हम देख चुके हैं कि जंगली जानवरों की पीड़ा क्या है और यह क्यों महत्त्व रखती है, अब हम जंगल में जानवरों के विभिन्न तरीकों से पीड़ित होने की जांच करेंगे| हम इस बात को ध्यान में रखते हुए शुरुआत करने जा रहे हैं कि उनके भौतिक वातावरण, ख़ासतौर से मौसमी परिस्थितियों और प्राकृतिक हानियों से सम्बंधित कारकों द्वारा वे कैसे हानिग्रस्त हो सकते हैं|
मौसम, मुख्य रूप से ताप, जंगल में जानवरों के स्वास्थ्य या पीड़ा को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाता है| ख़ास क्षेत्रों में तापमान में उतार-चढ़ाव बड़ी संख्या में जानवरों को प्रभावित करता है| बहुत से जानवर, ख़ासतौर से वे जो बड़ी संख्या में पुनरुत्पादन कर रहे हैं, एक ख़ास क्षेत्र को निवास बना सकते हैं जब मौसमी परिस्थितियां उनके वहां रहने के लिए उचित हों, केवल बाद में मरने के लिए जब मौसमी परिस्थितियां बदल जाएँ| ठन्डे-रक्त वाले जानवर जैसे मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप, और अकशेरुकी ख़ासतौर से तापमान में त्वरित परिवर्तन के प्रति सुग्राही हैं| युवा (छोटे) जानवर जो पलायन नहीं कर सकते या जो उथले पानी में रहते हैं जिन्हें आसानी से सर्दी हो जाती है वे खासतौर से ख़तरे की स्थिति में होते हैं|
जंगली जानवरों में निर्जलीकरण (प्यास) उच्च मृत्यु दर के लिए अन्य मुख्य कारक (सहयोगी) है| यहाँ जल की कमी के दो आधारभूत तरीके हैं जो जंगली जानवरों को पीड़ित करते हैं और अक्सर वे दर्दनाक रूप से मर जाते हैं| पहला, सूखा पड़ने के समय, यहाँ जानवरों की बड़ी जनसँख्या के लिए पर्याप्त मात्रा में स्रोत उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उनमें से बहुत सारे प्यास से मर जाते हैं| दूसरा, कुपोषण के साथ, कुछ जानवर शिकारियों द्वारा संभावित खतरों के कारण जल ग्रहण करने में अनिच्छा प्रदर्शित करते हैं| वे सुरक्षित जगहों में छुपते हैं जहाँ या तो कम पानी है या नहीं है|
अंततः प्यास जानवरों को उनकी पानी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए कई ख़तरे उठाने को बाध्य करती है| जब अंत में वे अपने छुपने की जगह छोड़ते हैं, तो वे काफ़ी दुर्बल होते हैं जिससे वे जल स्रोतों या खुली जगहों पर आसान शिकार बन जाते हैं| अन्य अपनी छुपने की जगहों पर तब तक रुकते हैं जब तक कि बहुत निर्जलीकृत (बहुत प्यासे) ना हो जाएँ जिससे वे हिलडुल नहीं सकते| इस तरह, वे जल तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं और वे प्यास से मर जाते हैं| अत्यंत प्यास एक भयानक अनुभव है| यह रक्त की मात्रा कम करके एक थकान का आभास पैदा करता है, और शरीर श्वसन और ह्रदय दर बढाकर पानी की कमी को पूरा करने का प्रयास करता है| इसके बाद सिर घूमना आता है और गिरना, और अंततः मौत|
