जंगली जानवरों की पीड़ा पर वीडियो पाठ्यक्रम – पाट 4

जंगली जानवरों की पीड़ा पर वीडियो पाठ्यक्रम – पाट 4

 



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भूख और मानसिक पीड़ा

जंगली जानवरों में कुपोषण और भूख

अन्य महत्वपूर्ण कारक जो जानवरों के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, वह भोजन में कमी है| बहुत से जानवर लम्बे समय से भूख और कुपोषण से पीड़ित होते हैं, हालाँकि वे जीवित रहते हैं| अन्य भूख से मर जाते हैं| असल में, यह कहा जा सकता हैं कि जंगल में भूखमरी का सबसे सामान्य कारण सीधे तौर पर एक ऐसे वातावरण में जन्म लेना हैं जहाँ पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं है| दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, कभी भी जन्म लेने वाले अधिकतर जानवरों की यही स्थिति है| जानवरों की अधिकतर प्रजातियाँ बहुत बड़ी संख्या में पुनरुत्पादन करती हैं| उदाहरण के लिए, संधिपाद और मछलियाँ, अपने जीवनकाल में हज़ारों लाखों अंडे दे सकती हैं| इसका अर्थ है कि यदि बहुत से बच्चे जीवित बच जाएँ तो उनकी जनसँख्या नियंत्रण से बाहर हो सकती है| जनसँख्या स्थायी बने रहने के क्रम में प्रति अभिभावक केवल एक बच्चा युवावस्था तक बचे रह सकता है| बाकी मर जायेंगे| कुछ बच्चे अंडे से नहीं निकलेंगे, कुछ जानवर शिकारियों, भाइयों, और यहाँ तक कि अभिभावकों द्वारा जन्म के तुरंत बाद मार दिए जायेंगे, पर मौत के सबसे सामान्य रूपों में से एक है जन्म या अंडे से निकलने के तुरंत बाद भूखमरी| बच जाने वालों के लिए, यहाँ कई प्रकार की चुनौतियाँ और ख़तरे हैं जो आसानी से कुपोषण, भूखमरी, और प्यास की ओर ले जा सकते हैं|

माता-पिता प्रजनन के ठीक पहले और बाद अधिकतम ख़तरे पर होते हैं, जब उनकी ऊर्जा कम होती है और उनका वसा संचय 50% तक गिर जाता है| शिशु भी अधिक संवेदनशील हैं, उन प्रजातियों में भी जिनके कुछ बच्चे और देखभाल उपलब्ध है उनके शिशुओं के लिए| समय पूर्व उनकी माँओं से अलग किये गए युवा स्तनधारी उनके जीवित रहने के लिए आवश्यक भोजन मुश्किल से खोज पाते हैं| जब भोजन दुर्लभ होता है, तो एक माँ अपने बच्चों को पालने के लिए प्रयास में ख़ुद को भूखा रख सकती है| वैकल्पिक रूप से, वह अपने बच्चों को छोड़कर, उन्हें भोजन खिलाने या उन्हें स्तनपान कराने से मना कर सकती है| कभी-कभी कुपोषित जानवर दूध देने में असमर्थ होते हैं| इन हालातों में, बच्चे या तो घोंसलों या खोहों में भूखे रहते हैं या अकेले रहते हैं, जैसा कि अक्सर गिलहरियों के बीच देखा गया है| ग़ैर स्तनधारी प्रजनन और पालक बनने के दौरान भूखमरी के अधिकतम ख़तरे पर हो सकते हैं, जिस तरह से उनका वसा संचय घटता है और भोजन तक उनकी पहुँच गंभीर रूप से प्रतिबंधित होती है| उदाहरण के लिए सैलमन, अपने प्रजनन जगहों पर जाने के लिए एक थकाऊ यात्रा करते हैं, धारा के विपरीत तैरते और जलप्रपात पर छलांग लगाते हैं| इस काल के दौरान, वे भोजन नहीं करते| कुछ आगामी वर्ष में पुनः यात्रा करने के लिए बच जाते हैं, पर कई नहीं, जो अपनी अंतिम ऊर्जा पुनरुत्पादन करने में लगा देते हैं और इसके तुरंत बाद मर जाते हैं|

