जानवरों पर जैव चिकित्सा परीक्षण

जैव चिकित्सा परीक्षण कई साल पहले से विद्यमान है | प्रारंभिक दौर के परीक्षण में रक्त आधान, अंगविच्छेदन (सचेत, जीवित जानवरों पर किये जाने वाली शल्य प्रक्रियायें), और वानरों, कुत्तों, सूअरों का विच्छेदन शामिल है | वर्तमान समय में जैव चिकित्सा अनुसन्धान के लिये अमानुष जानवरों पर परीक्षण करना नैतिकता की संहिता तहत अनिवार्य है | वर्ष 1947 में अपनाई गई न्यूरेम्बर्ग संहिता के अनुसार, मनुष्यों पर किये जाने वाले कोई भी परीक्षण “जानवरों पर हुये अनुसन्धान के परिणाम पर अभिकल्पित और आधारित” होने चाहिए |1 13वीं विश्व चिकित्सा सभा द्वारा वर्ष 1964 में अपनाई गई हेलसिंकी घोषणा भी यह टिप्पणी करती है कि मनुष्य से सम्बंधित चिकित्सा अनुसन्धान “पर्याप्त रूप से समझे (सिद्ध हुये) प्रयोगशाला परीक्षणों और जानवरों पर होने वाले परीक्षण पर आधारित होने चाहिये | ”2

वर्ष 1940 से पशु-सम्बन्धी औषधि में यहाँ एक नई विशेषता रही है: “प्रयोगशाला पशु (जानवर) विज्ञान” | एक सही प्रतिमान का स्तर (बिंदु) होने तक, यह अनुसन्धान में जानवरों के इस्तेमाल करने की दी गई केंद्रीय भूमिका को स्पष्ट करता है |

जैव चिकित्सा अनुसन्धान के क्षेत्र में, निम्नलिखित सहित, यहाँ कई विभिन्न उद्देश्य हैं जिनके लिए जानवर इस्तेमाल किये और मारे जाते हैं:

बीमारी का अध्ययन

विभिन्न बीमारियाँ कैसे विकसित होती हैं इसका अध्ययन करने में कई प्रक्रियायें प्रायोजित हैं | यह जानबूझकर जानवरों को बीमारी देकर किया गया है जो कि अध्ययन के अंतर्गत है यह देखने के लिए कि मनुष्यों पर बीमारी और उपचार कैसे कार्य कर सकते हैं | इस शैली में एक विस्तृत वर्ग की बिमारियों का अध्ययन किया गया है, जैसे कि पाचन-सम्बन्धी, तंत्रिका तंत्र और जैविक बीमारियाँ | दिमागी चोट, रीढ़ की हड्डी के चोट, पार्किन्सन, एड्स, कैंसर, मोटापा और कई अन्य बिमारियों के अध्ययन के लिए भी जानवर इस्तेमाल में लाये जाते हैं | ये परीक्षण किये जाने के क्रम में जानवर घातक बीमारियाँ ट्रॉमेटिक घाव, जबरन खिलाना, जलन, सामाजिक पृथक्करण, और विषैले पदार्थों का सामना करने को सहन करने के लिए बाध्य हैं |

नई दवाइयों (औषधियों) का विकास

नई दवाइयों की खोज में आमतौर पर चार मुख्य क़दम शामिल होते हैं:

1. संभावित दवाइयों की पहचान: पहले, नए रसायन जो दवाइयों की तरह इस्तेमाल किये जा सकते हैं, पहचाने जाते हैं | इस चरण के दौरान परीक्षणों में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की संख्या उन जानवरों की कुल संख्या का लगभग 10% होती है जो नई दवाइयां बनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किये गए हैं |

2. नए पदार्थों की जांच: जो पदार्थ संभावित माने जाते हैं वे आगे और परीक्षणों से गुज़रते हैं | यह उस क्षेत्र से दूर है जिसमें नई दवाइयां बनाने की प्रक्रिया में अधिकतर जानवरों पर परीक्षण किये जाते हैं | परीक्षण किये गए लगभग 80% जानवर इस चरण में इस्तेमाल किये जाते हैं |