बीमारियाँ भी निर्जलीकरण की ओर ले जा सकती हैं| उदाहरण के लिए, मेंढ़क चित्रिड फंगस से संक्रमित हो सकते हैं जो उनकी त्वचा को बहुत मोटा कर देता है जिससे वे पानी और ज़रूरी पोषक तत्त्वों का अवशोषण नहीं कर सकते| चूँकि मेंढ़क प्रारंभिक रूप से अपनी त्वचा द्वारा जल ग्रहण करते हैं, यह आमतौर पर घातक है यदि उपचार ना हो| एक उपचार उपलब्ध है और संक्रमण का उपचार आसान है, किन्तु यहाँ अभी तक जंगल में मेंढ़कों की बड़ी जनसँख्या का उपचार करने का कोई तरीका नहीं है| उष्मागत तनाव जैसे अन्य कारणों द्वारा बीमारी और जटिल हो सकती है| उष्मागत तनाव निर्जलीकृत मेंढ़क की स्थिति को और बुरा कर सकती है, उस तापमान पर भी जो उन्हें जलयोजित (पानी से भरपूर) होने पर नुकसान नहीं पहुंचाता है|
कभी कभी, प्राधिकारी सूखे और भोजन में कमी से पीड़ित होने वाले जानवरों के तरीकों के प्रति उत्तरदायी हैं| कभी-कभी जान बूझकर भूखे जानवरों के प्रति आंकड़े पास होते हैं| उदाहरण के लिए, यह शहरी कबूतरों के साथ होता है|
ठंडा मौसम गर्म मौसम की बजाय अधिक नियमित रूप से जीवन को नुकसान पहुंचाता है| जो जानवर ठन्डे मौसम में सीतनिद्रा नहीं करते या सुषुप्त अवस्था में नहीं जाते उन्हें तापमान में बड़े प्रकारों का सामना करना होता है| तापमान सहे जा सकने वाली सीमा तक में गिर सकता है किन्तु फिर भी बहुत असहज हो सकता है| यह जानवरों के प्रतिरक्षा तंत्र को कमज़ोर कर सकता है और उन्हें बीमारी के प्रति अधिक सुग्राही बना सकता है|
स्तनधारियों की जनसँख्या के एक बड़े भाग का हर साल शीत ऋतु में मरना सामान्य है, और एक ख़ास कठिन शीत ऋतु के दौरान आधे से अधिक ख़त्म हो सकते हैं| तप्त वातावरण में बहुत से अन्य जानवरों से अलग, हिरण शीत ऋतु में पलायन या शीतनिद्रा नहीं करते| वे कुछ जगहों पर इकठ्ठा होने की कोशिश करते हैं जो थान, हवा, और बर्फ़ से कुछ आश्रय उपलब्ध कराता है|1
शीतनिद्रा करने वाले जानवर भी शीत ऋतु समाप्त होने से पहले शीत ऋतु के दौरान बीमारी और भूखमरी के बढ़े हुए ख़तरे के कारण अधिक दयनीय होते हैं| उदाहरण के लिए, चमगादड़ हिमदाह से पीड़ित या भूख से मर सकते हैं यदि वे शीत में शीतनिद्रा के दौरान जाग जाए और आसपास बहुत अधिक उड़ें, संचय के घट जाने पर जो उन्हें बचे हुए शीत ऋतु में प्राप्त करने की ज़रूरत है|
अन्य कई कीड़ों की तरह, क्रिकेट उपरति में शीत ऋतु से बच सकते हैं| वे बचते हैं या नहीं सामान्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि वे अपने जीवन चक्र के किस चरण में हैं और शीत ऋतु का तापमान कितना अस्थायी है| कुछ कीड़े जम कर कठोर हो जाने का सामना कर सकते हैं क्योंकि वे हिमनिरोधी के समान क्रियोप्रोटेक्टिव रसायन उत्पन्न करते हैं| हालाँकि, यदि वे त्वरित गर्म तापमान के कारण पिघल जाएँ, तो हो सकता है फिर से जम कर वे ना बचें|2
पक्षी सामान्य तौर पर सापेक्षित रूप से तापमान की बड़ी सीमा को सहन कर सकते हैं| जबकि यदि वे बीमार या घायल हों और गर्म जगह की ओर उड़ने में असमर्थ हों या शीत ऋतु में अपना शरीर गर्म ना रख पायें, तो वे हिमदाह से पीड़ित हो सकते हैं| वे बर्फ़ पर उतरने में हुई दुर्घटना या पानी के लिए गीले पत्थर के फ़र्श पर गलती से उतर कर भी पीड़ित हो सकते हैं| बत्तख़ और अन्य पक्षी जो पानी के बाहर ठीक से नहीं हिल पाते, कभी-कभी बर्फ़ पर फंस जाते हैं और कठोर सतह पर अपने पंख फड़फड़ाते हुए उन्हें घायल कर लेते हैं|3
