Black horse walks in field with her child

प्रजाति (स्पीशीज़) अधिव्यापन के तर्क़

प्रजातिवाद के विरुद्ध दिये गए तर्क़ दर्शाते हैं कि यहां अमानुष जानवरों की उपेक्षा के लिए अलग – अलग तरीकों का बचाव किया गया है । पहला ये दावा करना कि हमें अमानुष जानवरों की फ़िक्र नहीं की करना है क्योंकि उनके पास कुछ ख़ास क्षमताएं नहीं हैं । ये क्षमताएं आम तौर पर बौद्धिक या बुद्धि से संबंधित हैं, जैसे कि भाषा का उपयोग और ज़िम्मेदारियां लेने की क्षमता । 1

अमानुष जानवरों की उपेक्षा को उचित ठहराने का दूसरा तरीका ये दावा करना है कि मनुष्य को केवल दूसरे मनुष्यों की फ़िक्र करनी चाहिए ना की जानवरों की क्योंकि मनुष्यों में एक – दूसरे के बीच ख़ास संबंध हैं, और उनका दूसरे जानवरों से कोई ख़ास संबंध नहीं है, या उनके साथ जो भी संबंध हैं वे मनुष्यों के साथ साझा हुए संबंधों से अलग है । उदाहरण के लिए, यह तर्क़ किया गया है कि मनुष्य दूसरे मनुष्यों से प्रेम करते हैं और उनका एक – दूसरे के साथ सहानुभूति या एकुटता का संबंध है, लेकिन उनका ये संबंध दूसरे जानवरों के साथ नहीं है और यही उन्हें दूसरे जानवरों से अलग करता है । अन्य रूप में, यह दावा किया गया है कि ये संबंध शक्ति आधारित संबंध हैं । इसलिए, अमनुष्य जानवरों की बजाय मनुष्य शक्तिशाली है और वे अमनुष्य जानवरों की जैसी चाहे वैसी उपेक्षा कर सकते हैं, जबकि उन्हें अन्य मनुष्यों की फ़िक्र करनी चाहिए क्योंकि उनके पास बराबर स्तर की शक्ति है । 2

स्पीशीज़ अधिव्यापान द्वारा प्रयुक्त तर्क़ दर्शाते हैं कि अन्य जानवरों की अपेक्षा मनुष्यों की फ़िक्र (या सम्मान) किए जाने को सही बताने वाले दावे असफ़ल हैं और ये सलाह देते हैं कि ऐसे दावे निरस्त होने चाहिए । 3

इन दावों द्वारा रेखांकित आधार और निष्कर्षों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

(1) जिनमें भी किसी बौद्धिक क्षमता की कमी है या दूसरों के साथ ख़ास संबंध ना हो उन्हें पूर्णतः नैतिक महत्त्व ना देना, न्यायोचित है ।

(2) सभी मनुष्यों में ख़ास बौद्घिक क्षमताएं या एक – दूसरे के साथ ख़ास संबंध नहीं हैं ।

(3) जिन मनुष्यों में किसी बौद्धिक क्षमता की कमी है या दूसरों के साथ ख़ास संबंध ना हो उन्हें पूर्णतः नैतिक महत्त्व ना देना, न्यायोचित है ।

यदि हम तर्क के दो आधारों को (1) और (2) हैं, मानते हैं तो यह निष्कर्ष जो कि (3) है, स्वीकार करना चाहिए । तर्क (3) तार्किक रूप से (1) और (2) को शामिल करता है । इस तर्क का निष्कर्ष अपरिहार्य है ।

हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि इस तर्क़ का दूसरा आधार अकाट्य (अटूट) है । आसान शब्दों में यह सत्य है कि कुछ मनुष्यों में कुछ बौद्घिक क्षमताएं नहीं हैं । यहां तक कि यदि कई मनुष्यों में यह क्षमताएं हैं तो कई ऐसे बचते हैं जिनमें ये नहीं हैं । वैसे ही, जैसे यहां कई मनुष्यों में कई ख़ास संबंध, जैसे प्रेम का संबंध या एकजुटता जैसी बातें होती हैं । लेकिन यहां कई मनुष्य हैं जिनके दूसरों के साथ ऐसे संबंध नहीं हैं । उदाहरण के लिए कई अनाथों या वृद्घ लोगों के साथ ऐसा ही है । अगर प्रश्न में संबंध, शक्ति आधारित संबंध हैं ,जो यहां कई लोग ऐसे हैं जो कि गुलाम हैं ।