जानवर भी भूख के अनिरंतर और मौसमी समयकाल का सामना करते हैं| उदाहरण के लिए, हिरणों की कुछ प्रजातियाँ न तो सीतनिद्रा में जाते हैं न ही विस्थापित होते हैं, और बड़ी संख्या में हर शीत ऋतु में आवास और भोजन की कमी के कारण नियमित रूप से भूखे रहते हैं| कुछ क्षेत्रों में, समुद्री कछुओं की आधी से अधिक आबादी सर्दियों के दौरान मर सकती है, जब वे ठंड से सुन्न हो जाते हैं और इतने भ्रमित हो जाते हैं कि न तो खा पाते हैं और न ही इधर-उधर हिल-डुल पाते हैं।

भोजन के तनाव (संकट) में, स्तनधारी, पक्षी, और मछलियाँ पहले वसा का जमा किया हुआ हिस्सा खाते हैं और फिर पेशीय भाग खाना शुरू करते हैं ऊर्जा के आपातकालीन स्रोत की तरह, जो कि दुर्बल करने वाला हो सकता है और अंततः अंगों के क्षय के रूप में घातक हो सकता है| पलायन और सुप्तावस्था सामान्य ग्राह्य प्रतिक्रियाएं हैं, परन्तु उनके अपने ख़तरे हैं| पलायन में एक बहुत बड़ी ऊर्जा लगती है, और इसकी सफलता अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि पिछले बसंत और गर्मी में मौसम और भोजन की स्थितियां कितनी सार्थक थीं| शिथिल जानवर अब भी भूखमरी के प्रति संवेदनशील हैं, बीमारी और गर्मी या सर्दी से तनाव के साथ-साथ|

अकशेरुकी जानवर भूखमरी काल का सामना करने के लिए समान योजना अपनाते हैं, और कीटों सहित कई अकशेरुकियों ने ख़ुद को महीनों या यहाँ तक कि सालों तक बिना भोजन के रहना विकसित कर लिया है| अन्य पलायन करते हैं, किन्तु भूख से होने वाले तनाव और कुपोषण के कारण उनकी उड़ान भरने और उड़ने की क्षमता कम हो सकती है, जो मृत्यु की ओर ले जाती है|

जानवरों के साम्राज्य में, ऊर्जा के स्रोतों में कमी सामान्य है| भोजन में कमी के दौरान, पहले भूखे होने वाले जानवर वे हैं जिनमें वसा संचय कम होता है, जैसे कि जुवेनिल, जानवर जिन्होंने अपनी ऊर्जा बच्चे पैदा करने में खो दी है, जानवर जो पलायन करने में कमज़ोर हैं, और निम्न सामाजिक स्तर वाले जानवर जिनकी भोजन की उपलब्धता कम है|

भोजन की कमी नियमित रूप से भूखे होने और शिकार के कारण और भी बुरी है| ये दो चीज़ें किस तरह से सम्बंधित हैं? क्योंकि जानवर मारे जाने से बचते हैं, वे उन जगहों पर भोजन खोजने की कोशिश करते हैं जहाँ शिकारियों द्वारा उन पर होने वाले ख़तरे कम हों| उदाहरण के लिए, वे जंगली इलाकों में भोजन ढूंढते हैं जहाँ छुप सकते हैं बजाय कि खुले समतल में जहाँ शिकारी उन्हें अधिक आसानी से देख सकते हैं| जब उन जगहों में पर्याप्त भोजन नहीं होता जहां वे छुपते हैं, तो वे भूख और कुपोषण का सामना करते हैं| जब कुपोषण गंभीर हो जाता है, तो वे सुरक्षित इलाके छोड़ने लगते हैं, अपनी अतिसंवेदनशीलता (ख़तरा) बढ़ाते हुए|