ठन्डे-रक्त वाले जानवर जैसे मछलियाँ, उभयचर, और सरीसृप को अपने शरीर का तापमान नियमित रखने के लिए गर्म या ठन्डे पानी या हवा की ओर बाहर आना होता है| परिणामतः, वे स्तनधारियों और पक्षियों की बजाय तापमान परिवर्तन के कारण ताप तनाव या हाइपोथर्मिया के प्रति अधिक दयनीय होते हैं| हालाँकि जलीय वातावरण में हवा की बजाय आमतौर पर कम तापमान अस्थिरता है, यहाँ शरीर और जल के बीच तापमान में एक बड़ी विविधता हो सकती है| जैसे स्थलीय जानवर नए क्षेत्र में आवास के लिए पलायन करते हैं, जलीय जानवर भी उन क्षेत्रों में जा सकते हैं जो ठन्डे और गर्म हों जो कि उनके शरीर के लिए अच्छा हो| बाढ़ और तूफ़ान भी जलीय जानवरों को विस्थापित कर सकते हैं जिससे वे प्रतिकूल वातावरण में जा सकते हैं|
समुद्री कच्छप सामान्यतः “ठण्ड आघात” (शीत आघात) का अनुभव करते हैं यदि तापमान में अचानक परिवर्तन हो या पानी लम्बे समय तक काफ़ी ठंडा रहे| शीत आघात तब होता है जब ह्रदय दर और आघात और सुस्ती में परिसंचरण घट जाए जो कि गंभीर हो सकता है| छोटे कच्छप ख़ासतौर से ख़तरे में होते हैं क्योंकि अक्सर वे उथले पानी में रहते हैं जो जल्दी ठंडा होता है| शीत आघात अक्सर असामान्य शीत काल के दौरान होता है, किन्तु कुछ भागों में, हर शीत ऋतु में होता है और आधे से अधिक कच्छपों को मारता है जो पलायन करने में समर्थ नहीं होते|4
कम तापमान की प्रतिक्रिया में, कुछ जलीय जानवरों का उपापचय तंत्र घटता है – उन्हें बेहतर अनुकूलन में सक्रिय करने के लिए| हालाँकि, कई जलीय जानवर ताप तनाव का अनुभव करते हैं जो उनकी ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता को अपंग करती है| यदि तापमान लम्बे समय के लिए काफ़ी अधिक रहे, तो वे बच पाने में असमर्थ होंगे| प्रतिकूल मामलों में, या जब जलवायु में परिवर्तन लम्बे समय में उत्तरोत्तर होता है, तो इस प्रक्रिया में पीड़ित हो कर, पूरी जनसँख्या मर सकती है| प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों से मरने वाले जानवर अपना जीवन खोने के अलावा बहुत तकलीफ़ का सामना कर सकते हैं|
प्रतिकूल तापमान के अलावा अन्य कई कारक जानवरों की जनसँख्या को प्रभावित कर सकते हैं| कुछ जानवरों को बढ़ने के लिए एक ख़ास स्तर की नमी की आवश्यकता होती है और शुष्क क्षेत्रों में वे बड़े पैमाने पर पीड़ित हो सकते हैं| दूसरों के लिए, काफ़ी अधिक नमी या वर्षा हानिकारक हो सकती है| हालाँकि यहाँ कई जानवर हैं जो वर्षा से प्रभावित नहीं होते, या असल में वर्षा पसंद करते हैं, यहाँ अन्य हैं जो इससे परेशान होते हैं या बीमार होते हैं या शारीरिक स्थितियां जो इससे खराब होती हैं| बरसात की तरह ही, बर्फ़ और तूफ़ान मनुष्य के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं, वे जंगल में रहने वाले जानवरों के समान असहजता और तनाव पैदा कर सकते हैं| यहाँ तक कि यदि ये असहज मौसमी परिस्थितियां उन्हें मारती नहीं हैं, वैसे ही जैसे वे हमें नहीं मारतीं, वे तब भी अमानुष जानवरों के लिए पीड़ा का कारण हो सकती हैं| पर्याप्त आवास या चिकित्सा देखभाल की उपलब्धता के बिना, मनुष्य के लिए जो परेशानियाँ छोटी हो सकती हैं वे जंगल में रहने वाले जानवरों के लिए गंभीर हो सकती हैं|