अतः इसका अर्थ है कि यहां एक ही तरीका है जिससे तर्क़ द्वारा प्रस्तुत निष्कर्ष को नज़रंदाज़ किए जा सकता है: पहली दलील को छोड़ देना । इस तरह हमें ऐसे प्राणी जिसमें चुनिंदा क्षमताएं नहीं हैं या जिनमें आपस में या दूसरों के साथ ख़ास संबंध नहीं हैं, उनकी इच्छाओं को कम महत्व देने को न्यायसंगत बताने वाले पक्ष को निरस्त करना है । अर्थात्, लेकिन यह ज़ाहिर है कि हम इस तर्क का उपयोग अमानुष जानवरों के विरुद्ध भेदभाव या अंतर करने के लिए नहीं कर सकते ।

यह तर्क दर्शाता है कि यदि कोई जानवरों के बजाय मनुष्यों को सुरक्षा मिलने की स्थिति का बचाव करने की कोशिश करता है, तो वह इस दावे के साथ कि केवल मनुष्य ही कुछ ख़ास अपेक्षाओं को पूरा करते हैं, ऐसा नहीं कर सकता , कम से कम यदि उन अपेक्षाओं को पूरा करना कुछ ऐसा है जिसकी जांच भी कर सकते हैं । बेशक, मनावकेंद्रवाद का पक्ष लेने वाले इस दावे के साथ कि केवल मनुष्य कुछ स्थितियों को पूरा कर सकते हैं जिन्हें जांचना असंभव है, अब भी इस पक्ष का बचाव करना चाहेंगे लेकिन, “सवाल खड़ा करने के विरुद्ध”( बेग्गींग दह कुएस्शन ) तर्क़ के द्वारा, वह पक्ष निश्चित रूप से अलग साबित होगा ।

इसके परिणास्वरूप, हम निम्नलिखित दिए गए विकल्प पाते हैं । हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि जिस किसी में भी उपरोक्त क्षमताएं और संबंध नहीं हैं उन्हें उपेक्षित (अव्हेलना) या कम ध्यान देने के योग्य रखना चाहिए । इसका अर्थ है कि अमानुष और कई मनुष्य पूर्णतः सम्मानित नहीं होंगे । या हम इसे निरस्त कर सकते हैं, और दावा कर सकते हैं कि पूर्णतः सम्मानित होने के क्रम में केवल एक इच्छा का होना ज़रूरी है, अर्थात् किसी का सिर्फ़ संवेदनशील होना ज़रूरी है ।

तर्क़ इस बात का भी समर्थन करता है कि सम्मान कि योग्यता के लिए बौद्घिक क्षमताएं या ख़ास संबंधों के आधार, स्वीकार करने योग्य परिस्थितियां नहीं हैं, जैसा कि प्रासंगिकता के तर्क से स्पष्ट है कि, वे उचित आवश्यकताएं नहीं हैं ।

प्रजाति अधिव्यपान के तर्क़ को कई बार “ग़ैरमामुली या पार्श्विक मामलों के तर्क़” कहा गया है । 4 लेकिन यह नाम बहकाने वाला और बहुत ही अवैध है । (हैरानी की बात नहीं हैं कि, यह प्रजातिवाद का एक रक्षक है जिसने इसे गढ़ा है) । 5 यह नाम बताता है कि जिन उपरोक्त मानकों की स्थितियों में मनुष्य असफल है वे पार्श्विक या बाहरी हैं । पर वे हैं नहीं । जिन मनुष्यों में बताई गई क्षमताएं या संबंध नहीं हैं वे पूर्णतः मनुष्य हैं, न की आधे मनुष्य की “पार्श्विक” परिभाषा के सुझाव की तरह । इस परिस्थिति में कई मनुष्य हैं, जिनके मामलों को पार्श्विक परिप्रेक्ष्य के ध्यान में नहीं रखा जा सकता है । यह इस बात की ओर संकेत करने कि समझ देता है कि यहां विभिन्न प्रजातियों के बीच एक अधिव्यापन है इस बारे में कि वे कैसे कुछ आवश्यकताओं को पूरा करते हैं जिसके लिए कई बार सम्मान दिया गया है, इसलिए ऐसी आवश्यकताएं जो किसी प्रजाति के सभी सदस्यों द्वारा पूरी होती हैं, (जैसा कि मनुष्य) ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वे मनुष्य हैं, या केवल उन्हीं के द्वारा पूरी होती हैं ।