प्यास

जंगली जानवरों में निर्जलीकरण (प्यास) उच्च मृत्यु दर के लिए अन्य मुख्य कारक (सहयोगी) है| यहाँ जल की कमी के दो आधारभूत तरीक़े हैं जो जंगली जानवरों को पीड़ित करते हैं और अक्सर वे दर्दनाक रूप से मर जाते हैं| पहला, सूखा पड़ने के समय, यहाँ जानवरों की बड़ी जनसँख्या के लिए पर्याप्त मात्रा में स्रोत उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उनमें से बहुत सारे प्यास से मर जाते हैं| दूसरा, कुपोषण के साथ, कुछ जानवर शिकारियों द्वारा संभावित खतरों के कारण जल ग्रहण करने में अनिच्छा प्रदर्शित करते हैं| वे सुरक्षित जगहों में छुपते हैं जहाँ या तो कम पानी है या नहीं है| अंततः प्यास जानवरों को उनकी पानी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए कई ख़तरे उठाने को बाध्य करती है| जब अंत में वे अपने छुपने की जगह छोड़ते हैं, तो वे काफ़ी दुर्बल होते हैं जिससे वे जल स्रोतों या खुली जगहों पर आसान शिकार बन जाते हैं| अन्य अपनी छुपने की जगहों पर तब तक रुकते हैं जब तक कि बहुत निर्जलीकृत (बहुत प्यासे) ना हो जाएँ जिससे वे हिलडुल नहीं सकते| इस तरह, वे जल तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं और वे प्यास से मर जाते हैं|1

अत्यंत प्यास एक भयानक अनुभव है| यह रक्त की मात्रा कम करके एक थकान का आभास पैदा करता है, और शरीर श्वसन और ह्रदय दर बढाकर पानी की कमी को पूरा करने का प्रयास करता है| इसके बाद सिर घूमना आता है और गिरना, और अंततः मौत|2

बीमारियाँ भी निर्जलीकरण की ओर ले जा सकती हैं| उदाहरण के लिए, मेंढ़क चित्रिड फंगस से संक्रमित हो सकते हैं जो उनकी त्वचा को बहुत मोटा कर देता है जिससे वे पानी और ज़रूरी पोषक तत्त्वों का अवशोषण नहीं कर सकते| चूँकि मेंढ़क प्रारंभिक रूप से अपनी त्वचा द्वारा जल ग्रहण करते हैं, यह आमतौर पर घातक है यदि उपचार ना हो| एक उपचार उपलब्ध है और संक्रमण का उपचार आसान है, किन्तु यहाँ अभी तक जंगल में मेंढ़कों की बड़ी जनसँख्या का उपचार करने का कोई तरीका नहीं है| उष्मागत तनाव जैसे अन्य कारणों द्वारा बीमारी और जटिल हो सकती है| उष्मागत तनाव निर्जलीकृत मेंढ़क की स्थिति को और बुरा कर सकती है, उस तापमान पर भी जो उन्हें जलयोजित (पानी से भरपूर) होने पर नुकसान नहीं पहुंचाता है|

इस समय, प्राधिकारी सूखे और भोजन में कमी से पीड़ित होने वाले जानवरों के तरीकों के प्रति उत्तरदायी हैं| कभी-कभी जान बूझकर भूखे जानवरों के प्रति आंकड़े पास होते हैं| उदाहरण के लिए, यह शहरी कबूतरों के साथ होता है|

जंगली जानवरों में मानसिक तनाव

जबकि घरेलू जानवरों में तनाव के प्रभाव ठीक तरह से एकत्रित किये जा चुके हैं, यहाँ जंगली जानवरों पर कुछ अध्ययन हुए हैं, और जंगली जानवरों को प्रभावित करने वाली कठिनता और तनाव कारकों की संख्या वैज्ञानिक अनुसन्धान द्वारा कम करके आंकी गई है,3 जंगली जानवरों पर कैद होने के प्रभावों को छोड़कर|

जंगली जानवरों को दैनिक रूप से विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जो कि तनाव भरा हो सकता है: शारीरिक ट्रौमा, बीमारी, भोजन में कमी, उनकी प्रजातियों या समूहों में दूसरों से द्वंद्व, गंभीर मौसमी परिस्थितियों या प्राकृतिक आपदाओं के कारण विस्थापन| वे ज़ोरदार और अनजानी आवाज़ों से भी डर सकते हैं| स्तनधारियों, पक्षियों, और संधिपादों में तनावकारी घटनाओं पर प्रतिक्रिया में जानवरों के पी टी एस डी जैसे लक्षण दिखने, मनोदशा और घबराहट विकार, और सामाजिक समूहों में नकारात्मक मनोदशा फैलने के साक्ष्य यहाँ मौजूद हैं| यहाँ हम सामाजिक जीवन के कई पहलुओं और बाह्य ख़तरे से सम्बंधित तनाव को सम्मिलित करेंगे|