कई अन्य मौसमी घटनाओं का जानवरों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है, और वे पूरी जनसँख्या ख़त्म कर सकते हैं| इनके प्रभाव अन्य कारकों के साथ जुड़ सकते हैं जैसे भोजन और पानी की उपलब्धता, शिकारियों की उपस्थिति, और बीमारियाँ| उदाहरण के लिए, ध्यान दें, सूखा, भारी बर्फ़बारी, और बाढ़| ये प्रतिकूल परिस्थितियां जानवरों को सीधे मार सकती हैं, उदाहरण के लिए, डुबा कर, या अप्रत्यक्ष रूप से, उदाहरण के लिए भोजन की आपूर्ति बिगाड़ कर| मौसमी परिस्थितियां बीमारियाँ भी पैदा कर सकती हैं या जानवरों के बीच महामारी उत्पन्न कर सकती हैं| कठोर मौसम के कारण शीत ऋतु के दौरान कई जानवर कमज़ोर हो जाते हैं, जो उन्हें बीमार होने के प्रति और सुग्राही बनाता है| अन्य जानवर जो बीमारी से पीड़ित होते हैं उनमें वह तभी सक्रिय होता है जब ख़ास मौसमी परिस्थितियां होती हैं| उदाहरण के लिए, कई पक्षियों में एवियन हैज़ा होता है जो की निष्क्रिय होता है| लॉबस्टर कवच बीमारी के प्रति अधिक सुग्राही होते हैं जब पानी गर्म होता है, जो उनके कवच को कमज़ोर करता है और उन्हें घायल होने या शिकार होने के प्रति अधिक सुग्राही बनाता है|
अतः हम देख सकते हैं कि जंगल में रहने वाले जानवरों के लिए मौसमी परिस्थितियां हानि पहुंचाने की मुख्य स्रोत हैं, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में|
जंगल में रहने वाले जानवर प्राकृतिक आपदाओं में ख़ासतौर पर दयनीय होते हैं| भूकंप, तूफ़ान, ज्वालामुखी विस्फ़ोट, सुनामी और जंगल की आग से भयंकर परिणाम हो सकते हैं| धूल, राख, लावा, या बर्फ़ से डूबकर या दफ़न हो के; जल चुके बिलों से या ढ़हने से दब कर मौत; पेड़ों और चट्टानों से दब कर, ओला गिरने पर पत्थर फेंके जाने से बहुत से जानवर मरते हैं| अन्य को बड़ी चोटें लगती हैं|
अक्सर जानवर विस्थापित होने से उच्च ख़तरे पर होते हैं, या तो सुरक्षित जगहों पर ले जाए जाने के कारण या तेज़ हवा या बाढ़ के पानी द्वारा बहाकर दूर ले जाने के कारण| यदि विस्थापित जानवर एक छोटी सी जगह में इकठ्ठा हों तो, वे बीमारी और परजीवी संक्रमणों के बड़े प्रकोप के ख़तरे पर होते हैं| सीमित भोजन की आपूर्ति के कारण कुपोषण और भूख भी बड़े ख़तरे बन जाते हैं| जानवर सूर्य, ठण्ड, या हवा का सामना करने पर भी प्रभावित हो सकते हैं यदि उनके पास उचित आवास ना हो|
हवा, बारिश, और आँधियों के मलबे आवास तोड़ने और भोजन और पानी के स्रोतों को दूषित करने सहित जानवरों को घायल कर और मार सकते हैं| तेज़ हवा और बारिश पीठ तोड़ने और सिर दर्द करने का कारक हो सकते हैं, साथ ही साथ ग्रहण किये जाने वाले पानी से संक्रमण और साँस लेने में परेशानियाँ भी|
