अब हम “जंगली जानवरों की पीड़ा” के संभावित अर्थ और सम्बंधित संकल्पनाओं के विस्तार में थोड़ा और जायेंगे| “पीड़ा” शब्द जानवरों द्वारा सही गई पीड़ा के बारे में ध्यान देना जो उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, की ओर संकेत करता है| इस प्रकार यह संरक्षण में किसी की रुचि से अलग है| जो कि, किस तरह प्रजातियाँ, जनसँख्या, या पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो सकते हैं के बारे में नहीं है, क्योंकि प्रजातियाँ और पारिस्थितिक तंत्र अपने आप में व्यक्तिपरक अनुभवों वाली संवेदनशील इकाइयां नहीं हैं| जंगली जानवरों की पीड़ा इस बारे में है कि व्यक्तिगत जानवरों की भलाई नकारात्मक रूप से कैसे प्रभावित हो सकती है| इसके अलावा, दूसरे तरीकों से भी जानवरों को नुकसान हो सकता है, जैसे कि मौत से| यदि सख्ती से कहने पर शब्द “जंगली जानवरों की पीड़ा” केवल जानवरों की पीड़ा के बारे में है, तब भी यह बड़े तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें सिर्फ़ पीड़ा नहीं बल्कि मृत्यु से हानि भी शामिल है|
यहाँ विभिन्न प्रकार के कारक हैं जो मनुष्य के नियंत्रण से बाहर रहने वाले जानवरों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं| इन्हें सरल करने के लिए, उन्हें तीन मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है:
पहला, मनुष्यों द्वारा होने वाली एक प्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक हानियाँ हैं जो या तो जानबूझकर या अनजाने में होने वाली विशेष क्रियाओं का प्रत्यक्ष परिणाम हैं|
मछली पकड़ना और शिकार करना जानबूझ की गई प्रत्यक्ष हानि के उदाहरण हैं| अन्य उदाहरण ख़ास जानवरों का जानबूझकर किया जाने वाला निवारण है| हो सकता है यह आर्थिक कारणों के लिए हो, जैसे खेती पर उनके नकारात्मक प्रभावों के कारण जब उन्हें मार दिया जाता है| यह संरक्षणवादी उद्देश्यों के लिए भी हो सकता है, जब अन्य प्रजातियों पर जानवरों के प्रभाव के कारण वे मारे जाते हैं| हार्वेस्टिंग मशीनों या वाहनों द्वारा कुचले जाने से घायल हुए या मारे गए जानवर जानबूझकर की गई प्रत्यक्ष हानि के उदाहरण हैं|
दूसरे, अप्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक हानियाँ वे हानियाँ हैं जो मानवीय क्रियाकलापों का परिणाम हैं किन्तु ठोस क्रियाकलापों का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं हैं|
इस प्रकार की हानियों के विभिन्न प्रकार हैं| इसकी सीमा मछली पकड़ने के खो चुके जाल से होने वाले नुकसान से लेकर मनुष्य के कारण होने वाले मौसमी बदलावों की वजह से जानवरों के प्रति होने वाले प्रतिकूल मौसम तक है|
अंततः, प्राकृतिक हानियाँ जानवरों द्वारा सही जाने वाली हानियाँ हैं जो बिना किसी मानवीय क्रियाकलाप के होती हैं|
इन हानियों के उदाहरण भूखमरी, मौसमी घटनाएँ, दुर्घटनाएं, जानवरों के बीच द्वंद्व, और प्राकृतिक आपदाएं हैं|
