हमने जंगल में जानवरों के विभिन्न तरीकों से हानि हो सकने के तरीकों को ध्यान में रखा है| जंगल में रहने वाले जानवरों के लिए शारीरिक चोटें सबसे सामान्य भय है| कुछ मामलों में, जानवर गंभीर चोटों से पीड़ित होते हैं जो उन्हें सीधे मार देती हैं| अन्य मामलों में, उनकी चोटें उन्हें इस तरीके से प्रभावित कर सकती हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से घातक हैं, उदाहरण के लिए, भोजन खोजने या शिकारियों से बचने की उनकी क्षमता घटा कर| यदि जानवर अपनी चोटों से ना मरें तो भी, उन्हें दीर्घकालिक दर्द हो सकता है, खासतौर से तब जब उनके घाव ठीक तरह से भर नहीं जाते|
बड़े पैमाने पर कहें तो, हम चोट के कारणों को तीन मुख्य भागों में बाँट सकते हैं: अन्य जानवरों के साथ द्वंद्व, गंभीर मौसम और प्राकृतिक आपदा द्वारा लगने वाली चोट, और दुर्घटना| पिछले वीडियो में, हम अन्य स्रोतों द्वारा होने वाली चोटें देख चुके हैं| यहाँ हम देखेंगे कि दुर्घटना में जानवर कैसे चोटिल हो सकते हैं|
जंगल में रहने वाले जानवर अपने दैनिक जीवन में चोटों से ग्रसित होते हैं| कई दुर्घटनाएं गिरने, कोठारों या बिलों के ढ़हने, या फंस जाने के कारण होती हैं| पक्षी पेड़ों से टकरा जाते हैं, हाथी दलदल में फंस जाते हैं, हिरण नीचे झूलने वाली टहनियों से अपनी आँखें फोड़ लेते हैं, और गिलहरियाँ पेड़ों से गिर जाती हैं| अकशेरुकी अपने उपांग ( शरीर से अलग निकले अंग ) फंसा लेते हैं और केंचुली उतारने में शरीर के अंग खो देते हैं|
कई जानवर दुर्घटना -जन्य संबंधित ट्रौमा के कारण कुचलने वाली चोटें झेलते हैं| कुचलना अक्सर तब होता है जब एक इकाई ज़मीन और एक कठोर वस्तु के बीच आ जाती है, अक्सर एक चट्टान या एक बड़ा जानवर| उदाहरण के लिए, चट्टानें या पेड़ की शाख़ें एक जानवर पर गिर सकती हैं| कुछ जानवर अनजाने में छोटे जानवरों पर चढ़ जाते हैं| नर पेंगुइन प्रदर्शन के दौरान ग़लती से एक बच्चे को कुचल सकते हैं, जिससे आतंरिक चोट लग सकती है| कुचलने से होने वाले घाव का प्रकार और मात्रा लगने वाले बल की मात्रा पर निर्भर करता है, जिससे छोटी चोटों से लेकर गंभीर आघात, अस्थि विखंडन, और आतंरिक अंगों के टूटने तक कई चोटें हो सकती हैं|1
कशेरुकी जानवर रीढ़, सिर और गर्दन, जोड़, जबड़ा, पंख, कवच, या सींग में हड्डियों में कई प्रकार के अस्थि-विच्छेद से पीड़ित हो सकते हैं| रीढ़, जोड़, और पंखों में होने वाले अस्थि विच्छेदन सामान्य हैं और ये घातक हो सकते हैं|2 पक्षी और गिलहरियाँ कभी-कभी पेड़ों से गिर जाती हैं और अपने पैर या पीठ तोड़ लेते हैं| कठिन क्षेत्रों को पार करने की कोशिश के दौरान भी घायल हो सकते हैं| एक हिरणी नदी में पानी पीने के लिए नीचे जाने की कोशिश में गीले पत्थर पर फ़िसल के अपना पैर तोड़ सकती है|3
अक्सर बड़ी संख्या में, दरियाई घोड़ों को ढ़लानों पर से गिरते हुए देखा गया है| दरियाई घोड़े अक्सर आराम करने के लिए ज़मीन की ओर बढ़ते हैं, और कभी-कभी जब समुद्र तट भीड़ से भरे होते हैं तो वे हलकी ढ़लानों पर चढ़ते हैं, जिनके दूसरी ओर ढलानें होती हैं| वहां पहुँचने पर वे ध्रुवीय भालू से डर सकते हैं, या वे सीधे अपना नियंत्रण खो सकते हैं जब वे समुद्र की ओर लौटते हैं|4