आँधियों में, जानवर विस्थापित और अनाथ हो जाते हैं| इनमें से ज़्यादातर समस्याएं गंभीर नहीं होतीं यदि जानवर देखभाल पाने में समर्थ होते, किन्तु अधिकतर मामलों में ये उन्हें नहीं मिलता| कुछ भाग्यशाली स्तनधारियों और पक्षी देखभाल प्राप्त करते हैं यदि वे शहरी क्षेत्र में गिर जाएँ और किसी के बगीचे या आंगन में गुमराह अवस्था में पाए जाएँ|
चक्रवाती आंधियां जो महाकोष्ठिका आंधियों के नाम से जानी जाती हैं 10 मील ऊपर जा सकती हैं और तूफानी बल वाली हवा हो सकती हैं| जब ये तूफ़ान ठन्डे मौसम में आते हैं, तो जानवर मारे जाते या घायल होते हैं जब गोल्फ़ बॉल के आकार के ओला-वृष्टि के पत्थर उन्हें आकर लगते हैं|5 तूफ़ान के आवेश और तेज़ हवाएं इतना दबाव समुद्र तल पर बना सकती हैं कि बड़ी मात्रा में गाद (तलछट) और बड़ी वस्तुएं आसपास फेंकी जा सकती हैं| दबाव तेज़ी से समुद्र के निचले हिस्से के ठन्डे पानी को उथले हिस्से के गर्म पानी से मिला सकता है| यह ठन्डे-रक्त वाले जानवरों में हाइपोथर्मिया पैदा कर सकता है जो अपने शरीर का तापमान नियमित रखने के लिए पानी के तापमान पर निर्भर करते हैं| मिलने वाले पानी से उत्पन्न तेज़ धारायें कई छोटे और धीमे तैरने वाले जानवरों को मार सकती हैं जो तैर के दूर नहीं जा सकते|6
बाढ़ आने और गाद सरकने के परिणामस्वरूप डूबने और मरने के प्रति छोटे जानवर अधिक दयनीय हैं|7 हो सकता है बिलों में रहने वाले जानवर छोटे व्यवधानों से सुरक्षित रहें, किन्तु मूसलाधार बारिश उनके बिल तोड़ सकती है या उनके प्रवेश द्वार बंद कर सकती है, उन्हें फंसाकर या बिना आवास के अकेला छोड़कर| बिलों के प्रवेश द्वार टहनियों, पत्तों पत्थरों और पानी या हवा द्वारा आसपास आये मलबों से बंद हो सकते हैं| पत्ते और मलबे जलीय जानवरों को भी हानि पहुंचा सकते हैं, सूर्य प्रकाश रोक कर, सड़ने पर ऑक्सीजन स्तर घटाकर, और मछलियों के गिल्स में फंस, उनका दम घुटा कर|8
एक जंगल की आग लाखों जानवरों को मार सकती है|9 जंगल की आग की लहर और धुआं अपने रस्ते में आने वाले अधिकतर जानवरों को मार सकती है, बहुत से उन जानवरों को भी जो सतह के काफ़ी क़रीब रहते हैं, और जो जानवर नदियों में और धाराओं में रहते हैं जब आग की लहर क़रीब से गुज़रती है| भागते हुए जानवर हो सकता है रास्ते में इंतज़ार करते शिकारियों द्वारा पकड़ लिए जाएँ| आगजनी से बच जाने पर भी, इसके बाद के परिणाम जानवरों को जला, अँधा, और श्वसन परेशानियों के साथ छोड़ सकती है जो गंभीर और स्थायी रूप से दुर्बल कर सकती है|
कुछ जानवर जैसे गिलहरी, शल्यक, और कोआला पेड़ों पर चढ़कर दूर जाने की कोशिश करते हैं जो आग में अच्छी योजना नहीं है| अन्य जानवर उड़ने का प्रयास कर सकते हैं किन्तु तुरंत घबराते हैं और अपने खोहों में लौट आते हैं| छोटे जानवर जमीन में बिल में जा सकते हैं किन्तु यदि वे पर्याप्त भीतर नहीं जाते तो वे मर जायेंगे जब उनकी खोह ओवन की तरह गर्म होगी|10 उड़ने वाले जावनर धुंवे का अंतर्ग्रहण, जलने, थकने, भटकाव, या अन्य जानवरों द्वारा आक्रमण से मर सकते हैं|11 माताएं और बच्चे हो सकता है भागने में समर्थ ना हों, और क्षेत्रीय जानवर भागने के प्रति अधिक अनिच्छुक हों और वहां अंत तक रुकें जब तक निकलने में बहुत देर हो चुकी हो|
