वेलफेयर बयोलॉजी

वेलफेयर बयोलॉजी एक प्रस्तावित अनुसंधान क्षेत्र है जो सामान्य रूप से जानवरों की भलाई का अध्ययन करने के लिए समर्पित है, और विशेष रूप से उनके प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में जानवरों पर केंद्रित है । वेलफेयर बयोलॉजी का क्षेत्र जानवरों और पर्यावरण प्रबंधन नीतियों की मदद करने के उपायों को सूचित करेगा, और इस मुद्दे को ध्यान और मान्यता प्रदान करेगा ।

वेलफेयर बिजलोदय क्या है ?

संवेदनशील जीव जंतु और उनके परिवेश के कल्याण के संबंध में पढ़ी जाने वाली अध्ययन को वेलफेयर बायोलॉजी कहा जाता है ।1 अपने परिस्थितिकी तंत्र (यानी अपने इकोसिस्टम) में जीव जंतुओं के जीने की तरीकों के बारे में यह एक अलग दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है । वेलफेयर साइंस, परिस्थितिकी विज्ञान, प्राणी विज्ञान आदि शैक्षणिक क्षेत्रों से ज्ञान को सम्मिलित करने से इस अनुसंधान क्षेत्र को बेहतर समझा जा सकता है जिससे अन्य जंगली जानवरों के हित के लिए नई योजनाएं रची जा सकती है ।

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि वेलफेयर बायोलॉजी परिस्थितिकी तंत्र, अनुसंधान और जैव विविधता से अलग है क्योंकि यह जीव जंतुओं के अनुसंधान में प्रतिमान होने पर प्रश्न नहीं उठाता बल्कि यहां हर प्राणी को विशेष रूप से संवेदनशील मानते हुए उनके हित अहित को समझा जाता है । इन कारणों के वजह से इसे अनुसंधान के क्षेत्र मैं विशेष स्थान दिया जा सकता है । इससे हमें जानवरों की भलाई के संदर्भ में लागू इसकी क्षमता की परिचय मिलता है ।

जंगली जानवर भी कई तरह से पीड़ित होते हैं जिनमें भूख, प्यास, घाव, रोग, तनाव, कठोर मौसम, प्राकृतिक आपदा और दूसरे जीव जंतुओं के प्रति विरोधी संबंध भी हो सकता है । इसके अलावा कई जीव जंतु कम उम्र में ही मर जाते हैं और यह भी संभव है कि इनकी मृत्यु पीड़ा, कई सकारात्मक अनुभव को कुचल दे (जनसंख्या में गतिशीलता और पशुओं की पीड़ा) ।2 जंगली जानवरों को ठीक वैसे ही हानि पहुंचाया जा सकता है जैसे पालतू जीवो को पहुंचाया जाता है इसीलिए ऐसा कोई अच्छा कारण नहीं है कि हम जंगली जानवरों की अनादर करें ।3

पशु अधिवक्ता जो जंगली जानवरों की इस स्थिति से चिंतित है वे कभी इतना गहरा या व्यापक शोध नहीं कर पाएंगे जैसे अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों में वैज्ञानिक कर सकते हैं । यह इतना प्रभावशाली नहीं हो सकता है कि आगे की अनुसंधान को आकर्षित कर सकें । इसके अलावा यदि हम बात नीति निर्धारण और सामाजिक मान्यता को सूचित करने की करती है तो स्थापित अनुसंधान की तुलना में स्वतंत्र अनुसंधान का प्रभाव कम होता है ।

जानवरों और उनके पर्यावरण से संबंधित पिछले काम से प्रस्थान

शैक्षणिक क्षेत्र में अब तक इस मुद्दे का महत्वपूर्ण गहराई से मूल्यांकन नहीं किया गया है । इसके कई कारण है । उनमें से एक सामान्य जनता की सोच की जीव जंतु अपने प्राकृतिक वातावरण में सुहानी जीवन जीते हैं और जंगली जानवरों को हमारी मदद की कोई जरूरत नहीं है । सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है की जीव वैज्ञानिकों की अनुसंधान हमेशा मानव रुचि पर केंद्रित होती हुई आई है । फिर भी जैसे हम आगे देखेंगे अब तक जितने भी काम की गई है वह सब वेलफेयर बालाजी के लिए मान्य प्रारंभिक बिंदु हो सकती है ।

