Deer walking through a forest

हमें क्यों परिस्तितिक तंत्र के बजाय संवेदनशील प्राणियों को नैतिक महत्त्व देना चाहिए।

पर्यावरण विधो द्वारा इस पक्ष का बचाव किया जाता है कि प्रत्मिक तौर पर परिस्थितिकी तंत्र या बायोग्नोसिस कि परवाह करनी चाहिए । और हमें उनकी खातिर व्यक्तिगत त्याग के लिए तैयार रहना चाहिए । बायोकानोंसिस सारे जीवित चीजों का योग है । बायोकेनोसेस, अजीव संस्थाएं और उनके आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर बने इको सिस्टम कहते हैं । व्यक्तिगत जीवो का समूह और इको सिस्टम का समूह संवेदनशील जीवों से अलग है, सबसे बड़ा अंतर यह है कि व्यक्तिगत जीव संवेदनशील होते हैं ना कि इकोसिस्टम । इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) को ज्यादा जरूरी मानने का विचार भावुक जानवरों को ज्यादा प्रमुखता देने वाले विचार के समानांतर है । इसे हम इकोसेंट्रीसम कहते हैं ।

इस स्थिति का दार्शनिक आधार नैतिक समग्रता है । इस स्थिति के अनुसार, सबकी भलाई व्यक्तिगत हितों पर नैतिक पूर्णता लेता है । पर यहां ‘ अच्छाई’ को कैसे पहचान सकते हैं? एल्बो लियोपोल्ड ने प्रसिद्ध रूप से दावा किया था कि,” एक बात सही तब होगी जब वह जैविक समुदाय की अखंडता, स्थिरता और सुंदरता की रक्षा करे अन्यथा यह बात गलत होगी । “1 इसका मतलब यह है कि, एक बात गलत तब होगी जब वह उस पारिस्थितिकी तंत्र को बदल दे जिसकी वे हिस्सा हो ना कि तब जब वह व्यक्तिगत जानवरों को हानि पहुंचाए ।

 

इकोसेंट्रीज्म का क्या मतलब है?

हमें लग सकता है इकोसेंट्रीज्म का मतलब परिस्थितिकीतंत्र का आदर करना है क्योंकि इससे उसके निवासियों के हितों की रक्षा होती है । पर यह सच नहीं है । इकोसेंट्रीज्म के मुताबिक , हमें पारिस्थितिकीतंत्रों का आदर वैसे भी करना चाहिए, इस बात से स्वतंत्र होकर भी इससे उन में रहने वाले जानवरों के जीवन को नुकसान हो या फायदा । पारिस्थितिकतंत्रों की अखंडता, स्थिरता और सुंदरता कि बचाव करने वाले इस दृष्टिकोण का समर्थन इसलिए नहीं करते क्योंकि यह ‌संवेदनशील प्राणियों को लाभ पहुंचाता है बल्कि इसलिए क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र खुद में ही मूल्यवान है । इसका मतलब हमें पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता को बचाना चाहिए , चाहे उसके निवासियों की हानि हो या लाभ । इसके अलावा, यह विचार बताता है कि जब भी पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण पे कोई खतरा होता है, तो हमें मनुष्य और जानवरों के हितों की उपेक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए ।

 

पारिस्थितिक तंत्र प्रासंगिक क्यों नहीं है जबकि संवेदनशील होना है ।

जैसे कि प्रासंगिकता तर्क में देखा गया है , यह निर्धारित करते समय कि कोई व्यक्ति या कोई चीज सम्मान और सुरक्षा के योग्य है या नहीं, यह बात मायने रखता है कि वह हमारे कार्यों की वजह से सकारात्मक या नकारात्मक रूप में प्रभावित हो रहे हैं या नहीं, यह तभी संभव है जब वह व्यक्ति उस चीज के सकारात्मक या नकारात्मक भावों की अनुभूति कर सके । इस बात पर यह कह सकते हैं कि व्यक्तियों के अनुभव हो सकते है, जबकि पारिस्थितिकी तंत्र और बायोकेनोसिस के नहीं हो सकते ।

लॉरेंस जानसन ने तर्क दिया था कि पारिस्थितिकी तंत्र नैतिक रूप से महत्वपूर्ण हितों के साथ जीवित संस्थाएं हैं । क्योंकि मानव और अन्य जीवित संस्थाओं की तरह वे भी अपने जीवन प्रक्रियो के समग्र कामकाज में रुचि दिखाते हैं । 2 ये‌ बात भ्रामक है । भले ही यह सच है की भावुक प्राणी भी ऐसी रुचि दिखाते हैं ,‌ वह केवल अप्रत्यक्ष रूप में हैं जहा उनके सकारात्मक अनुभव उनके जीवन की एकीकृत कामकाज बनाता है । यदि हमसे सकारात्मक रहने की क्षमता को छीन लिया जाए( यदि कोमा में चले गए), भले ही हमारे जीवन प्रक्रिया अपरिवर्तित रहे, फिर भी हम मे हमारि जीवन को जारी रखने की रुचि गायब हो जाएगी । अनुभवों के बिना जीवन असंवेदनशील, अचेतन होगा जहां सारी मूल्यवान पाठ अनुपस्थित होती हैं । ऐसी इकाई जिसमें सकारात्मक या नकारात्मक अनुभव नहीं हो सकते वह एक नैतिक रुप में पर्याप्त इकाई नहीं हो सकती ।