3. सुरक्षा जाँच: पिछले चरण से चुने हुये पदार्थों की सुरक्षा की आगे जाँच होती है | आमतौर पर परीक्षण किये गए जानवरों का 10% से अधिक इस चरण में इस्तेमाल होते हैं |

4. अंतिम उत्पाद का परिष्करण: नई दवाइयों के विकास के अंतिम चरण में मनुष्यों पर अध्ययन शामिल होता है | सामान्यतः, इस स्तर पर अमानुष जानवरों पर परीक्षण नहीं किये जाते |3

एक दवाई (औषधि) के लिए, विभिन्न परीक्षणों में लगभग 3000 जानवर इस्तेमाल हो सकते हैं | इन जानवरों को होने वाला दर्द अक्सर दवाई द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन दवाइयां परीक्षण में बाधा डाल सकती हैं | यह एक कारण है दर्द निवारक दवाइयां नहीं दी जा सकतीं | इसके अलावा, परीक्षणों द्वारा गंभीर रूप से हानि पहुंचाए जाने के बाद जानवरों को लम्बे समय तक जीवित रखते हुये परीक्षणकर्ता महत्वपूर्ण रूप से उनकी पीड़ा को लम्बा कर सकते हैं | अनुसंधानकर्ता केवल इसलिए इन जानवरों को जीवित रखते हैं क्योंकि परीक्षणों के दौरान जानवरों की मौत आंकड़े को कम उपयोगी बना सकती है |

परीक्षण के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले जानवर

अनुसन्धान में विस्तृत प्रकार के जानवर इस्तेमाल होते है | इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

मूस और चूहे: वे स्तनधारियों पर होने वाले आक्रमण, बेहोशी, या प्रायोगिक संक्रमण (परजैविक, जीवाणु, या विषाणु) और प्रतिरक्षा विज्ञानी, कर्क रोग विज्ञान (ट्यूमर से सम्बंधित), विरूपता विज्ञान (असामान्य शारीरिक विकास), और भ्रूण विज्ञान प्रतिक्रिया और विकारों की प्रतिक्रिया पर होने वाले परीक्षणों के प्रति आमतौर पर उत्तरदायी हैं | मूस वे जानवर हैं जो मानवीय बीमारियों की आनुवांशिक उत्पत्ति के अध्ययन (जांच-परख) में सबसे अधिक इस्तेमाल होते हैं | चूहे भी लगातार पौषणिक, व्यावहारिक, और अन्तःस्राविकी अध्ययन में इस्तेमाल किये जाते हैं | मूस और चूहे कैंसर और पोषण, किडनी की बीमारी, पित्त-सान्द्रव और त्वचा प्रतिरोपण सहित कई अन्य पर होने वाले परीक्षणों में इस्तेमाल किये जाते हैं |

कुत्ते और बिल्लियाँ: कुत्ते अक्सर हृदयवाहिनी परेशानी, सीपीआर तकनीक, एनीमिया, ह्रदय रोग, और कई अन्य परेशानियों का अध्ययन करने में इस्तेमाल होते हैं | बिल्लियाँ सामान्यतः तंत्रिका तंत्र सम्बन्धी बीमारियाँ, कैंसर, जैविक परेशानी के अध्ययन और प्रतिरक्षा तंत्र सहित अन्य कई परेशानियों का भी अध्ययन करने में इस्तेमाल होती हैं |

ख़रगोश: ख़रगोश दवाइयों और टीकों से सुरक्षा के साथ ही साथ प्रत्यारोपण, पित्त सान्द्रव, उत्पाद सुरक्षा और कई अन्य चीज़ें जो मुख्यतः प्रतिकारक, विष विज्ञान, विरूपता, और पुनरुत्पादन में इस्तेमाल होती हैं, के परीक्षण करने में इस्तेमाल किये जाते हैं |

गुएना सूअर: गुएना सूअर प्रतिरक्षा विज्ञान, औषध विज्ञान, और पोषण सम्बन्धी अध्ययन में नमूनों की तरह इस्तेमाल होते हैं |