कच्छप या कछुवे गिरने से अपने कवच तुड़वा सकते हैं, किसी चीज़ से टकरा, या दूसरे जानवर द्वारा कुचले जा सकते हैं| बड़े अस्थि-विच्छेद काफ़ी गंभीर हो सकते हैं| कछुवे का कवच पीठ की हड्डी की तरह होता है, और एक कछुवे को पक्षाघात या फेफड़ा ख़राब हो सकता है, दरार पर निर्भर करते हुए| यदि अस्थि-विच्छेद गहरा हो तो वहां खून भी बह सकता है| सड़े कवच में दरार के नीचे फंगस या जीवाणु संक्रमण हो सकता है| जलीय जानवर कवच सड़ने के प्रति ख़ासतौर से संवेदनशील होते हैं| कवच के अन्दर या आसपास नसें होती हैं, इसलिए टूटी हड्डी के कारण यह दर्दनाक हो कर दर्द का कारक हो सकता है| कुछ का टूटना ठीक नहीं हो सकता, और जो हो सकते हैं वे बहुत धीरे होते हैं| उनकी धीमी उपापचय के कारण, एक टूटे कवच को ठीक होने में सालों लग सकते हैं|
सींगें भी हड्डी से बनी होती हैं और उनसे खून बह सकता है| यदि जड़ के पास (से) उखड़ेगा तो, त्वचा भी उखड़ेगी|
पक्षियों के पैर आसानी से टूट जाते हैं क्योंकि (वे) छोटे और अक्सर खोखले होते हैं| कुपोषण और बड़े अंडे देने के कारण वे भी नाज़ुक हो सकते हैं| पैर टूटने के सामान्य कारण गिरना, लड़ाइयाँ, दुर्घटना, अन्य जानवरों के साथ अचानक टकराना, या एक बड़े जानवर का उन पर अचानक चढ़ जाना हैं| उड़ने वाले पक्षियों की हड्डियों का ये पतलापन उन्हें उड़ने में मदद करता है, किन्तु उनकी हड्डियों को टूटने या चटखने के प्रति और भी प्रवृत्त बनाता है|5
टकराहट या लड़ाइयों से चोंच टूट सकती है| पक्षी किसी चीज़ में फंस कर भी अपनी चोंच तोड़ सकते है| यदि यह परेशान हो और ख़ुद को लपेट ले, तो वह अपनी चोंच तोड़ सकते है| चोंच त्वचा से ढंके केराटिन से बने होते हैं (उसी चीज़ से जिससे हमारी उँगलियों के नाखून बने हैं)| चोंच हड्डियों से जुड़ी होती है, और चोंच का छोर नसों और रक्त वाहिनियों से जुड़ा होता है| पक्षी अपनी चोंच का इस्तेमाल ना केवल मुंह के रूप में करते हैं बल्कि चीज़ों को पकड़ने के लिए हाथ के रूप में भी| यदि एक पक्षी की चोंच घायल हो जाए तो हो सकता वह खाने, पीने घोंसला बनाने और ख़ुद का बचाव कर पाने में असमर्थ हो| कुछ टूटना रक्तस्राव के कारण होते हैं, और कुछ मामलों में टूटी चोंच के कारण खून बहने से मृत्यु हो सकती है| घायल चोंच सांस लेने में परेशानी और श्वसन परेशानियाँ भी पैदा कर सकती हैं| चोंच ख़ुद की मरम्मत नहीं कर सकती लेकिन चोटिल हिस्सा ख़ुद को बढ़ा सकता है| नोंक नियमित रूप से इस्तेमाल होने के कारण बढती रहती है लेकिन नोंक से दूर कोई चोट लगने पर यह स्थायी रूप से बिगड़ सकती है| एक घायल पक्षी केवल नर्म भोजन करे ऐसा हो सकता है लेकिन जंगल में उसका जीवित बचना कठिन होगा|6