“जंगली जानवरों की पीड़ा” इस बात का अर्थ कभी-कभी यह समझा जाता है कि जंगली जानवरों द्वारा सही जाने वाली हर प्रकार की हानि| इनमें वे शामिल हैं जो अन्थ्रोपोजेनिक और प्राकृतिक हैं| ध्यान देना ज़रूरी है कि जानवरों का बचाव करने वाले अक्सर अन्थ्रोपोजेनिक हानियों पर मजबूती से केन्द्रित थे, ख़ासतौर से प्रत्यक्ष मामले में, दोनों से पीड़ित जानवर जो घरेलू हो चुके हैं उनसे और जंगली जानवरों द्वारा भी| जो हानियाँ या तो पूरी तरह या अधूरे रूप में प्राकृतिक हैं उतना ध्यान नहीं दी गई हैं| परिणामतः, “जंगली जानवरों की पीड़ा” शब्द जानवरों द्वारा सही गई उन सभी हानियों को नाम देने के लिए और विशेष तरीके से भी इस्तेमाल हुआ है जो मनुष्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर हैं और जिनमें थोड़ी मात्रा में प्राकृतिक अंश भी हैं| इस विशेष अर्थ में, “जंगली जानवरों की पीड़ा” शब्द अन्थ्रोपोजेनिक प्रभावों के कारण होने वाली पीड़ा को भी शामिल करता है जो अधिक छिन्न-भिन्न करता है| एक उदाहरण है, जब जानवर मनुष्यों द्वारा बनाये गए एक नए पारिस्थितिक तंत्र में प्राकृतिक कारणों से मरते हैं, जैसे रोपित किया गया जंगल| अंततः, जानवरों द्वारा सही जाने वाली प्राकृतिक हानियों के बारे में ध्यान देने के कारण, मानवीय क्रियाकलापों द्वारा हानि पहुंचाए गए जानवरों के बचाव के बारे में बताने वालों से अलग नहीं हैं| अभिप्रेरणा आसान है: हम जितना हो सके उतना बेहतर जीवन जानवरों के लिए चाहते हैं, पीड़ा और असमय मृत्यु से मुक्त| इस वजह से, व्यावहारिक रूप में, “जंगली जानवरों की पीड़ा” शब्द का एक या अन्य अर्थ का चुनाव हो सकता है बहुत महत्वपूर्ण ना हो| जानवरों द्वारा सही जाने वाली सभी हानियां मायने रखती हैं, केवल प्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष अन्थ्रोजेनिक और प्राकृतिक भी|
हम देख सकते हैं कि तीनों प्रकारों के बीच सख्त सीमायें नहीं हैं| उदाहरण के लिए, यहाँ अक्सर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक हानियों के बीच स्पष्ट सीमा नहीं है| यह बहस की जा सकती है कि कीटनाशकों द्वारा अकशेरुकियों को ज़हर दिया जाना एक प्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक हानि है, यदि वे खरपतवार मरने में इस्तेमाल किये गए उर्वरकों द्वारा ज़हर दिए गए हैं, तो वह एक अप्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक हानि होगी, हालाँकि दोनों मामले अंत में समान होंगे|
इसके अलावा, यहाँ तीन तरीकों का संयोजन हो सकता है, ख़ासतौर से अप्रत्यक्ष और प्राकृतिक| जानवर थोड़े प्राकृतिक और थोड़े अप्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक हानियों से पीड़ित हो सकते हैं| जैसे कि उदाहरण के लिए, अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय क्रियाकलाप द्वारा एक बीमारी जंगल में प्रवेश करती है और इससे कुछ जानवर मर जाते हैं| यदि उस जगह में रहने वाले जानवर मनुष्य द्वारा लाई गई बीमारी के संपर्क में आते हैं, तो यह हानि अप्रत्यक्ष अन्थ्रोपोजेनिक है, हालाँकि यह ऊपरी तौर पर प्राकृतिक भी है, क्योंकि यह बीमारी प्राकृतिक तरीकों से जनसँख्या द्वारा फैलती है|