धुवें के घाव सामान्यतः अल्पकालिक होते हैं और अक्सर कुछ दिनों में प्राकृतिक रूप से ठीक हो जाते हैं| हालाँकि, यदि यह पर्याप्त गंभीर या लम्बा हो, तो यह फेफड़ा ख़राब होना, दृष्टि जाना, या अंधापन सहित बड़ी हानि का कारक हो सकता है| पक्षी ख़ासतौर से गंभीर श्वसन हानि के ख़तरे पर होते हैं क्योंकि अपने आकार के अनुपात में वे काफी हवा लेते हैं|12 जली हुई त्वचा बड़ी मात्रा में दर्द का कारक हो सकती है, सीमित गतिशीलता, और हो सकता है पूरी तरह कभी ठीक ना हो| विकृत पंख और अन्य उपांग जानवर की क्षमता को आस पास घुमने और संकेत देने के प्रति प्रभावित कर सकते हैं|
भूकंप में, चट्टान गिरने से जानवर जीवित दब सकते हैं| समुद्री पक्षी और मछलियाँ जो किनारे के समीप उथले पानी में रहती हैं रेत या मलबे में दब जाती और घुटती हैं| मछलियाँ किनारे के बाहर आ जाती हैं जहाँ वे धीरे-धीरे मरती हैं क्योंकि पानी के बाहर वे साँस नही ले सकतीं| भूकंप द्वारा भूस्खलन हो सकता है जो जानवरों को जीवित दबा और उनके आवास नष्ट कर सकता है, या बाढ़ द्वारा जो उन्हें डुबा या दूर कर सकता है|13
इसके अलावा धरती हिलना, भूकंप समुद्री प्लेट को हिला और विस्थापित कर सकते हैं| जमीन के टुकड़े उन पर रहने वाले जानवरों के साथ पानी में डूब सकते हैं| हर समुद्र का तल विस्थापित होता है, तो यह सुनामी ला सकता है, जो कि तेज़, ऊँची लहरों की श्रृंखला है जो तेज़ी से शुरू होती है, महासागर पार कर सकती है और कई दिनों तक रह सकती है| सुनामी आने पर पक्षी और अन्य छोटे जानवर डूब सकते हैं जब वे पानी में बह आते हैं और फिर से सूखी ज़मीन पर वापस जाने में असमर्थ होते हैं|14
ज्वालामुखी विस्फ़ोट महीनों या सालों तक चल सकता है, अपघर्षक और ज़हरीला लावा और राख उगलते, विस्फ़ोट करते, और आसपास के पानी को गर्म करते हुए जो जलीय जानवरों को जीवित उबाल सकता है|
राख और अन्य मलबे गिल्स में फंसते हैं और मछलियाँ घुटती हैं, और लावा महीन, कांच के टुकड़े छोड़ता है जो मछलियों को नुकसान पहुंचाता है जब पानी उनके गिल्स से गुज़रता है|
ज्वालामुखी द्वारा ज़मीन पर डाली गई राख में रसायन और धारदार टुकड़े होते हैं जो एक विस्फ़ोट के बाद कई वर्षों तक क्षेत्र में जानवरों को हानि पहुंचाते हैं| राख के धारदार टुकड़े आंख और त्वचा पर खुजली के कारक हैं और दांतों, खुरों और कीड़ों के पंखों के लिए अपघर्षक हैं| राख का अंतर्ग्रहण श्वसन-सम्बन्धी समस्याएं और उदरीय बंध के कारक हैं|15 राख और गैस भोजन और पानी की आपूर्ति को नष्ट या दूषित करते हैं|
1 वूस्टर, सी। (2003)। व्हॉट हैपन्स टू डियर ड्यूरिंग अ टफ़ विंटर? नॉर्दर्न वुडलैण्ड्स, 2 फ़रवरी। [14 अक्टूबर 2019 को अभिगमित]