चमगादड़ और कीटों के पंख वस्तुओं, पौधों, काँटों, या फंगस संक्रमण से झड़ सकते हैं| चमगादड़ के पंखों का उखड़ना गंभीर बीमारी हो सकती है और यह रक्त में कमी की ओर ले जा सकती है|7 पंखों का उखड़ना अपने आप ही ठीक हो सकता है, टेढ़े पंख उड़ने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, कभी-कभी साथ उड़ने से रोकते हैं| जानवरों को भी आराम करने और ठीक होने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और जब वे ठीक हो रहे होते हैं, तब वे भूख और अन्य भयों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं|
प्रकृति में जानवरों को बाहरी वस्तु, घाव, या धुएं के कारण आँखों में घाव हो सकते हैं| एक सामान्य तरीका जिससे एक पक्षी को आँखों में चोट लग सकती है वह है टहनियों के बीच दौड़ना| क्योंकि कई जानवर, शिकारियों और अन्य भय से भागने के लिए जंगल में दौड़ते हैं, कई नीचे झूलती हुई टहनियों में दौड़ते हैं| जबकि आमतौर पर यह केवल एक आँख को ही प्रभावित करता है, कोई भी स्थायी खराबी या दृष्टि का खोना जानवर को भविष्य में अन्य हानियों के प्रति नाज़ुक बना सकता है| उदाहरण के लिए, यह एक हिरण, या एक मृग के साथ हो सकता है|
उड़ने वाले जानवरों को एक लाभ है क्योंकि यहाँ थोड़ी ही चीज़ें हैं जिनमें उन्हें दौड़ना है| हालाँकि, पक्षी प्रारंभिक जीवन काल में पेड़ों से गिर कर, या उड़ान भरने के दौरान टहनियों में दौड़ कर अपनी आँखें घायल कर सकते हैं| वे उड़ने के दौरान अन्य पक्षियों से टकरा कर भी घायल हो सकते हैं| आँखों की चोट जो ठीक नहीं होती है पक्षी की उड़ने की क्षमता को कम कर सकती है|
पलकों की चोटें, जैसे खींचना या फटना, अक्सर गिरने या किसी चीज़ में दौड़ने से होती हैं| पलकें जानवर के शरीर का एक नाज़ुक हिस्सा हैं| यह आसानी से ख़राब हो सकता है और यदि यह अच्छी तरह से ठीक ना हो तो, यह दृष्टि हानि या संक्रमण की ओर ले जा सकता है| रेत, घास, या अन्य बाहरी चीज़ों का आँखों में फंस जाना कई जानवरों के लिए बहुत दर्दनाक हो सकता है, जो उन्हें बाहर निकालने की कोशिश में ख़ुद को घायल कर सकते हैं|8
जोड़, पंख, और स्पर्श-सूत्र जैसे उपांग दुर्घटना या उड़ानों में सीधे जा सकते हैं, किन्तु कई जानवर उपांग स्व-विच्छेदन द्वारा खो देते हैं| ख़तरे के दौरान ऑक्टोपस अपने हाथ, छिपकली अपनी पूँछ, और मकड़ी अपने पैर विच्छेदित कर देती है, आमतौर पर अन्य जानवरों के साथ उड़ान के समय, अपने उपांग फंस जाने या अटक जाने पर, डंक से विष को उनके शरीर में फैलने से रोकने के लिए, या निर्मोचन की खामियों में| यदि यह ख़तरनाक स्थिति से बचने के लिए नहीं किया गया है, तो स्व-विच्छेदन एक चोट से होने वाला दर्द या शरीर के एक बेकार अंग को हटाने का प्रयास हो सकता है|9
एक जानवर के खोये हुए उपांग के प्रभाव का असर उपांग के प्रकार, उपांग का कार्य करना, और वातावरण पर निर्भर करता है|10 ऑक्टोपस और मकड़ी जैसे कुछ जानवर, अक्सर एक हाथ या पैर खो जाने पर ख़ुद को ठीक से व्यवस्थित करते हैं|11
एक क्रेफ़िश जो साल में सिर्फ एक बार निर्मोचन करती है बिना किसी पैर के रह सकती है, किन्तु एक पंजा या स्पर्श-सूत्र खोना अन्य जानवरों के साथ लड़ाई में उनके बचने या उनके वातावरण को खोजने और आवास ढूंढने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है| एक घायल अंग क्रिकेट जैसे कूदने वाले कीटों के लिए खासतौर पर नुकसानदायक हो सकता है|