हम्सटर: हम्सटर पुनरुत्पादन, कोशिकाजनन, और प्रतिरक्षा विज्ञान के अध्ययन सहित कई उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं |

पक्षी, सरीसृप और मेंढक: पक्षी, सरीसृप, और मेंढक मधुमेह, लीवर कैंसर, तंत्रिका जीव विज्ञान सम्बन्धी परेशानियाँ और कई अन्य प्रयोगों सहित परीक्षणों में इस्तेमाल किये जाते हैं |

गाय: गायें अंग प्रत्यारोपण, मधुमेह और ह्रदय रोग सहित अन्य सम्बंधित परीक्षणों में इस्तेमाल की जाती हैं |

नर वानर: नर वानर एड्स, पार्किन्सन, एनेस्थीसिया, मीसल्स और कई अन्य बीमारियों के लिए होने वाले अनुसन्धान में इस्तेमाल होते हैं |

अनुसन्धानकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले अधिकतर जानवर परीक्षणों के उद्देश्य से खासतौर से पैदा किये गए हैं | हालाँकि, परीक्षण किये गए अन्य जानवर हो सकता है आश्रय, या प्रदर्शन के लिए रखे या उत्तरदायी जगहों से प्राप्त हुये हों | कई मामलों में जानवर आनुवांशिक रूप से संशोधित किये जाते हैं, और आनुवांशिक संशोधन उनके जीवन के दौरान उन्हें काफ़ी पीड़ा पहुंचा सकता है | कुछ आनुवांशिक संशोधनों के कारण पूर्व मृत्यु भी हो सकती है |

क्रियाविधि के उदाहरण

नीचे परीक्षण और स्थितियों4 के प्रकारों के कुछ विवरण हैं जिनमें जानवर इस्तेमाल होते हैं:4

त्वचा-संवेदीकरण परीक्षण: इसके लिए गुएना के सूअर अक्सर इस्तेमाल किये जाते हैं | रसायन की कई ख़ुराक गुएना सूअर की त्वचा पर लगाईं जाती है, यह देखने के लिए कि क्या एक अनुवर्ती लेप एक गुएना सूअर जो पहले इस पदार्थ के समक्ष प्रस्तुत नहीं हुआ उसकी त्वचा पर होने वाली प्रतिक्रिया की बजाय अधिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का कारक है |

कैंसरकारिता पर परीक्षण: चूहों जैसे जानवरों को लगभग दो वर्षों तक संभावित कैंसरकारक पदार्थों की खुराक दी जाती है और फिर जो ट्यूमर बढ़ता है उसका अध्ययन किया जाता है | अन्य प्रयोगों में, गर्भवती ख़रगोश को उनके पूरे गर्भकाल के दौरान रसायन की खुराक दी जाती है और फिर उनके पेशाब का अध्ययन किया जाता है, इन रसायनों के कारण होने वाली घातक मृत्यु या बदले हुये विकास को देखने परखने के लिए |

ह्रदय स्थितियों पर परीक्षण: हृदयाघात और आघात जैसे स्थितियां कुत्तों में अंतर्विष्ट की जाती है जिससे उनका अध्ययन किया जा सके |

पक्षाघात परीक्षण: पक्षाघात और रीढ़ की हड्डी की चोटें पैदा करें के लिए, कृंतकों पर वजन गिराए जाते हैं |

मितली (उत्क्लेश) परीक्षण: कुत्तों की आंत में उन्हें उल्टी कराने के लिए इलेक्ट्रोड आरोपित किये जाते हैं |

सरदर्द परीक्षण: ख़ास रसायनों के इस्तेमाल द्वारा नर वानरों में कृत्रिम रूप से माईग्रेन जैसे लक्षण पैदा किये जाते हैं |

विषाक्तता परीक्षण: ये परीक्षण उनके नाम द्वारा बताये अनुसार आकलन किये जाते हैं, उस सीमा में जहाँ ख़ास पदार्थ विषैला हो सकता है | इन परीक्षणों में से कुछ जानवरों की त्वचा के लिए फटने और छिलने का कारक हो सकते हैं | विषाक्तता परीक्षण आतंरिक रक्तस्राव, उल्टी, ऐंठन और अचेत दशा के भी कारक हो सकते हैं |