संयोजित प्रकार की यह हानि बहुत सामान्य हो सकती है, क्योंकि मनुष्यों ने धरती पर विद्यमान अधिकतर पारिस्थितिक तंत्रों को बदल दिया है| असल में, मनुष्य द्वारा पर्यावरण में किये गए परिवर्तनों के कारण, यह संभव है कि यहाँ एक भी पारिस्थितिक तंत्र नहीं है जो मानवीय क्रियाकलाप द्वारा बदला ना गया हो, गहरे समुद्र और अन्य दूरदराज़ के इलाक़ों में कुछ संभावित अपवादों के साथ| इसके अलावा, यह आकलन किया गया है कि विश्व की जमीन का एक तिहाई अधिक हिस्सा खेती के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है|1 इसके अलावा, कुल ज़मीन का एक चौथाई जंगल है, जिसमें से बहुत बड़ा भाग थोडा या पूरा मनुष्य द्वारा लगाया गया है, ख़ासतौर से शीतोष्ण इलाकों में| आदिम जंगल, जो लगाए नहीं गए थे और बहुत कम मानवीय संपर्क द्वारा विकसित हुए हैं, (बहुत कम प्रतिशत में, उदाहरण के लिए यूरोप में)|2 तब भी, ये आदिम पारिस्थितिक तंत्र पर्यावरण को प्रभावित करने वाले मानवीय क्रियाकलापों के कारण बदल गए हैं| इसका अर्थ है कि जानवरों को हानि पहुँचाने के लिए यहाँ कोई स्पष्ट विभाजन सख्त प्राकृतिक हानियों और आधी प्राकृतिक, आधी अन्थ्रोजेनिक हानि नहीं हैं|
यह इसलिए भी है क्योंकि, मजबूती से कहने पर, उन सभी क्षेत्रों में रहने वाले जंगली जानवर कुछ क्षेत्र में मनुष्य के नियंत्रण में माने जा सकते हैं, क्योंकि मानवीय क्रियाकलाप उनके रहने वाली जगहों और परिस्थितियों को बदल सकते हैं जहाँ वे रहते हैं| यहाँ हम जिन जानवरों से सम्बंधित हैं उनमें अंतर करने के क्रम में, हमें इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि वे बाहर मनुष्य के सीधे संपर्क में रहते हैं|
कुछ और जिसका स्पष्टीकरण “जंगलो जानवरों की पीड़ा” के बारे में होना चाहिए वह “जंगली जानवरों” का अर्थ है| यह सोचना त्रुटिपूर्ण है कि सीधे तौर पर जंगली जानवर वे हैं जो सामान्यतः जंगल में रहते हैं| उन जगहों पर रहने वाले वही जानवर अन्य जगहों पर भी पाए जा सकते हैं| इसके अलावा, “जंगली” शब्द दुविधापूर्ण हो सकता है| ठीक से कहने पर, इसका अर्थ यह है पहुँच से बाहर के क्षेत्र या पारिस्थितिक तंत्र, या मनुष्यों द्वारा केवल बहुत कम तरीकों से प्रभावित| कभी-कभी इसका अर्थ उन जगहों से माना जाता है जहाँ मानवीय उपस्थिति या गतिविधि उतनी नहीं है, उदाहरण के लिए, मनुष्यों द्वारा देखरेख किये जाने वाले जंगल सहित| किन्तु जंगली जानवरों की पीड़ा का अर्थ केवल उन जगहों में रहने वाले जानवरों को शामिल करना नहीं है|
बहुत से जानवर जिन्हें लोग “जंगली” मानते हैं और बाहर रहते हैं, खेती या जानवरों की खेती के लिए समर्पित (तय) क्षेत्रों में मानवीय नियंत्रण को दिशा देते हैं| वे शहरी, उप शहरी, और औद्योगिक क्षेत्रों में भी पाए जा सकते हैं| कई प्रकार के कशेरुकी, जैसे स्तनधारी, संधिपाद और पक्षी, कुछ बड़े कशेरुकी, और कई अकशेरुकी उन जगहों में रहते हैं| पक्षी, गिलहरी, तितलियाँ, और छिपकलियाँ शहरी वातावरण में रहने वाले जानवरों के उदाहरण हैं|3 उन्हें अक्सर मानवीय गतिविधियों द्वारा सीधे हानि पहुँचती हैं| इस वजह से, वे भी परिभाषा में शामिल हो सकते हैं|