कुछ कशेरुकियों में कुछ सम्पोषी क्षमता होती है, जैसे कि छिपकली जो अपनी पूँछ फिर से बढाती है, विभिन्न मछलियाँ जो अपने पंख पुनः बढ़ाती हैं, और सलामंदर जो अपने अंगों को फिर से बढ़ा सकते हैं| चमगादड़ अपने पंख और कान संपोषित कर सकते हैं और अपनी सींगें विच्छेदित कर सकते हैं| हालाँकि, फिर से उगा अंग छोटा या कमज़ोर हो सकता है, और अगर जानवर बहुत तनाव में है तो, वे अंग को संपोषित करने में असमर्थ हो सकते हैं|12
निर्मोचन संधिपादों में होने वाला चोट का एक सामान्य कारण है| यदि वे घायल नहीं हैं तो भी संधिपादों को निर्मोचन करना ज़रूरी है- खाल की बाहरी परत हटाना – बढ़ने के क्रम में, और फिर उनकी नई खाल मज़बूत और पुनर्निर्मित होगी, शरीर के अन्य भागों जैसे अंगों की परतों की तरह साथ में| हालाँकि वे निर्मोचन के दौरान बाह्य चोटों के प्रति संवेदनशील होते हैं और उनकी नई खालें अब भी नर्म होती हैं, जटिल निर्मोचन प्रक्रिया की कमी के कारण उनके मरने या चोटिल होने की सम्भावना अधिक होती है|13 वे शरीर के चोटिल हिस्सों को पुनः बढ़ाने में भी असफ़ल हो सकते हैं, आगे आने वाले निर्मोचन तक उन्हें कम क्रियाशील करते हुए, जो महीनों तक या कुछ मामलों में सालों तक हो सकता है| यह वृद्ध जानवरों के लिए बहुत बुरा है, जो अपनी उम्र के साथ कम दर से निर्मोचन करते हैं|
कुछ लार्वा अपनी खाल उतारने के दौरान सांस नहीं ले पाती और यदि इसमें लम्बा समय लगे या कुछ गलत हो जाए तो उनका दम घुट सकता है| अल्पायु मक्खी लार्वा निर्मोचन करने के पहले अतिरिक्त ऑक्सीजन लेती हैं क्योंकि वे अपने पीछे अपनी केंचुली छोड़ती हैं और निर्मोचन प्रक्रिया के दौरान सांस लेना बंद कर देती हैं| अन्य प्रजातियों में, सिर्फ अपनी त्वचा से बाहर आने में महीनों लग सकते हैं, और यदि वे फंस जाएँ, तो वे कुचले जा सकते हैं।14
निर्मोचन करते हुए संधिपाद अपने संवेदनशील अंग नोच सकते हैं जिस तरह से वे ख़ुद को खरोंचते हैं, अपने अंग खोते या मरोड़ते हुए, फेफड़े कुचलते हुए, या आँख या अन्य नर्म ऊतक घायल करते हुए| कुछ चोटें जीवन भर के आघात का कारण होती हैं| जानवर अपने या अन्य प्रजाति के जानवरों द्वारा आक्रमण किये जाने के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं जब वे निर्मोचन करते हैं| उदाहरण के लिए, निर्मोचन के ख़ास चरण के दौरान झींगा अन्य झींगों द्वारा चोटिल किये या मार दिए जाने के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं|
एक घायल जानवर बहुत दर्द और असहजता महसूस कर सकता है| दर्द जानवर को ख़तरनाक व्यव्हार की ओर भी ले जा सकता है, जैसे कि उन्हें भोजन या पानी लेने में कमी कराना, पेशियों में कमी, और तेज़ सांस लेना|15 ठीक होने और जीवित रहने के लिए भी वे पर्याप्त रूप से खाने या पीने में भी असमर्थ हो सकते हैं|