 

मनुष्यों के बीच विभिन्नताओं के तर्क

एक मिलताजुलता, किन्तु एक विशेष तर्क़ जिसे हमने अभी देखा, उसे हम मनुष्यों के बीच विभिन्नता के तर्क़ कह सकते हैं । यह तर्क़ ज़ोर देता है कि यदि सम्मान देने के लिए बौद्घिक क्षमताएं आवश्यक हैं, तो हमें स्वीकार करना ज़रूरी है कि किसी का सम्मान ग्रहण करना उसकी बौद्घिक क्षमताओं पर निर्भर होना चाहिए ।

अब, यदि यह स्थिति है, तो हमें यह तर्क़ करना चाहिए कि यहां कई मनुष्य हैं जो दूसरों की बजाय अधिक सम्मान के योग्य हैं या हकदार हैं, और दूसरा कोई उनके बराबर सम्मानित नहीं होगा । कुछ मनुष्य कई अमानुष जानवरों से भी बहुत कम सम्मान के योग्य होंगे ( प्रजाति अधिव्यापन के तर्क़ भी यही दर्शाते हैं) ।

अतः, जिनमें प्रगाढ़ योग्यताएं हैं उनमें दूसरों की बजाय बहुत अधिक ध्यान दिया जाएगा । इसका मतलब है कि न्यूटन, आइंस्टीन, अरिस्टोल और लियोनार्डो दा विंची जैसे लोग अन्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक ध्यान और सम्मान पाने के योग्य होंगे । इस उच्चतम स्थिति को पाना आसान नहीं है ।

लेकिन पूरी बात यह नहीं है । जब इसे हम एक छोटे स्तर पर देखते हैं, यदि दो मनुष्यों के बीच इच्छाओं में द्वंद्व है और उनमें से एक के पास अधिकतम बोधात्मक क्षमताएं हैं तो उनकी इच्छाएं प्रभावित होंगी ( एक दूसरे पर हावी होने के गुण के साथ) । इस तर्क़ को नीचे दिए अनुसार प्रस्तुत किया जा सकता है —

(1) यह उचित है कि जिनके पास कम बौद्घिक क्षमताएं हैं उनकी तुलना में अधिक बौद्घिक क्षमता वालों के साथ बेहतर व्यवहार किया जाए ।

(2) मनुष्यों में अलग – अलग बौद्घिक क्षमताएं होती हैं ।

(3) अधिक बौद्घिक क्षमता वाले मनुष्यों के साथ कम बौद्घिक क्षमता वाले मनुष्यों की तुलना में बेहतर व्यवहार करना चाहिए ।

(3′) कम बौद्घिक क्षमता वाले मनुष्यों के साथ अधिक बौद्घिक क्षमता वाले मनुष्यों कि तुलना में बुरा व्यवहार करना चाहिए ।

यह हमारे उन मूल्यों के विरुद्ध है जिनकी हमारे पास बहुलता है । ज़्यादातर लोगों का मानना है कि सभी मनुष्यों को समान रूप से सम्मान मिलना चाहिए । लेकिन जैसा कि हमने देखा है, यह कुछ ऐसा है जिसे हमें निरस्त करना होगा, यदि हम इस विचार को स्वीकार करते हैं कि हैं अमानुष जानवरों के साथ भेदभाव कर सकते हैं क्योंकि उनके पास कुछ बौद्घिक क्षमताएं नहीं हैं ।

वही तर्क़ प्रयोग किया जा सकता है यदि, बौद्घिक क्षमताओं के बारे में बात करने की बजाय हम इस बात का ध्यान रखें कि अमानुष जानवरों को सम्मान नहीं मिलना चाहिए क्योंकि उनमें कुछ दूसरी कमियां हैं (जैसे कि भाषा पर अधिकार या दूसरों का सम्मान करने की क्षमता) क्योंकि किसी भी क्षमता के लिए यहां हमेशा ही कुछ मनुष्य होंगे जो क्षमता में ज़्यादा दक्ष होंगे और कुछ मनुष्य उस क्षमता में कम दक्ष होंगे, या बिल्कुल नहीं होंगे ।