 

संवेदनशील प्राणियों को हानि पहुंचाना

हलाकि सकारात्मक और नकारात्मक अनुभवों को ध्यान में रखने और इस तरह संवेदनशील इकाईयो को महत्त्व देने वाले नैतिक विचार के लिए अस्वीकार्य है । ऐसे अस्वीकृत उदहारण कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं में पारिस्थितिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है जो कई गैर मानवीय जानवरों को बहुत नुकसान पहुंचाते हुए पर्यावरण में संतुलन लाते हैं । इस तरह के हस्तक्षेप अक्सर होते हैं । परिस्तितिक तंत्र कि सुधार योजनाए और तथा गथित “हमलावर प्रजातियों ” कि पर्यावरणीय व्यवस्ता से गिरे कई उदहारण पाए जा सकते हैं । 3

बायोटिक समुदाय की स्थिति को ध्यान में रखते हुए कल्पना करें कि वर्तमान में एक पौधे के अस्तित्व को तथाकथित हिरणों द्वारा खतरा है । एक पारिस्थितिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो, पारिस्थितिक तंत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए , (उस पौधे के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए) हिरणों की आबादी को कम करना चाहिए । 4 अर्थात, हमें प्राकृतिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करके भावुक व्यक्तिगत जानवरों को मारकर पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता बनाई रखनी चाहिए ।

इस दृष्टिकोण के अनुसार पर्यावरण में हस्तक्षेप करके जानवरों को हानि पहुंचाना गलत नहीं है, जिसका कारण यह नहीं है कि पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता अन्य भावुक प्राणियों के जीवन के लिए यंत्रवत् रूप से अच्छी हो सकती है बल्कि इसलिए क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता अपने आप में अच्छी है ।

 

इकोसेंट्रीसम की अनियमितता और मानव केंद्रवाद की अधीनता

इस अभिप्राय से यह व्यक्त होता है कि प्रकृति में हस्तक्षेप करके प्राकृतिक तंत्र के खातिर संवेदनशील प्राणियों को हानि पहुंचाना गलत नहीं है । हालांकि जब मनुष्य द्वारा प्राकृतिक तंत्र को हानि पहुंचाने की बात आती है तब इस पक्ष के रक्षक मानव उन्मूलन को निर्धारित नहीं करते । इसका यह मतलब है कि इकोसेंट्रीसम को समर्थन करने वाले उसके परिणामों को अमानुष्य जाति के लिए स्वीकार करते हैं पर मानव जाति के लिए नहीं । यह विरोधाभास है क्योंकि मानव प्रजाति पारिस्थितिक तंत्र पर सबसे बड़ा प्रतिकूल प्रभाव डालने वालों में से है । इस विचार के रक्षक यह यकीन करते हैं कि मानव हितों को परिस्थितिकी प्रणालियों की स्थिरता के संरक्षण अहमियत देनी चाहिए । इसकी मदद से चौथी समस्या को देख सकते हैं जो दो गुना है । एक ओर समग्र सिद्धांतों और परिस्थितिक वादी प्रथाओं के बीच एक असंगति है । यदि संपूर्ण (सभी) का हित व्यक्तिगत घटकों की इच्छाओं से महत्त्वपूर्ण है, तो यह निर्दिष्ट करता है कि, द्वंद्व की स्थिति में, पारिस्थितिक तंत्र की ख़ातिर मनुष्य की इच्छाओं की उपेक्षा होनी चाहिए । हालांकि जब भी परिस्थितिक तंत्र का हित मानव हितों के साथ टकराता है तब सभी परिस्थितिकीय, मानव हितों का पक्ष लेते हैं । 5 यह स्पष्ट रूप से विरोधाभास है । यदि हम मानवीय हितों को प्राथमिकता देते हैं तो हम परिस्थितिकी दृष्टिकोण को बनाएं नहीं रखते हैं ।