बाह्य ख़तरों के कारण तनाव

अन्य जानवरों द्वारा हमला कर दिए जाने के ख़तरे के कारण होने वाला तनाव दो मुख्य रूपों में बढ़ता हुआ दिखता है| पहला सीधे द्वंद्व से ही है, जिसमें जानवर आवश्यक रूप से भागने या लड़ने का तनाव झेलते हैं| आमना-सामना काफ़ी तनाव भरा हो सकता है जिससे शिकार जानवर  तनाव से मर जाता है|4 दूसरा, शिकार जानवर जो भोजन संतुलित करने के लिए बाध्य हैं और मारे जाने के ख़तरे में हैं उनमें तनाव बढ़ सकता है| वे या तो भोजन के लिए घूमना कम करना या शिकारियों के प्रति सामने आने के ख़तरे के बारे में निर्णय लेते हैं|5 अक्सर जानवर, कम खाना चुनने में फंस के संभावनाओं को कम करते हैं| उन परिस्थितियों में, भूखमरी और निर्जलीकरण के कारण अतिरिक्त तनाव प्रतिक्रियाएं पैदा होना संभव है|

ख़ास मानवीय हस्तक्षेपों द्वारा यह और बुरा हो सकता है जो पारिस्थितिक-विषयक उद्देश्यों के लिए लाये गए हैं, जैसे कि संकटग्रस्त एक पौधे को बचाने के लिए एक क्षेत्र में शिकारियों का प्रवेश कराना| उदाहरण के लिए, बड़े शाकाहारियों (उदाहरण के लिए, एक एल्क या अन्य प्रकार का हिरण) को ख़ास भोजन खाने से रोकने के एक प्रयास में भेड़िये लाये गए| भेड़िये इन जानवरों को सिर्फ खाते ही नहीं, बल्कि उनकी उपस्थिति भी इनके चरने की आदत को बदलती है| खुली जगहों में चरने की बजाय, हिरण उन जगहों में छुपते हैं जहां भेड़िये उन्हें आसानी से देख ना सकें, और कम मात्रा में, कम पोषक तत्वों वाले पौधे खाएं| इससे होने वाली परिणामिक गतिकी को “पारिस्थितिकी का भय” कहते हैं|

सामाजिक जानवरों का तनाव

सामाजिक समूहों में रहना जानवरों को नुकसान पहुंचाता है, प्रारंभिक रूप से सामाजिक द्वंद्व और प्रतियोगिता के कारण| जानवरों की प्रजातियाँ जो सामाजिक और सहसामाजिक (जैसे क्रिकेट) हैं उनमें प्रभुत्व अनुक्रम है| हालाँकि पद के लिए बहुत सी लड़ाइयाँ पारंपरिक हैं, कुछ में वास्तविक हिंसा या जारी उत्पीड़न शामिल है| अनुक्रम में हर एक जानवर का जो सामजिक स्तर है वह नाटकीय रूप से उसकी भलाई के स्तर को प्रभावित करता है, खासतौर से जब यह तनाव-सम्बन्धी बीमारियों पर आता है| यह अच्छी तरह प्रमाणित हुआ है कि सामाजिक परतंत्रता, उदाहरण के लिए, एक तनावकारक को विभिन्न सामाजिक प्रजातियों में संचालित करता है, जैसे प्राइमेट, कृन्तक, और कुछ तरह की मछलियाँ| इन सामाजिक प्रजातियों के निचले स्तर के जानवरों में, तनावयुक्त प्रतिक्रियाएं और पुनरुत्पादक संभावनाओं में होने वाली कमी अक्सर देखी गई है|6