संक्रमण और सम्बंधित बीमारियों के कारण एक जानवर अन्य परेशानियों की एक श्रंखला से भी पीड़ित हो सकता है| चिकित्सकीय उपचार की अनुपस्थिति में, जंगल में संक्रमण एक प्राकृतिक सहयोजी है| खराब ऊतक पक्षाघात द्वारा संक्रमित हो सकते हैं|16 परजैविक संक्रमण अत्यंत दर्दनाक हो सकता है और अतिरिक्त परेशानियाँ जैसे दस्त, उल्टी, और देखने में परेशानी हो सकती हैं|
अंततः, चोट के अक्षम करने वाले प्रभाव – संक्रमण या परजैविक संक्रमण द्वारा ख़राब कर देना – कई महत्वपूर्ण मामलों में जानवर की भलाई को ख़तरे में डाल देना| महत्वपूर्ण रूप से, हो सकता है जानवर भयपूर्ण स्थिति से बचने या सामाजिक समूह के साथ रहने में समर्थ ना हो| घायल जानवर उनकी अपनी या अन्य प्रजाति के जानवरों द्वारा होने वाले एक आसान लक्ष्य भी बन जाते हैं|17
जंगल में रहने वाले जानवर भयानक शारीरिक चोटों की एक विस्तृत श्रेणी के प्रति संवेदनशील होते हैं| हमने देखा है कि इन चोटों के विभिन्न कारक हैं, अन्य जानवरों द्वारा दी गई चोटें और काटने से परेशान; आग, बर्फ़, मूसलाधार बारिश; गिरना, टकराना; और स्व-विच्छेदन और निर्मोचन दुर्घटनाएं| इन चोटों में से कई चोटें हल्की होतीं यदि घायल जानवर के पास ठीक होने के लिए और भोजन और आराम के लिए सुरक्षित स्थान होता, किन्तु जंगल में रहने वाले जानवरों की कई चुनौतियों के कारण यह अक्सर संभव नहीं है|
1 सेडॉन, पी. जे. और हीज़िक, वाई. वी. (1991) “अंडे से निकलने के क्रम, भाई-बहन की विषमताओं और घोंसले की जगह का जैकऐस पेंगुइन चूजों के जीवित रहने के विश्लेषण पर प्रभाव”, द ऑक, 108, पृ. 548-555।
2 बुलस्ट्रोड, सी.; किंग, जे. और रोपर, बी. (1986) “टूटे हुए हड्डियों वाले जंगली जानवरों का क्या होता है?”, द लैंसेट, 327, पृ. 29-31।
3 मॉरिस, पी. जे.; बिकनीज़, बी. और सदरलैंड-स्मिथ, एम. (2008) “वन भैंस (सिंकेरस कैफ़र नैनस) में पॉलीमेथिलमेथाक्रिलेट ड्रेसिंग से सींग और ललाट हड्डी के एव्ल्शन की मरम्मत”, जर्नल ऑफ़ ज़ू एंड वाइल्डलाइफ़ मेडिसिन, 39, पृ. 99-102।
4 लेट्ज़र, आर. (2019) “क्या जलवायु परिवर्तन वास्तव में वालरस को चट्टानों से कूदने के लिए मजबूर कर रहा है?”, लाइवसाइंस, 13 अप्रैल [प्राप्त: 8 सितम्बर 2019]।
5 बेनेट, आर. ए. और कुज़्मा, ए. बी. (1992) “पक्षियों में हड्डी टूटने का उपचार”, जर्नल ऑफ़ ज़ू एंड वाइल्डलाइफ़ मेडिसिन, 23, पृ. 5-38।
6 हार्वे, पी. (2010) “एवियन हताहत: वाइल्डलाइफ़ ट्रायेज”, वेट टाइम्स, 20 सितम्बर [प्राप्त: 7 सितम्बर 2019]।
7 खायात, आर. ओ. एस.; शॉ, के. जे.; डगिल, जी.; मेलिंग, एल. एम.; फेरीस, जी. आर.; कूपर, जी. और ग्रांट, आर. ए. (2019) “कॉमन पाइपिस्ट्रेल्स (पिपिस्ट्रेलस पिपिस्ट्रेलस) में पंख फटने का लक्षण निर्धारण: फटने का वितरण, पंखों की मजबूती और संभावित कारण”, जर्नल ऑफ़ मैमेलॉजी, 100, पृ. 1282-1294।
8 रिच्टर, वी. और फ्रीगार्ड, सी. (2009) मानक संचालन प्रक्रिया: जानवरों के लिए प्राथमिक उपचार, कैनबरा: पर्यावरण और संरक्षण विभाग [प्राप्त: 29 अगस्त 2019]।