इस असंगति की सफाई इसकी मानव केंद्रितता देता है । [ ध्यान दें कि मानव केंद्रितता इस असंगति की प्रतिपादन करता है, लेकिन यह इस दृष्टिकोण को उचित नहीं ठहराता । इस असंगति की तरफ नेतृत्व करने की वजह यह है कि पर्यावरणविदों ने इन संघर्षों के बीच, मान लेते हैं कि मानव रुचि को नैतिक विचार विमर्श में प्राथमिक महत्व देनी चाहिए । जिसका मतलब है कि वे सब की भलाई को गंभीरता से लेने से इनकार करते हैं । अन्यथा, हमें सब की भलाई के लिए मानवों की बलिदान को स्वीकार करना होगा, ठीक उसी तरह जैसे हम इसे जानवरों के मामले में स्वीकार करते हैं । 6

इस स्थिति की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि वह मनुष्य और गैर मानव के बीच की प्रासंगिक रेखा को नैतिक रूप से सही ठहराने में विफल रहता है और यह मानव हितों की केंद्रीयता के खिलाफ सवाल उठाता है ।

जांच के दायरे में , वास्तव में इकोसेंट्रीसम मानव केंद्र बाद का एक रूप बन जाता है और असल में यह उसका एक रूप होता है ।

 

पारिस्थितिक तंत्र हर समय बदल रही है : एक अलग तरह के हस्तक्षेप की जरूरत है

अंत में , हमें यह ध्यान में रखना है कि परिस्थितिकी तंत्र कई पारिस्थितिक कारणों के वजह से बदल रहा है । यह पूरे प्राकृतिक इतिहास में लगातार होता आ रहा है । इसके बाद आने वाले परिणाम यह है कि पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता तब तक नहीं बनाई जा सकती जब तक हम इसके कामकाज में महत्वपूर्ण रूप से हस्तक्षेप नहीं करते हैं । जैसे कि हमने देखा , कई पारिस्थितिकी नियम वास्तव में हस्तक्षेप करती है लेकिन यदि हम हस्तक्षेप करने की सोचेंगे तो हमारे लक्ष्य परिस्थितिक तंत्र की संरक्षण से अलग होनी चाहिए ।

हम अभी प्रकृति में हस्तक्षेप करके जानवरों को हानि पहुंचाकर, पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण करके उनमें परिवर्तन आने से रोक रहे हैं । इसके बजाय, हमें ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे प्रकृति में रहने वाले संवेदनशील प्राणियों को लाभ हो । प्रकृति में कई कठिनाइयों के वजह से आमतौर पर जानवर पीड़ित होते हैं, इन संवेदनशील प्राणियों के खातिर पर्यावरण में हस्तक्षेप करना फायदेमंद हो सकता है जो कि पर्यावरण में हस्तक्षेप करके जानवरों को इकोसेंट्रीज्म के आधार पर हानि पहुंचाने का विपरीत होगा क्योंकि इकोसेंट्रीसम के लक्ष्यों में संवेदनशील प्राणियों को ध्यान में नहीं लिया जाता ।


आगे की पढ़ाई

Baxter, B. H. (1996) “Ecocentrism and persons”, Environmental Values, 5, pp. 205-219.

Callicott, J. B. (1989) In defense of the land ethic: Essays in environmental philosophy, Albany: State University of New York Press.

Callicott, J. B. (1999) Beyond the land ethic: More essays in environmental philosophy, Albany: State University of New York Press.

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Fieser, J. (1993) “Callicott and the metaphysical basis of ecocentric morality”, Environmental Ethics, 15, pp. 171-180.

Fox, W. (1995) Toward a transpersonal ecology: Developing new foundations for environmentalism, Albany: State University of New York.

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Warren, M. A. (2000) Moral status: Obligations to persons and other livings things, Oxford: Oxford University Press.


नोट्स

1 Leopold, A. (1987 [1949]) A Sand County almanac, and sketches here and there, New York: Oxford University Press.

2 Johnson, L. E. (1993) A morally deep world: An essay on moral significance and environmental ethics, Cambridge: Cambridge University Press, p. 142.

3 Shelton, J.-A. (2004) “Killing animals that don’t fit in: Moral dimensions of habitat restoration”, Between the Species, 13 (4) [अभिगमन तिथि 30 जनवरी 2013 2013].

4 Rolston III, H. (1999) “Respect for life: Counting what Singer finds of no account”, Jamieson, D. (ed.) Singer and his critics, Oxford: Blackwell, pp. 247-268.

5 दो अपवाद है : Linkola, P. (2009) Can life prevail?: A radical approach to the environmental crisis, London: Integral Tradition; Pianka, E. R. The vanishing book of life on Earth [अभिगमन तिथि 11 जनवरी 2013].

6 Varner, G. (1991) “No holism without pluralism”, Environmental Ethics, 13, pp. 175-179.

7 Leopold, A. (1989 [1949]), op. cit., p. 135. Callicott, J. B. (1990) “The case against moral pluralism”, Environmental Ethics, 12, pp. 99-124; (2000) “The land ethic”, Jamieson, D. (ed.) A companion to environmental philosophy, Oxford: Blackwell, pp. 204-217.