यहाँ कुछ जानवर हैं जो मनुष्य के नियंत्रण से बाहर रहते हैं किन्तु जंगली रूप में वर्गीकृत नहीं हैं, जैसे वे जानवर जिन्हें “बनैला” (प्राण घातक) माना जाता है| हालाँकि, “बनैला” और “जंगली” के बीच अंतर उनकी पीड़ा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण नहीं है| चुनौतियों का सामना करने के कारण वे समान रूप से हानिग्रस्त होते हैं| इस तरह से, “जंगली जानवरों की पीड़ा” के रूप में हम बनैला जानवरों को सरोकार में शामिल कर सकते हैं|
तब हम देख सकते हैं कि “जंगली जानवरों की पीड़ा” में “जंगली जानवर” शब्द मानवीय नियंत्रण से बाहर रहने वाले सभी जानवरों की ओर इशारा करता है| “जंगली जानवर” केवल एक भाषागत सरलता है जिसे सहजता के लिए इस्तेमाल किया जाता है| किन्तु हमें याद रखना है कि यह केवल जंगल या अर्द्ध जंगल में रहने वाले जानवरों को ही नहीं, बल्कि बनैला जानवरों और शहरी वातावरण में रहने वाले जानवरों को भी सम्मिलित करता है|
“जंगली जानवर” शब्द इस्तेमाल करने का एक सामान्य तरीका उन जानवरों को लेना है जो उन प्रजातियों में शामिल नहीं हैं जो घरेलू हैं, अर्थात् मनुष्यों द्वारा कई पीढ़ियों से चुनी हुई नस्लें जैसे कुत्ते और मुर्गियां| यहाँ ऐसे जानवर हैं जो इस रूप में जंगली हैं किन्तु क़ैद में रहते हैं, जैसे फ़र फार्म में मिंक, काम के लिए प्रशिक्षित हाथी, और चिड़ियाघर में ज़ेब्रा|
ये जानवर मनुष्यों द्वारा उनके इस्तेमाल किये जाने के कारण आमतौर पर बहुत पीड़ित होते हैं, और उनकी स्थिति कुछ ऐसी होती है कि जो कोई भी जानवरों की पीड़ा के बारे में चिंतित है उसे इस बारे में काफ़ी चिंतित होना चाहिए| इस प्रकार उन्हें बचाने के लिए जानवरों का पक्ष लेने वालों ने लम्बे समय से संघर्ष किया है| हालाँकि, यह उन जानवरों को छोड़ देता है जो क़ैद में रहते हैं, जो कि इसकी बजाय “जंगली जानवरों की पीड़ा” के अंतर्गत ध्यान दिए जाने द्वारा सम्मिलित हैं| सीमारेखा के (क़रीबी) मामले उन जानवरों को शामिल करते हैं जो खेती में इस्तेमाल होते हैं किन्तु अपना अधिकतर जीवन बंधनमुक्त बिताते हैं| उदाहरण के लिए, हम बकरी या भेड़ के बारे में सोच सकते हैं जो अपना सम्पूर्ण जीवन पहाड़ों पर बिताते हैं|
अन्य शब्द जो अक्सर इस्तेमाल किया जाता है वह है “वन्यजीव”| यह दो कारणों से जंगली जानवरों के लिए अशुद्ध है| पहला, यह अक्सर सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को इंगित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है| यह जानवरों को अन्य प्राणियों से अलग नहीं करता है जो संवेदनशील नहीं हैं| दूसरा, यदि यह ख़ासतौर से जंगली जानवरों को इंगित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो भी, “वन्यजीव” शब्द गिनने योग्य संख्या नहीं है, इसलिए यह जानवरों की व्यक्तिगत तौर पर पहचान नहीं करता है|