9 काचरामानोग्लू, सी.; कार्लस्टेड्ट, टी.; कोल्ट्ज़ेनबर्ग, एम. और चोई, डी. (2011) “तंत्रिका क्षति के बाद रोगियों में आत्म-हानि डि-अफेरेंटेशन दर्द के कारण नहीं हो सकती: एक केस रिपोर्ट”, पेन मेडिसिन, 12, पृ. 1644-1648; एम्बर्ट्स, ज़ेड.; मिलर, सी. डब्ल्यू.; कीहल, डी.; सेंट मैरिया, सी. एम. (2017) “नुकसान कम करें: घायल अंगों का आत्म-विच्छेदन जीवित रहने की संभावना बढ़ाता है”, बिहेवियरल इकॉलॉजी, 28, पृ. 1047-1054।
10 अलुपे, जे. एस. (2013) ऑक्टोपस अब्डोपस अक्यूलेटस (ड’ऑर्बिग्नी, 1834) में भुजा ऑटोटॉमी का लक्षण निर्धारण, पीएचडी थीसिस, बर्कले: यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया [प्राप्त: 12 नवम्बर 2019]।
11 पार्ले, ई.; डिर्क्स, जे.-एच. और टेलर, डी. (2016) “अंतर को पाटना: कीटों में घाव भरना लक्षित क्यूटिकल जमाव द्वारा यांत्रिक शक्ति को बहाल करता है”, जर्नल ऑफ़ द रॉयल सोसाइटी इंटरफेस, 13 (117) [प्राप्त: 18 नवम्बर 2019]।
12 गॉस, आर. जे. (1987) “स्तनधारी पुनर्जीवित क्यों नहीं करते—या क्या वे करते हैं?”, फिज़ियोलॉजी, 2, पृ. 112-115; ब्रॉक्स, जे. पी. (1997) “उभयचर अंग पुनर्जनन: एक जटिल संरचना का पुनर्निर्माण”, साइंस, 276, पृ. 81-87; डारनेट, एस.; ड्रागालज़ेव, ए. सी.; अमारल, डी. बी.; सूसा, जे. एफ.; थॉम्पसन, ए. डब्ल्यू.; कैस, ए. एन.; लोरेना, जे.; पिरेस, ई. एस.; कोस्टा, सी. एम.; सूसा, एम. पी.; फ्रॉबिश, एन. बी.; ओलिविएरा, जी.; श्नाइडर, पी. एन.; डेविस, एम. सी.; ब्राश, आई. और श्नाइडर, आई. (2019) “अंग और पंख पुनर्जनन की गहरी विकासवादी उत्पत्ति”, यूएसए की राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की कार्यवाही, 116, पृ. 15106-15115।
13 माइक्ल्स, डी. एल. (2001) “डिकापोड क्रस्टेशियनों में अंग पुनर्जनन और मोल्टिंग के बीच अंतःक्रियाएँ”, इंटीग्रेटिव एंड कम्पेरेटिव बायोलॉजी, 41, पृ. 399-406; मैगिनिस, टी. एल. (2006) “जानवरों में आत्म-विच्छेदन और पुनर्जनन की लागत: एक समीक्षा और भविष्य के शोध के लिए रूपरेखा”, बिहेवियरल इकॉलॉजी, 17, पृ. 857-872।
14 यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया म्यूज़ियम ऑफ़ पैलियोन्टोलॉजी (2005) “मोल्टिंग के खतरे!”, अंडरस्टैंडिंग एवोल्यूशन [प्राप्त: 4 अक्टूबर 2019]।
15 नॉर्दर्न आयरलैंड. एक्ज़ीक्यूटिव इन्फ़ॉर्मेशन सर्विस (2015) “कुत्तों का कल्याण: दर्द और बीमारी से सुरक्षा”, एनआईडायरेक्ट [प्राप्त: 3 मार्च 2019]।
16 फ्रांसेस्कोनी, एफ. और लुपी, ओ. (2012) “मायासिस”, क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी रिव्यूज़, 25, पृ. 79-105 [प्राप्त: 14 अगस्त 2019]।
17 कुरियो, ई. (1976) शिकार का एथोलॉजी, बर्लिन: स्प्रिंगर; मार्टिन, जे.; डी नेवे, एल.; पोलो, वी. और फर्गालो, जे. ए. (2006) “शिकार के प्रति स्वास्थ्य-निर्भर संवेदनशीलता असुरक्षित चिनस्ट्रैप पेंगुइन चूजों की बचाव प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती है”, बिहेवियरल इकॉलॉजी एंड सोशियॉबायोलॉजी, 60, पृ. 778-784; पेंटेरियानी, वी.; डेलगाडो, एम. एम.; बार्तोलोमेई, पी.; मैगियो, सी.; अलोंसो-आल्वारेज़, सी. और होलोवे, जे. (2008) “उल्लू और खरगोश: आसान शिकार के निकृष्ट व्यक्तियों पर शिकार”, जर्नल ऑफ़ एवियन बायोलॉजी, 39, पृ. 215-221।