अन्य अधीनस्थ जानवर समूह में बने रहने के क्रम में त्वरित भय और धमकी का सामना कर सकते हैं| धमकी के सामान्य कारण भोजन की उपलब्धता और यौन प्रतियोगिता पर होते हैं, पुनरुत्पादन की अतिरिक्त ऊर्जा आवश्यकता के कारण अक्सर साथ में| प्रभावी नर प्रजनन का प्रयास करने वाले अन्य नरों पर आक्रमण कर सकते हैं, और उन बच्चों को मार सकते हैं जिन के अन्य पिता हैं, माताओं को शोक देते हुए, जो बाद में उनके साथ प्रजनन करने को बाध्य होती हैं|

मातृवंशीय समूहों में अधीनस्थ मादाएं नियमित भय और हानि का सामना कर सकती हैं, जिसमें प्रभावी मादाएं, अधीनस्थों की प्रजनन संभावनाओं और भोजन की उपलब्धता को नियंत्रित करने के क्रम में गुस्सा और भय का इस्तेमाल करती हैं| अधीनस्थ मादाओं के बच्चे भी प्रभावी मादाओं द्वारा मारे जा सकते हैं| वह अधीनस्थ को उसकी सेवा करने के लिए बाध्य कर सकती है, खासतौर से उसकी पुनरुत्पादक सफलता को आगे बढ़ने के लिए | यह मीर्कट समूहों में सामान्य है| जिन माताओं के बच्चे मार दिए गए थे वे प्रभावी मादा के बच्चों की देखभाल में मदद करेंगी या समूह से निकाल दी जायेंगी और अकेले जीवित रहने के लिए कोशिश करने की मुश्किलों का सामना करेंगी।

शोक मनाना

मातृ अलगाव के विपरीत प्रभावों के कारण होने वाले तनाव का कई सामजिक प्रजातियों में अध्ययन किया गया है| मातृ अलगाव का माता और बच्चे दोनों के शरीर विज्ञान और व्यवहार पर चिरस्थायी प्रभाव हो सकता है| अलगाव के बाद, क्रियाकलाप में कमी, शरीर झुका के चलना, तनावपूर्ण कारकों के कारण हुए अन्य बीमारी वाले व्यवहार प्रदर्शित करना माँ की सामान्य प्रतिक्रियाएं हैं| अपने बच्चे को खोने वाली माँ अपने मरे बच्चे को लेकर आसपास घूम सकती है या कई दिनों तक शरीर को छोड़ने से मना कर सकती है| यह नर वानर, पक्षियों, हाथियों, सेटासीन और कई अन्य जानवरों में देखा गया है|

अनाथ जानवर भय और अकेलेपन का सामना करते हैं| अपनी मांओं से अलग हुए शिशु अपने जीवन भर तनाव के प्रति बढ़ी हुई प्रतिक्रिया, और बीमारी का बड़ा ख़तरा प्रदर्शित करते हैं| जंगली जानवरों में यह सेटासीन, हाथियों, कृन्तकों, और नर-वानरों में देखा गया है, हालाँकि अन्य सामाजिक प्रजातियाँ भी समान प्रभाव अनुभव करने के लिए संभाव्य हैं|

मातृ अलगाव के प्रभावों के अलावा, यहाँ हाथियों, सेटासीन, कुत्ते पक्षियों, और अन्य जानवरों में परिवार के सदस्य या दोस्त के खोने पर शोक प्रदर्शित करने के कई लिखित मामले हैं|

गीस और बत्तख जैसे जानवर जीवनभर प्रजनन करते हैं और साथी के खोने पर दुखी होते हैं| एक शोक मनाता गूस वजन खोएगा, अपने झुण्ड से अलग होगा, और अधीन व्यवहार प्रदर्शित करेगा (और यदि वे पुनः साथी बनाएं, तो वह आमतौर पर दूसरा गूस होगा जिसने अपना साथी भी खोया है)|


 

टिप्पणियाँ

1 टी. एन. एन. (2010) “भूख और प्यास से जोधपुर में कई मृगों की मौत”, दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 4 जुलाई [24 फ़रवरी 2013 को अभिगमित]।

2 ग्रेगरी, एन. जी. (2004) पशु पीड़ा का शरीर-विज्ञान और व्यवहार, एम्स: ब्लैकवेल, पृ. 83।