अतः, निष्कर्ष के लिए, “जंगली जानवरों की पीड़ा” में इस्तेमाल किया गया शब्द “जंगली” जानवरों को उनकी प्रजाति के आधार पर विभाजित नहीं करता है| यह “वन्यजीव” जैसा नहीं है, जो उन्हें एक पारिस्थितिक तंत्र की एक अविभाजित इकाई के रूप में इंगित करता है| इसका इस अनुमान से भी कोई मतलब नहीं है कि उनमें क्रूर (जंगली) चरित्र (व्यवहार) या प्रकृति है| यह मात्र एक परिस्थिति को बताता है जिसमें वे मनुष्य के साथ सम्बद्ध हैं|
जो लोग इन जानवरों की स्थिति के प्रति चिंतित हैं वे कभी-कभी अन्य शब्द इस्तेमाल करते हैं| “जंगली जानवरों की मदद” एक शब्द है जो उनके इलाज के प्रयासों को इंगित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है| शब्द “जंगली जानवरों का कल्याण” (वाइल्ड एनिमल वेलफेयर) का इस्तेमाल वर्णनात्मक रूप में उनकी भलाई के दृष्टिकोण से उनकी स्थिति के लिए किया गया है|4 हालाँकि, ध्यान दें, “वाइल्ड एनिमल वेलफेयर) कई विभिन्न प्रकार से इस्तेमाल किया गया है|5
एक तरीका अघरेलू जानवरों की भलाई के प्रति स्थिति की ओर इंगित करता है|
दूसरा, क़ैद में अघरेलू जानवरों को रखे जाने के तरीकों को नियमित रखने के बारे में है|
और अंत में, “वाइल्ड एनिमल वेलफेयर” शब्द उस विज्ञान की ओर इंगित करने के लिए इस्तेमाल किया गया है जो अघरेलू जानवरों की भलाई की जांच करता है|
इस वजह से, हल्के रूप में यहाँ असमंजस की सम्भावना है, क्योंकि यह शब्द अक्सर क़ैद में रहने वाले अघरेलू जानवरों को इंगित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है|
अंततः, शब्द (कल्याणकारी जीव विज्ञान) एक प्रस्तावित क्षेत्र के अध्ययन के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो सभी जानवरों की भलाई की जांच करता है, ख़ासतौर से उनकी जो मानवीय नियंत्रण के बाहर रहते हैं| यह प्रारम्भिक रूप से, हालाँकि आवश्यक रूप से नहीं, जंगली जानवरों की पीड़ा का अध्ययन करता है| अधिक तकनीकी रूप में, यह उनकी सकारात्मक और नकारात्मक भलाई के सापेक्ष संवेदनशील जीवित प्राणियों के अध्ययन के रूप में परिभाषित हो सकता है|6 कल्याणकारी जीव विज्ञान पार-अनुशासनिक क्षेत्र हो सकता है जो जंगली जानवर कल्याणकारी विज्ञान के साथ पारिस्थितिकी विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान में अन्य क्षेत्रों को शामिल करता है| जंगली जानवर कल्याणकारी विज्ञान जानवरों के व्यवहार, शरीर विज्ञान और अन्य संकेतों को ध्यान में रखते हुये उनकी भलाई की जांच कर सकता है| अन्य क्षेत्र जैसे पारिस्थितिकी विज्ञान इस प्रभावित करने वाले बाहरी कारकों की जांच कर सकता है| कल्याणकारी जीव विज्ञान के पास वास्तव में जंगली जानवरों की मदद करने और जो पीड़ा वे सहते हैं उससे उन्हें बचाने की दिशा में नीतियों को सूचित करने की क्षमता है|
1 Bruinsma, J. (संपा.) (2003) विश्व कृषि: 2015/2030 की ओर। एफएओ दृष्टिकोण, लंदन: अर्थस्कैन, पृ. 124-157 [15 नवंबर 2019 को अभिगमित]।