मानव उद्देश्य में जिन भयंकर तरीकों से जानवरों को हानि पहुंचाई जा रही थी उसे देख चिंतित आम जनता ने कई दशक पहले एनिमल वेलफेयर की विज्ञान बनाई थी । इस क्षेत्र की कई जांच परिणाम यही पता लगाने के लिए नियोजित की गई है कि जानवरों को किस प्रकार शोषित किया गया है और यह पता लगाने के लिए कि जानवर कितने संवेदनशील हो सकते हैं और वे किन सकारात्मक और नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं । जंगली जानवरों पर बहुत कम अनुसंधान किया गया है । जंगली जानवरों की वेलफेयर साइंस पर अनुसंधान करने वाले शोधकर्ताओं ने बंधी जीव जंतु( जैसे चिड़ियाघर वन्यजीव पार्क पुनर्वास केंद्र में जीते हैं) की भलाई के लिए ,4 खेतों और शहरों में जीने वाले जानवरों पर, 5 शिकार और पशु व्यापार से प्रभावित जंतुओं पर 6 और ऐसे जंतु जो मानवीय गतिविधियों से प्रभावित हुए हैं, उन पर अनुसंधान किया है ।7 उन्होंने मानव से संबंधित जंतुओं को प्रमुखता देते हुए जंगली जानवरों को और उनकी पीड़ा को अनदेखा कर दिया है । जो ज्ञान और तरीके वेलफेयर बायोलॉजिस्ट ने आज तक इकट्ठा की है वह सब हमें जानवरों की विभिन्न परिस्थितियों को सामना करने की तरीकों को समझने के लिए उपयोग कर सकते हैं ।

खेती की और संबंधित विषयों पर अनुसंधान करने वाले शोधकर्ताओं ने जंगली जानवरों की पीड़ा को बेहतर समझने के लिए इस अनुसंधान क्षेत्र को विकसित किया है लेकिन इस विषय पर बहुत कम जानकारी है । परिस्थितिकी विदो ने जानवरों के व्यवहार जीवन इतिहास जनसंख्या की गतिशीलता और विकासवादी पैटर्न ( अन्य पारिस्थितिक पहलुओं के बीच) मैं रुचि दिखाई है लेकिन व्यक्तिगत जानवरों की भलाई के संदर्भ में उनकी निष्कर्षों को स्थापित करने में विफल रहे हैं । फिर भी जो ज्ञान हमने इस विषय पर प्राप्त किया है वह हमें अपने प्राकृतिक वातावरण में जानवरों की भलाई की संभावना के बारे में बहुत कुछ बता सकता है ।

वेलफेयर बयोलॉजी की संभावनाएं

इस मुद्दे पर ध्यान देने की कमी के बावजूद जंगलों में रहने वाले जानवरों की भलाई के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों को अंजाम दिया गया है । जिनमें से फंसे हुए जानवरों को बचाना ,अनाथ जंतुओं की मदद करना और घायल या बीमार जानवरों को चिकित्सा सहायता देना है । कुछ प्रयासों ने बड़ी संख्या में जानवरों को व्यक्तिगत रूप में प्रभावित किया है जिनमें स्थानधारी (mammals) और पक्षियों की आबादी को खिलाने पर केंद्रित कार्यक्रम जिनका उद्देश्य लुप्तप्राय, शिकारी या करिश्माई जाति की समर्थन करना, जानवर-मानव के बीच के संघर्षों को कम करना, परिस्थितिकी सवालों का जवाब देना या जानवरों की मदद करना शामिल है ।8

इनके अलावा, टीकाकरण कार्यक्रमों द्वारा कई जंगली जानवरों को दर्दनाक और अक्सर घातक रोग जैसे, रेबीज, 9 तपेदिक,10 मिक्सोमटोसिस(myxomatosis)11 और स्वाइन फ्लू से बचाया गया है ।12 जबकि यह उपाय आमतौर पर जंगली जानवरों को, पालतू जानवरों और मनुष्यों को संक्रमित करने से रोकने के लिए किए जाते हैं । इससे यह पता चलता है कि जंगली जानवरों की सहायता करना संभव है और यह मानव और अन्य जानवरों के लिए भी लाभ प्रदान कर सकता है । यह प्रयास विभिन्न विषयों में अध्ययन पर आधारित है । जब इन कार्यक्रमों पर शोध करके उनके परिणाम प्रस्तुत करते हैं तब व्यक्तिगत रूप में पशु के जीवन पर उनके प्रभाव को अच्छी तरह से उजागर ना किए जाने के विषय को हम अच्छे से समझ सकते हैं ।

