्ब्स, एम. आर. (2016) “जनसंख्या व्यावहारिकता विश्लेषण में महामारी विज्ञान को शामिल करना: आर्कटिक सीबर्ड कॉलोनी में एवियन कॉलरा संचरण गतिकी”, जर्नल ऑफ़ एनिमल इकोलॉजी, 85, पृ. 1481-1490; सैंडर, जे. ई. (2019) “फाउल कॉलरा”, मर्क मैनुअल: वेटरनरी मैनुअल, नवम्बर [8 दिसम्बर 2019 को देखा गया]।

11 कामेओ, वाई.; नागाओ, वाई.; निशियो, वाई.; शिमोडा, एच.; नाकानो, एच.; सुज़ुकी, के.; यूने, वाई.; सतो, एच.; शिमोजिमा, एम. और माएदा, के. (2012) “जंगली स्तनधारियों में महामारी कैनाइन डिस्टेंपर वायरस संक्रमण”, वेटरनरी माइक्रोबायोलॉजी, 154, पृ. 222-229; विलियम्स, ई. एस. और बार्कर, आई. के. (सम्पा.) (2008 [2001]) इन्फ़ेक्शियस डिज़ीज़ेज़ ऑफ़ वाइल्ड मैमल्स, तीसरा संस्करण, न्यूयॉर्क: जॉन वाइली एंड सन्स, भाग 1।

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