2 कैलाहन, आर। (2018)। हाउ डू क्रिकिट्स गो इन्टू अ हाइबरनेशन स्टेट व्हेन कोल्ड? साइन्सिंग, 17 अक्टूबर। [23 जून 2019 को अभिगमित]
3 ब्राउन, सी. आर., एवं ब्राउन, एम. बी। (1998)। इंटेन्स नैचुरल सिलेक्शन ऑन बॉडी साइज ऐंड विंग ऐंड टेल असिमेट्री इन क्लिफ़ स्वालोज़ ड्यूरिंग सिवियर वेदर। इवोल्यूशन, 52, 1461-1475। रैडेट्ज़, के। (2018)। फ़्रिजिड टेम्प्स पोज़ डेंजर टू लोकल वाइल्डलाइफ़। सीबीएस मिनेसोटा, 4 जनवरी। [19 जून 2019 को अभिगमित]
4 गैब्रियल, एम. एन। (2019)। हंड्रेड्स ऑफ़ सी टर्टल्स ‘कोल्ड-स्टनड’ बाय फ़्रिजिड टेम्परेचर्स इन गल्फ़ वाटर्स। यूएसए टुडे, 15 दिसम्बर। [19 जून 2019 को अभिगमित] फ़ॉली, ए. एम., सिंगेल, के. ई., डटन, पी. एच., समर्स, टी. एम., रेडलो, ए. ई., एवं लेस्मैन, जे। (2007)। कैरेक्टरिस्टिक्स ऑफ़ अ ग्रीन टर्टल (चेलोनिया माइडस) असेंब्लेज इन नॉर्थवेस्टर्न फ़्लोरिडा डिटरमाइंड ड्यूरिंग अ हाइपोथर्मिक स्टनिंग इवेंट। गल्फ़ ऑफ़ मेक्सिको साइंस, 25, 131-145।
5 कैपुची, एम। (2019)। मोंटाना हेइलस्टॉर्म स्लॉटर्ज़ 11,000 बर्ड्स। द वॉशिंगटन पोस्ट, 21 अगस्त। [13 सितम्बर 2019 को अभिगमित]
6 नेशनल ओशियैनिक ऐंड एट्मॉस्फेरिक ऑब्ज़र्वेशन। (2020)। हाउ डू हरिकेन्स अफ़ेक्ट सी लाइफ़? नेशनल ओशन सर्विस, 09 अप्रैल। [23 सितम्बर 2019 को अभिगमित]
7 शफ़ीक़, एम। (2018)। केरल फ़्लड्स लीव ट्रेल ऑफ़ डेस्ट्रक्शन इन फ़ॉरेस्ट्स; एलीफ़ेंट्स, टाइगर्स अमंग सेवेरल ऐनिमल्स किल्ड। फ़र्स्टपोस्ट, 30 अगस्त। [21 अगस्त 2019 को अभिगमित]
8 डिलोनार्डो, एम. जे। (2018)। व्हॉट हैपन्स टू ऐनिमल्स ड्यूरिंग अ हरिकेन? एम.एन.एन., 12 सितम्बर। [21 अगस्त 2019 को अभिगमित]
9 फ़िज़.ऑर्ग। (2019)। मोर दैन 2 मिलियन ऐनिमल्स पेरिश इन बोलिविया वाइल्डफ़ायर्स। फ़िज़.ऑर्ग, 26 सितम्बर। [5 अक्टूबर 2019 को अभिगमित]
10 ज़िलिन्स्की, एस। (2014)। व्हॉट डू वाइल्ड ऐनिमल्स डू इन अ वाइल्डफ़ायर? नेशनल ज्योग्राफ़िक, 22 जुलाई। [13 सितम्बर 2019 को अभिगमित]
11 डेली, एन। (2019)। व्हॉट द अमेज़न फ़ायर्स मीन फ़ॉर वाइल्ड ऐनिमल्स। नेशनल ज्योग्राफ़िक, 23 अगस्त। [13 सितम्बर 2019 को अभिगमित]
12 कोप, आर. बी। (2019)। ओवरव्यू ऑफ़ स्मोक इनहेलेशन। मर्क मैनुअल: वेटरनरी मैनुअल। https://www.merckvetmanual.com/toxicology/smoke-inhalation/overview-of-smoke-inhalation [23 सितम्बर 2019 को अभिगमित]
13 ब्रेस्सान, डी। (2016)। अर्थक्वेक्स कैन हैव डेवास्टेटिंग इम्पैक्ट्स ऑन वाइल्डलाइफ़। फ़ोर्ब्स, 30 नवम्बर। [31 अगस्त 2019 को अभिगमित]
14 गोल्डमैन, जे। (2011)। इम्पैक्ट ऑफ़ द जापान अर्थक्वेक ऐंड सुनामी ऑन ऐनिमल्स ऐंड द एन्वायरनमेंट। साइंटिफ़िक अमेरिकन, 22 मार्च। [13 सितम्बर 2019 को अभिगमित]
15 लेगेट्ट, आर। (2018)। प्लांट्स ऐंड ऐनिमल्स अराउंड वॉल्कैनोज़। साइन्सिंग, 23 अप्रैल। [19 सितम्बर 2019 को अभिगमित] साइंटिफ़िक अमेरिकन। (2005)। हाउ डू वॉल्कैनोज़ अफ़ेक्ट वर्ल्ड क्लाइमेट? 4 अक्टूबर। [19 सितम्बर 2019 को अभिगमित]