यह सोचा जा सकता है कि इस मुद्दे से निपटना आसान नहीं है क्योंकि जंगली जानवरों के कल्याण को सुधारने के लिए वर्तमान ज्ञान और टेक्नोलॉजी अभी भी अपर्याप्त है लेकिन यह इसलिए है क्योंकि इस मुद्दे पर प्रगति करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है । जैसे कि ऊपर उल्लेख किया गया है, इस प्रकार अब तक, पारिस्थितिकी विदो और अन्य जीवन वैज्ञानिकों ने जानवरों की भलाई के लिए बहुत कम चिंता दिखाई है और इसके बजाय अन्य मुद्दों पर जैसे जैव विविधता के संरक्षण और मानव लाभ के लिए अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अपने प्रयासों को केंद्रित किया है । वेलफेयर बालाजी पर अनुसंधान स्थापित करना इसे और बढ़ावा देकर सफलतापूर्वक निपटने की क्षमता को बढ़ा सकता है ।

नए वैज्ञानिक विषयों का निर्माण, जो शिक्षा में सम्मान अर्जित करते हैं वे, आमतौर पर कुछ समय लेते हैं और उसमें प्रतिबद्ध लोगों की भागीदारी होती है लेकिन हम हाल के कई उदाहरण पा सकते हैं , 20 व शताब्दी में अनुसंधान के कई नए क्षेत्रों में जन्म लिया था, उन्हें पहले अध्ययन के प्रासंगिक क्षेत्र के रूप में नहीं माना जाता था लेकिन अभी वे शिक्षा में सम्मानित विषय बन गए हैं । यदि हम लोगों में जंगली जानवरों की पीड़ा के बारे में जागरूकता फैलाते हैं तो वेलफेयर बायोलॉजी के भविष्य के लिए कुछ आशा जनक दृष्टिकोण हो सकता है । यह आम जनता और शैक्षणिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बीच, विशेषकर छात्रों और युवा शोधकर्ताओं, दोनों के बीच हो सकता है ।

जंगली जानवरों की भलाई के लिए उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के सर्वोत्तम तरीकों पर विचार करते हुए, अलग-अलग विषयों को संबोधित करके अनुसंधान में नई परियोजनाएं बनाई जा सकती है । उदाहरणों में टीकाकरण कार्यक्रमों में आगे की अनुसंधान ,शहरी,उपनगरीय या औद्योगिक क्षेत्रों में रहने वाले जानवरों के खातिर अर्बन वेलफेयर जीव विज्ञान पर काम , मौसम की स्थिति के प्रभाव पर शोध और जानवरों के कल्याण के लिए आश्रय भवन, मूल्यांकन आदि बनाने वाले काम किए जा सकते हैं । इसके अलावा परजीव ,जनसंख्या की गतिशीलता और प्रयासों को चित्रित करने की व्यावहारिकता और कई अन्य अनुसंधान पर काम किया जा सकता है । इन परियोजनाओं के सफलतापूर्वक विकसित होने पर ना केवल जानवरों की मदद और नीतियों को लागू करने में उपयोग है बल्कि यह भी है कि सफल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में रुचि दिखाने में मदद कर सकती है । जब तक यह एक नए अनुशासन के रूप में स्थापित नहीं हो जाता तब तक इस शोध के क्षेत्र में कार्य और प्रकाशन की मात्रा को संभावित रूप से बढ़ाया जा सकता है ।


आगे की पढ़ाई

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नोट्स

1 Ng, Y.-K. (1995) “Towards welfare biology: Evolutionary economics of animal consciousness and suffering”, Biology and Philosophy, 10, pp. 255-285.