2 Potapov, P.; Laestadius, L.; Yaroshenko, A. एवं Turubanova, S. (2009) वन परिवर्तन की सीमा का वैश्विक मानचित्रण और निगरानी: अछूते वन परिदृश्य की विधि, रोम: वन संसाधन मूल्यांकन; Potapov, P.; Hansen, M. C.; Laestadius, L.; Turubanova, S.; Yaroshenko, A.; Thies, C.; Smith, W.; Zhuravleva, I.; Komarova, A.; Minnemeyer, S. एवं Esipova, E. (2017) “वाइल्डरनेस की अंतिम सीमाएँ: 2000 से 2013 तक अछूते वन परिदृश्यों की हानि का ट्रैकिंग”, साइंस एडवांसेज़, 3 (1) [16 नवंबर 2019 को अभिगमित]।
3 Hadidian, J. एवं Smith, S. (2001) “शहरी वन्यजीव”, में Salem, D. J. एवं Rowan, A. N. (संपा.) द स्टेट ऑफ द एनिमल्स 2001, वाशिंगटन, डी.सी.: ह्यूमेन सोसाइटी प्रेस, पृ. 165-182; Michelfelder, D. P. (2018) “शहरी वन्यजीव नैतिकता: ‘समानांतर विमानों’ से परे”, एनवायरनमेंटल एथिक्स, 40, पृ. 101-117।
4 उदाहरण के लिए देखें Kirkwood, J. K.; Sainsbury, A. W. एवं Bennett, P. M. (1994) “स्वतंत्र रूप से रहने वाले वन्य जानवरों का कल्याण: मूल्यांकन के तरीके”, एनिमल वेलफेयर, 3, पृ. 257-273; Harrop, S. R. (1997) “वन्य पशु कल्याण कानून की गतिशीलता”, जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल लॉ, 9, पृ. 287-302; Kirkwood, J. K. (2013) “वन्य पशु कल्याण”, एनिमल वेलफेयर, 22, पृ. 147-148; JWD वाइल्डलाइफ वेलफेयर सप्लीमेंट संपादकीय बोर्ड (2016) “स्वतंत्र रूप से रहने वाले जानवरों के लिए पशु कल्याण में प्रगति”, जर्नल ऑफ वाइल्डलाइफ डिज़ीज़ेज़, 52, पृ. S4-S13।
5 देखें Haynes, R. P. (2008) एनिमल वेलफेयर: प्रतिस्पर्धी धारणाएँ और उनके नैतिक निहितार्थ, डॉर्ड्रेख्ट: स्प्रिंगर। कभी-कभी “एनिमल वेलफेयर” शब्द का प्रयोग पशु समर्थकों द्वारा उस दृष्टिकोण के लिए किया जाता है कि यदि पशुओं को पहुँचाए जाने वाले कुछ नुकसान अत्यधिक न हों तो वे स्वीकार्य हैं—देखें Francione, G. L. (1995) एनिमल्स, प्रॉपर्टी एंड द लॉ, फिलाडेल्फिया: टेम्पल यूनिवर्सिटी प्रेस; (2000) इंट्रोडक्शन टू एनिमल राइट्स: योर चाइल्ड ऑर द डॉग?, फिलाडेल्फिया: टेम्पल यूनिवर्सिटी प्रेस। इस दृष्टिकोण के अनुसार, कुछ ऐसे पशु उपयोग जो उनके लिए हानिकारक हो सकते हैं, स्वीकार्य हैं यदि उस उपयोग के लिए आवश्यक माने जाने वाले नुकसान को न्यूनतम कर दिया जाए। यह अर्थ उन अन्य अर्थों से भिन्न है जिन्हें हमने यहाँ देखा है। अब तक हमने जो कहा है, और पुस्तक के शेष भाग में, इस अन्य प्रश्न से संबंधित नहीं है, और न ही इस दृष्टिकोण के समर्थन में कोई रुख अपनाने का संकेत देता है।
6 Ng, Y.-K. (1995) “वेलफेयर बायोलॉजी की ओर: पशु चेतना और पीड़ा का विकासवादी अर्थशास्त्र”, बायोलॉजी एंड फिलॉसफी, 10, पृ. 255-285; साथ ही देखें Carpendale, M. (2015) “बायोलॉजी का विस्तार के रूप में वेलफेयर बायोलॉजी: य्यू-क्वांग एनजी के साथ साक्षात्कार”, रिलेशंस: बियॉन्ड एंथ्रोपोसेन्ट्रिज़्म, 3, पृ. 197-202 [17 अक्टूबर 2019 को अभिगमित]; Faria, C. एवं Horta, O. (2019) “वेलफेयर बायोलॉजी”, में Fischer, B. (संपा.) रूटलेज हैंडबुक ऑफ एनिमल एथिक्स, न्यूयॉर्क: रूटलेज, पृ. 455-466।