चयापचय अध्ययन: जानवरों पित्त वाहिकाओं में नली आरोपित की जाती है |

ऊतक संयोज्यता परीक्षण: पहले ऊतक संयोज्यता परीक्षणों में, नए रसायन हमेशा मनुष्यों पर जांचे जाते थे उनकी जैव संगतता देखने के लिए | कुछ समय पहले, यह अस्वीकार्य हो गया | अब, एक पदार्थ के जैव संगत होने के लिए, इसका कई चरणों से गुज़रना ज़रूरी है | ये अन्तः पात्र परीक्षण, विवो परीक्षण (जहाँ मनुष्यों की बजाय जानवर इस्तेमाल किये जाते हैं), और इन-यूज़ परीक्षण हैं |

दवा का प्रयोग: जैव उपलब्धता के अध्ययन में भी जानवर इस्तेमाल होते हैं, जो कि दिए जाने के बाद दवा या औषधि के अवशोषित होने या शारीरिक ऊतकों या अंगों में उपलब्ध होने के स्तर या आवृत्ति पर अनुसन्धान है |

रोगजनन अनुसन्धान: परा उत्पत्तिमूलक जानवर बीमारियों के रोगजनक तंत्र पर अनुसन्धान के लिए संभावित चिकित्सकीय यौगिक पर जांच किये जाने वाले यन्त्र, और संभावित उपचारों के लिए विवो उपकरणों की वैधता की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं |

तंत्रिका जीव विज्ञान: दिमाग पर शल्य चिकित्सा (सर्जरी) और पोषण के प्रभावों के अध्ययन के लिए जानवर, ख़ासतौर से चूहे इस्तेमाल किये जाते हैं |

जानवरों के परीक्षण पर चर्चा

जानवरों पर परीक्षण के पक्षकार दावा करते हैं कि यदि जानवरों को नुकसान न पहुंचाने की विधियाँ विकसित हो जाएँ, तो भी यहाँ कई मामले हैं जिनमें जीवित जानवरों पर दवाइयां और प्रक्रियाओं को जांचना आवश्यक है | इस दृष्टिकोण का विरोध करने वालों ने तर्क दिया है कि हो सकता है जानवरों पर परीक्षण इन दवाइयों के प्रभाव सही तरीके से न दर्शायें जो मनुष्यों पर होंगे | इस्तेमाल किये गए जानवरों की प्रजातियों और नस्लों के कारण होने वाले अंतर मनुष्यों में परिणामों में अशुद्ध रूप से अनुमानित प्रभावों के कारक हो सकते हैं | सजातीय, जहाँ मनुष्यों की जनसँख्या काफी विविध है की बजाय इस्तेमाल किये गए जानवरों की जनसँख्या से अन्य समस्याएं उभर सकती हैं | प्रयोगशाला में पदार्थों के दिये जाने के परीक्षण का तरीका और मनुष्यों द्वारा उनको ग्रहण करने या अवशोषित करने के तरीके में अंतर भी परिणामों को अशुद्ध बना सकते हैं |5

वे आगे तर्क करते हैं कि यहाँ तक कि यदि मनुष्य और अमानुष जानवर कई मामलों में समान स्वास्थ्य परेशानियाँ विकसित कर लें, तो भी शारीरिक तंत्र अलग हैं | यह वह कारण हो सकता है, उनके तर्क का, कि क्यों जानवरों पर परीक्षणों का बहिर्वेशन आंकड़ा ज्ञानवादी नहीं लगता है |6

वे सही हैं या ग़लत इनकी आलोचनाओं, और उदासीनता से अलग, इस बात पर पर ध्यान दिया जा सकता है कि जैव चिकित्सा अनुसन्धान के मुद्दे पर मनुष्यों और अमानुष जानवरों को ध्यान में रखने के तरीकों के बीच यहाँ एक स्पष्ट विषमता है | हम इसे नीचे दिए गए दो खण्डों में देखेंगे |