इसलिए, अंत में , जो कोई भी अमानुष जानवरों के साथ उनकी क्षमताओं के आधार पर किए जाने वाले व्यवहार को तर्कसंगत मानता है वह मनुष्यों के साथ एकसमान व्यवहार किए जाने का बचाव नहीं कर सकते । इसे स्वीकार करना काफ़ी कठिन प्रतीत होता है, कम से कम ज़्यादातर लोगों के लिए, और यह बताता है कि हमें इस बात पर अपना रवैया बदलना चाहिए, और उन तर्कों को निरस्त करना चाहिए जो अमानुष जानवरों के पूर्ण नैतिक महत्त्व को ग़लत ठहराते हैं ।


आगे की पढ़ाई

Arneson, R. J. (1999) “What, if anything, renders all humans morally equal”, Jamieson, D. (ed.) Singer and his critics, Oxford: Blackwell, pp. 103-128.

Bernstein, J. H. (1998) On moral considerability: An essay on who morally matters, Oxford: Oxford University Press.

Cushing, S. (2003) “Against ‘humanism’: Speciesism, personhood and preference”, Journal of Social Philosophy, 34, pp. 556-571.

DeGrazia, D. (1996) Taking animals seriously: Mental life and moral status, Cambridge: Cambridge University Press.

Ehnert, J. (2002) The argument from species overlap, master’s thesis, Blacksburg: Virginia Polytechnic Institute and State University [अभिगमन तिथि 23 अगस्त 2018].

Frey, R. G. & Paton, William (1989) “Vivisection, morals and medicine: An exchange”, Regan, T. & Singer, P. (eds.) Animal rights and human obligations, Englewood Cliffs: Prentice Hall, pp. 223-226.

Horta, O. (2010) “What is speciesism?”, Journal of Agricultural and Environmental Ethics, 23, pp. 243-266 [अभिगमन तिथि 30 अक्टूबर 2013].

Kaufman, F. (1998) “Speciesism and the argument from misfortune”, Journal of Applied Philosophy, 15, pp. 155-163.

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Pluhar, E. (1996) Beyond prejudice: The moral significance of human and nonhuman animals, Durham: Duke University Press.

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Singer, P. (2009 [1975]), Animal liberation, New York: Harper Perenial Modern Classics.

Wilson, S. D. (2005) “The species-norm account of moral status”, Between the Species, 13 (5) [अभिगमन तिथि 13 फरवरी 2013].


नोट्स

1 Francis, L. P. & Norman, R. (1978) “Some animals are more equal than others”, Philosophy, 53, pp. 507-527. McCloskey, H. J. (1979) “Moral rights and animals”, Inquiry, 22, pp. 23-54. Leahy, M. P. T. (1991) Against liberation: Putting animals in perspective, London: Routledge. Carruthers, P. (1992) The animals issue: Moral theory in practice, Cambridge: Cambridge University Press.

2 Narveson, J. (1987) “On a case for animal rights”, The Monist, 70, pp. 31-49. Becker, L. C. (1983) “The priority of human interests”, Miller, H. B. & Williams, W. (eds.) Ethics and animals, Clifton: Humana Press, pp. 225-242. Midgley, M. (1983) Animals and why they matter, Athens: University of Georgia Press. Callicott, J. B. (1989) In defense of the land ethic: Essays in environmental philosophy, Albany: The State University of New York Press. Petrinovich, L. (1999) Darwinian dominion: Animal welfare and human interests, Massachusetts: MIT Press.

3 यह तर्क यहाँ लम्बे समय से है । उदहारण के लिए Bentham, J. (1996 [1907]) Introduction to the principles of moral and legislation, Oxford: Clarendon, p. 282n, and long before Porphyry (1823 [ca. 280]) Abstinence from animal food, London: Thomas Taylor [अभिगमन तिथि 12 नवंबर 2012]. यह तर्क के विचार के लिए देखे Horta, O. (2014) “The scope of the argument from species overlap”, Journal of Applied Philosophy, 31, pp. 142-154 [अभिगमन तिथि 25 अक्टूबर 2014].

4 Pluhar, E. (1987) “The personhood view and the argument from marginal cases”, Philosophica, 39, pp. 23-38. Dombrowski, D. A. (1997) Babies and beasts: The argument from marginal cases, Chicago: University of Illinois.

5 Narveson, J. (1977) “Animal rights”, Canadian Journal of Philosophy, 7, pp. 161-178.