2 हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जंगल में रहने वाले जानवरों की संख्या बहुत उच्च है । कच्चे (प्राथमिक) आंकलन बताते हैं कि जंगली कशेरुकियों की वैश्विक जनसंख्या 10^14 तक, और संधिपादों की 10^18 तक हो सकती है, और अन्य अकशेरुकी जो संवेदनशील (संवेदी) हो सकते हैं, और भी अधिक संख्या में हैं । देखें Tomasik, B. (2015 [2009]) “How many wild animals are there?”, Essays on Reducing Suffering [अभिगमन तिथि 3 जूल 2018].

3 यह सब कुछ अलग – अलग लेखों सहित हमारी वेबसाइट के इन दो खण्डों में अधिक (और) विस्तार से समझाया गया है: जंगल में जानवरों की स्थिति, Why wild animal suffering matters.

4 Brando, S. & Buchanan-Smith, H. M. (2017)“The 24/7 approach to promoting optimal welfare for captive wild animals”, Behavioural Processes, 4 November. Kagan, R.; Carter, S. & Allard, S. (2015) “A universal animal welfare framework for zoos”, Journal of Applied Animal Welfare Science, 18, sup. 1, pp. S1-S10 [अभिगमन तिथि 17 जून 2018]. Hill, S. P. & Broom, D. M. (2009) “Measuring zoo animal welfare: Theory and practice”, Zoo Biology, 28, pp. 531-544.

5 Ferronato, B. O.; Roe, J. H. & Georges, A. (2016) “Urban hazards: Spatial ecology and survivorship of a turtle in an expanding suburban environment”, Urban Ecosystems, 19, pp. 415-428. Souza, C. S. A.; Teixeira, C. & Young, R. J. (2012) “The welfare of an unwanted guest in an urban environment: The case of the white-eared opossum (Didelphis albiventris)”, Animal Welfare, 21, pp. 177-183. Ditchkoff, S. S.; Saalfeld, S. T. & Gibson, C. J. (2006) “Animal behavior in urban ecosystems: Modifications due to human-induced stress”, Urban Ecosystems, 9, pp. 5-12.

6 Baker, S. E.; Cain, R.; van Kesteren, F.; Zommers, Z. A.; d’Cruze, N. C. & Macdonald, D. W. (2013) “Rough trade; animal welfare in the global wildlife trade”, BioScience, 63, pp. 928-938 [अभिगमन तिथि 18 फरवरी 2020].

7 Kirkwood, J. K.; Sainsbury, A. W. & Bennett, P. M. (1994) “The welfare of free-living wild animals: Methods of assessment”, Animal Welfare, 3, pp. 257-273.

8 Dubois, S. D. (2014) Understanding humane expectations: Public and expert attitudes towards human-wildlife interactions, PhD दिस्सेरटेशन, Vancouver: University of British Columbia [अभिगमन तिथि 2 सितंबर 2018].

9 Slate, D.; Algeo, T. P.; Nelson, K. M.; Chipman, R. B.; Donovan, D.; Blanton, J. D.; Niezgoda, M. & Rupprecht, C. E. (2009) “Oral rabies vaccination in North America: Opportunities, complexities, and challenges”, Neglected Tropical Diseases, 3 (12) [अभिगमन तिथि 9 जूल 2018].

10 Díez-Delgado, I.; Sevilla, I. A.; Romero, B.; Tanner, E.; Barasona, J. A.; White, A. R.; Lurz, P. W. W.; Boots, M.; de la Fuente, J.; Domínguez, L.; Vicente, J.; Garrido, J. M.; Juste, R. A.; Aranaz, A. & Gortázar, C. (2018) “Impact of piglet oral vaccination against tuberculosis in endemic free-ranging wild boar populations”, Preventive Veterinary Medicine, 155, pp. 11-20.

11 Ferrera, C.; Ramírez, E.; Castro, F.; Ferreras, P.; Alves, P. C.; Redpath, S. & Villafuerte, R. (2009) “Field experimental vaccination campaigns against myxomatosis and their effectiveness in the wild”, Vaccine, 27, pp. 6998-7002.

12 Rossi, S.; Poi, F.; Forot, B.; Masse-Provin, N.; Rigaux, S.; Bronner, A. & Le Potier, M.-F. (2010) “Preventive vaccination contributes to control classical swine fever in wild boar (Sus scrofa sp.)”, Veterinary Microbiology, 142, pp. 99-107.