विनियमन कोई अंतर नहीं ला रहे

कई देशों में, वहां कुछ विनियमन (नियम) हैं कि परीक्षणों में जानवर कैसे इस्तेमाल किये जा सकते हैं | हालाँकि, ये विनियमन जहाँ वे हैं, आमतौर पर अमानुष जानवरों के इस्तेमाल पर बहुत थोड़ी सी पाबंदियां लगाते हैं |

यूरोपियन यूनियन में, जबकि प्रसाधन सामग्रियों के लिए जानवरों पर परीक्षण प्रतिबंधित है, वैज्ञानिक उद्देश्यों हेतु परीक्षण के लिए जानवरों का इस्तेमाल कभी-कभार ही प्रतिबंधित है | ई यू में मुख्य वर्तमान नियम “वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले जानवरों की सुरक्षा पर निदेशक 2010/63/EU है |7 हालाँकि अमानुष जानवरों के लिए यह इस क्षेत्र में नियम के किसी अन्य भाग वास्तविकता की बजाय कम असम्मान दिखाता है, तब भी यह अपने आप में जानवरों के परीक्षण पर सवाल नहीं करता | जानवरों द्वारा सही जाने वाली पीड़ा घटाने पर कुछ आवश्यकतायें निर्धारित करता है, किन्तु ये परीक्षण की आवश्यकताओं द्वारा नकार दी (पीछे धकेल दी) जा सकती हैं, और यह इस बात पर ध्यान नहीं देते कि जानवरों का जीवन बचाने या सुरक्षित रखने के योग्य है | यह केवल इस तथ्य द्वारा नहीं दर्शाया गया है कि जानवर नियमित रूप से प्रक्रियाओं में मारे गए हैं, बल्कि इससे भी कि बड़ी संख्या में जानवर जो मारे गए हैं मात्र इसलिए क्योंकि वे परीक्षणों में इस्तेमाल के लिए पैदा किये गए थे किन्तु मारे नहीं गए | वैसे भी वे मारे जाते हैं, और यह केवल प्रतिबंधित नहीं है, यह मानक प्रक्रिया है |

यू एस में, जानवरों पर परीक्षण इस आधार पर होना तय है कि पशु कल्याण अधिनियम 1966 ने निर्धारित किया है |8 हाल के दशकों में पशु संवेदनशीलता और जानवरों को नैतिक रूप से ध्यान में रखने सम्बन्धी तर्क में हमारी पूर्व समझ की बजाय, एक नियम जो लगभग आधी सदी पुराना है अब भी लागू है और नए विधान द्वारा हटाया नहीं गया है जो जानवरों को और अधिक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं | कितनी बुरी तरह से जानवरों को पशु कल्याण अधिनियम कोई सुरक्षा प्रदान कर सकता है यह समझने के लिए, ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि यह कृन्तक जैसे जानवरों को उनके ध्यान में रखे जाने से बाहर करता है, जो परीक्षणों में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की जबरदस्त बहुलता है |

पशु कल्याण अधिनियम का लागू होना पशु और वृक्ष स्वास्थ्य निरीक्षण सेवा (ए पी एच आई एस) की पशु संरक्षण विभाग को सौंपी गई है, जो की कृषि विभाग यूनाइटेड स्टेट्स (यू एस डी ए) की एक शाखा है | यह एक जानवरों का सुरक्षा तंत्र नहीं, बल्कि मानवीय लाभों के लिए जानवरों द्वारा सही जाने वाली हानि को पूर्णतः स्वीकार करने वाली संस्था है |

कनाडा में यह समान है, जहां जानवरों पर परीक्षण पशु संरक्षण की कनाडाई परिषद् (सी सी ए सी) के निर्देशित नियमों के अनुसार किये जाने तय हैं |

ऑस्ट्रेलिया और ब्राज़ील जैसे अन्य देशों में, पशु नैतिकता समिति वे संस्थाएं हैं जो तय कर सकती हैं कि एक ख़ास प्रक्रिया के लिए अमानुष जानवरों का इस्तेमाल स्वीकार्य हो सकता है या नहीं | आमतौर पर ये समितियां परीक्षण के समर्थकों को शामिल करती हैं, जो लगभग हमेशा उनके बहुमत में होते हैं | सामान्यतः प्रक्रियाएं स्वीकार कर ली जाती हैं यहाँ तक कि यदि वे जानवरों को काफी नुकसान पहुंचती हों तब भी |