3 देखें उदाहरण के लिए, डैंटज़र, आर. एवं मॉर्मेड, पी. (1983) “पालतू पशुओं में तनाव: पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता”, जर्नल ऑफ़ एनिमल साइंस, 57, पृ. 6-18; वीप्केमा, पी. आर. एवं वान एड्रिखेम, पी. डब्ल्यू. एम. (संपा.) (1987) पालतू पशुओं में तनाव का जीवविज्ञान: एक समग्र दृष्टिकोण, हिंगलॉ: क्लूवर एकेडमिक; ब्रूम, डी. एम. एवं जॉनसन, के. जी. (1993) तनाव और पशु कल्याण, हिंगलॉ: क्लूवर एकेडमिक; मोबर्ग, जी. पी. एवं मेंच, जे. ए. (2000) पशु तनाव का जीवविज्ञान: मूल सिद्धांत और पशु कल्याण के लिए निहितार्थ, न्यूयॉर्क: सीएबीआई।

4 मैककौली, एस.; रोवे, जे. एल. एवं फोर्टिन, एम.-जे. (2011) “’गैर-घातक’ शिकारी के घातक प्रभाव”, इकोलॉजी, 92, पृ. 2043-2048।

5 क्लिन्ची, एम.; ज़ैनेट, एल.; बूनस्ट्रा, आर.; विंगफ़ील्ड, जे. सी. एवं स्मिथ, जे. एन. एम. (2004) “भोजन और शिकारी दबाव के बीच संतुलन गीतपक्षियों में पुराना तनाव उत्पन्न करता है”, प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द रॉयल सोसायटी बी: बायोलॉजिकल साइंसेज़, 271, पृ. 2473-2479।

6 फ़ॉक्स, एच. ई.; व्हाइट, एस. ए.; काओ, एम. एच. एवं रसेल, डी. एफ. (1997) “एक सामाजिक मछली में तनाव और प्रभुत्व”, द जर्नल ऑफ़ न्यूरोसाइंस, 17, पृ. 6463-6469; कूल्हास, जे. एम.; डे बोअर, एस. एफ.; मीरलो, पी.; स्ट्रुब्बे, जे. एच. एवं बोहस, बी. (1997) “तनाव प्रतिक्रिया की समयगत गतिकी”, न्यूरोसाइंस एंड बायोबिहेवियरल रिव्यूज़, 21, पृ. 775-782; कूल्हास, जे. एम.; डे बोअर, एस. एफ.; डे रटर, ए. जे.; मीरलो, पी. एवं स्गोइफ़ो, ए. (1997) “चूहों और मूषकों में सामाजिक तनाव”, एक्टा फिज़ियोलोजिका स्कैंडिनेविका. सप्लीमेंटम, 640, पृ. 69-72; शिवर्ली, सी. ए.; लेबर-लेयर्ड, के. एवं एंटन, आर. एफ. (1997) “मादा साइनोमोल्गस बंदरों में सामाजिक तनाव और अवसाद का व्यवहार और शरीरविज्ञान”, बायोलॉजिकल साइकियाट्री, 41, पृ. 871-882; सापॉल्स्की, आर. एम. (2004) “मनुष्यों और अन्य जानवरों में सामाजिक स्थिति और स्वास्थ्य”, एनुअल रिव्यू ऑफ़ एंथ्रोपोलॉजी, 33, पृ. 393-418; एबॉट, डी. एच.; केवर्ने, ई. बी.; बर्कोविच, एफ. बी.; शिवर्ली, सी. ए.; मेंडोज़ा, एस. पी.; साल्ट्ज़मैन, डब्ल्यू.; स्नोडन, सी. टी.; ज़ीगलर, टी. ई.; बैंजेविक, एम.; गारलैंड, टी., जूनियर एवं सापॉल्स्की, आर. एम. (2003) “क्या अधीनस्थ हमेशा तनावग्रस्त होते हैं? प्राइमेट्स में कॉर्टिसोल स्तरों में रैंक भिन्नताओं का तुलनात्मक विश्लेषण”, हॉरमोन्स एंड बिहेवियर, 43, पृ. 67-82; सापॉल्स्की, आर. एम. (2005) “प्राइमेट स्वास्थ्य पर सामाजिक पदानुक्रम का प्रभाव”, साइंस, 308, पृ. 648-652।