अंतत, जापान जैसे कुछ देशों में, जबकि वहां जानवरों के मानवीय उपचार और प्रबंधन के लिए नियम है,9 व्यवहार में (प्रयोग में) यह बिलकुल अर्थपूर्ण नहीं है, जबकि यहाँ कोई बाध्यता और यहाँ कोई तृतीय पक्ष संस्था आवश्यक नहीं है यह देखने के लिए कि जानवरों के साथ क्या हुआ है | यह मान लिया गया है की परीक्षणकर्ता स्व-नियमन करेंगे, जो कि ज़रा भी नियमन ना होने के समान है |
यह सबकुछ दर्शाता है कि जैव चिकित्सा परीक्षण में इस्तेमाल होने वाले जानवर वास्तव में बिना किसी सुरक्षा के रहेंगे जब तक नियम यह स्वीकार करते हैं कि उनका जीवन और भलाई तुच्छ है |

पशु नैतिकता और परीक्षण

यहाँ कुछ ख़ास उद्देश्य हैं जिनके लिए अमानुष जानवरों पर परीक्षण स्पष्ट रूप से हानि (अहित) को दबा नहीं सकते, क्योंकि तुच्छ लाभों के सम्बन्ध में हानियाँ काफी महत्वपूर्ण हैं (उदाहरण के लिए, प्रसाधन परीक्षण) | अन्य मामलों में लाभ बड़े हैं और शिकार को हुई हानियों से महत्वपूर्ण हो सकते हैं | आज विभिन्न नैतिक सिद्धांत मानदंड की अलग-अलग धारणा के साथ विद्यमान हैं जिसे हमें निर्णय लेने में इस्तेमाल करना चाहिए, जो परीक्षण के विषयों – मनुष्य और जानवर को प्रभावित करते हैं |10 कुछ सिद्धांतों के अनुसार, दूसरों के लाभ के लिए एक इकाई को हानि पहुँचाना हमेशा नैतिक रूप से अस्वीकार्य है, इसलिए वे इन मामलों में परीक्षण प्रतिबंधित कर सकते हैं | अन्य सिद्धांतों के अनुसार, हमें कुछ इकाइयों को हुई हानियों के साथ-साथ यह जो दूसरों को लाभ देती हैं, पर ध्यान देना चाहिए, और उसे वरीयता देनी चाहिए जिसका वजन (महत्त्व) अधिक हो | इन मतों (दृष्टिकोण) के अनुसार, बाद के मामलों में परीक्षण स्वीकार्य है | लेकिन जब तक वे जो इस मत का बचाव करते हैं इसे मनुष्यों पर नहीं बल्कि केवल जानवरों पर लागू करते हैं, वे प्रजातिवादी पक्षपात दिखाते हैं और नियमित रूप से वह नैतिक मत (दृष्टिकोण) वास्तव में स्वीकार नहीं करते हैं | वास्तव में इन-यूज़ या नैदानिक परीक्षण की उपयोगिता का सवाल मुश्किल से ही लाभ विरुद्ध हानि परिप्रेक्ष्य से देखता है | यह सीधे रूप में मान लिया गया है कि अमानुष जानवर संसाधन की तरह इस्तेमाल किये जा सकते हैं यदि वे मनुष्य को लाभ पहुंचाते हों |हालाँकि प्रजातिवाद अस्वीकृत होना चाहिए: हमें प्रत्येक व्यवहार (प्रयोग) में अपना नैतिक मूल्यांकन बनाना (करना) चाहिए, उन प्रजातियों को अलग रख के जो इसमें शामिल हैं, और सभी हितों को ध्यान में रख जो उनके पास है |


आगे की पढ़ाई

Animal Procedures Committee (2003) Review of cost-benefit assessment in the use of animals in research, London: Home Office.

Baird, R. M. & Rosenbaum, S. E. (eds.) (1991) Animal experimentation: The moral issues, New York: Prometheus.

Balls, M. (1994) “Replacement of animal procedures: Alternatives in research, education and testing”, Lab Animal, 28, pp. 193-211.

Bockamp, E.; Maringer, M.; Spangeberg, C.; Fees, S.; Fraser, S.; Eshkind, L.; Oesch, F. & Zabel, B. (2002) “Of mice and models: Improved animal models for biomedical research”, Physiological Genomics, 11, pp. 115-132 [अभिगमन तिथि 8 जून 2014].

Bluemel, J.; Korte, S.; Schenck, E. & Weinbauer, G. (eds.) (2015) The nonhuman primate in nonclinical drug development and safety assessment, Amsterdam: Academic Press.

Caplan, A. L. (1983) “Beastly conduct: Ethical issues in animal experimentation”, Annals of the New York Academy of Sciences, 406, pp. 159-169.

Chader, G. G. (2002) “Animal models in research on retinal degenerations: Past progress and future hope”, Vision Research, 42, pp. 393-399 [अभिगमन तिथि 18 अक्टूबर 2013].

Cothran, H. (ed.) (2002) Animal experimentation: Opposing viewpoints, San Diego: Greenhaven.

DeGrazia, D. (1999) “The ethics of animal research: What are the prospects for agreement?”, Cambridge Quarterly of Healthcare Ethics, 8, pp. 23-34.

European Commission (2013) Seventh report on the statistics on the number of animals used for experimental and other scientific purposes in the member states of the European Union, Brussels: European Commission [अभिगमन तिथि 2 सितम्बर 2016].

European Science Foundation Policy Briefing (2001) The use of animals in research, 2nd ed., Strasbourg: European Science Foundation.

Frey, R. G. & Paton, W. (1989) “Vivisection, morals and medicine: An exchange”, in Regan, T. & Singer, P. (eds.) Animal rights and human obligations, Englewood Cliffs: Prentice Hall, pp. 223-226.

Gavin, S. L. & Herzog, H. A. (1992) “The ethical judgment of animal research”, Ethics & Behavior, 2, pp. 263-286.

Górska, P. (2000) “Principles in laboratory animal research for experimental purposes”, Medical Science Monitor, 6, pp. 171-180 [अभिगमन तिथि 22 जून 2021].

Guillen, J. (ed.) (2013) Laboratory animals: Regulations and recommendations for global collaborative research, San Diego: Academic Press.

Kirk, A. D. (2003) “Crossing the bridge: Large animal models in translational transplantation research”, Immunological Reviews, 196, pp. 176-196.

Langley, G. (ed.) (1990) Animal experimentation: The consensus changes, London: MacMillan.

Matsuda, Y. (2004) “Recent trends in the number of laboratory animals used in Japan”, ATLA: Alternatives to Laboratory Animals, 32, suppl. 1A, pp. 299-301.

Ninomiya, H. & Inomata, T. (1998) “Current uses of laboratory animals in Japan and alternative methods in research, testing and education”, Applied Animal Behaviour Science, 59, pp. 219-25.

Orlans, F. B. (1998) “History and ethical regulation of animal experimentation: An international perspective”, in Kuhse, H. & Singer, P. A companion to bioethics, Oxford: Blackwell, pp. 399-410.

Rice, M. J. (2011) “The institutional review board is an impediment to human research: The result is more animal-based research”, Philosophy, Ethics, and Humanities in Medicine, 6 [अभिगमन तिथि 13 अक्टूबर 2013].

Rowan, A. N. (1984) Of mice, models and men: A critical evaluation of animal research, Albany: State University of New York Press.

Russell, W. M. S. & Burch, R. L. (1959) The principles of humane experimental technique, London: Methuen.

Swart, J. A. A. (2004) “The wild animal as a research animal”, Journal of Agricultural and Environmental Ethics, 17, pp. 181-197.

Tannenbaum, J. & Rowan, A. N. (1985) “Rethinking the morality of animal research”, Hastings Center Report, 15 (5), pp. 32-43 [अभिगमन तिथि 22 सितम्बर 2012].


नोट्स

1 Nuremberg Military Tribunals (1946-1949) Trials of war criminals before the Nuernberg Military Tribunals under Control Council Law no. 10, Washington, D. C.: U. S. Government Printing Office [अभिगमन तिथि 14 अप्रैल 2012].

2 World Medical Association (1964) Declaration of Helsinki: Recommendations guiding doctors in clinical research, Helsinki: 18th WMA General Assembly [अभिगमन तिथि 30 अक्टूबर 2020].

3 देखें Nuffield Council on Bioethics (2005) The ethics of research involving animals, London: Nuffield Council on Bioethics, pp. 135-157 [अभिगमन तिथि 25 जून 2020].

4 Botham, P. A.; Basketter, D. A.; Maurer, T.; Mueller, D.; Potokar, M. & Bontinck, W. J. (1991) “Skin sensitization—a critical review of predictive test methods in animals and man”, Food and Chemical Toxicology, 29, pp. 275-286. Lang, C. M. (2009) “The cost of animal research”, Lab Animal, 38, pp. 335-338. Royal Society (2004) The use of non-human animals in research: A guide for scientists, London: The Royal Society. MORI (2002) The use of animals in medical research study, conducted for the Coalition of Medical Progress, March – May 2002, London: MORI. Monamy, V. (2009 [2000]) Animal experimentation: A guide to the issues, 2nd ed., Cambridge University Press. Orlans, F. B. (1993) In the name of science: Issues in responsible animal experimentation, Oxford: Oxford University Press. Chow, P. K.; Ng, R. T. & Ogden, B. E. (2008) Using animal models in biomedical research: A primer for the investigator, Singapore: World Scientific. Committee to Update Science, Medicine, and Animals; Institute for Laboratory Animal Research; Division on Earth and Life Studies & National Research Council (2004) Science, medicine, and animals, Washington, D. C.: National Academies Press.

5 उदाहरण के लिए देखें Sharpe, R. (1994) Science on trial: The human cost of animal experiments, Sheffield: Awareness Books; Croce, P. (1999) Vivisection or science: An investigation into testing drugs and safeguarding health, 2nd ed., New York: Zed. See also: Greek, J. S. & Greek, R. (2000) Sacred cows and golden geese: The human cost of experiments on animals, New York: Continuum; (2003) Specious science: Why experiments on animals harm humans, New York: Bloomsbury Academic.

6 देखें LaFollette, H. & Shanks, N. (1997) Brute science: Dilemmas of animal experimentation, New York: Routledge; Shanks, N. & Greek, C. R (2009) Animal models in light of evolution, Boca Raton: Brown Walker.

7 European Parliament & Council of the European Union (2010) “Directive 2010/63/EU of the European Parliament and of the Council of 22 September 2010 on the protection of animals used for scientific purposes”, Official Journal of the European Union, 20.10.2010, pp. L. 276/33-79 [अभिगमन तिथि 12 फेब्रुअरी 2014].

8 National Agricultural Library (2013 [1966]) Animal Welfare Act, Washington, D. C.: National Agricultural Agriculture [अभिगमन तिथि 11 अप्रैल 2021].

9 Japan. Ministry of Environment (2000 [1973]) “Law for the Humane Treatment and Management of Animals”, Anti-Vivisection Action Network [अभिगमन तिथि 16 मार्च 2014]. देखें Shoji, K. (2008) “Japanese concept and government policy on animal welfare and animal experiments”, Alternatives to Animal Testing and Experimentation, 14, pp. 179-181; Takahashi-Omoe, H. & Omoe, K. (2007) “Animal experimentation in Japan: Regulatory processes and application for microbiological studies”, Comparative immunology, microbiology and infectious diseases, 30, pp. 225-246.

10 VanDeVeer, D. & Regan, T. (eds.) (1987) Health care ethics: An introduction, Philadelphia: Temple University Press. Clune, A. C. (1996) “Biomedical testing on nonhuman animals: An attempt at a ‘rapprochement’ between utilitarianism and theories of inherent value”, The Monist, 79, pp. 230-246. Singer, P. (1996) “Ethics and the limits of scientific freedom”, The Monist, 79, pp. 218-229.