जानवरों को उनके फर (रोयेंदार छाल) के लिए पकड़ना

वे जो फैक्ट्री खेतों में उनके फरों के लिए क़ैद कर रखे गए हैं इसके अलावा, इस उद्देश्य के लिए जंगल में प्रति वर्ष लाखों जानवर मारे जाते हैं । यहां कई तरीके हैं जिससे जानवर उनके फर (छाल) के लिए फंसाए और शिकार किए जाते हैं । अधिकतर धीमी, अतिपीड़ादायक मृत्यु को प्राप्त होते हैं ।

जाल

प्रति वर्ष लाखों जानवर मरते हैं, जालों के शिकार उनके फर के लिए पकड़ने हेतु प्रयोग होते हैं । कोयोट्स, भेड़िए, रैकून, एर्माइन, ऑटर्स, बीवर्स, लिंग्जेज, पाइन मर्टेंस और मिंक्स इन जालों द्वारा लक्षित कुछ जानवर हैं । इनमें से ज़्यादातर यू एस ए में फंसाए गए, जहां यह आकलन किया गया है कि प्रति वर्ष लगभग पांच मिलियन जानवर इस तरीके से पकड़े और मारे जाते हैं ।1 लाखों और अन्य देशों में मरते हैं, हालांकि पूर्ण आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं । फंसे जानवर केवल जालों द्वारा होने वाले दर्द से ही नहीं, बल्कि भयानक मानसिक संकट से भी पीड़ित होते हैं । कई फंसे जानवर पेशीविकृति विकसित कर लेते हैं (सफ़ेद पेशीय बीमारी से भी ज्ञात), जो चरम स्थितियों में पेशियों के अति उपयोग के कारण होने वाले गंभीर तनाव का परिणाम है । यह पेशी के टूटने और यहां तक कि मौत का कारण भी हो सकती है ।2

जानवरों द्वारा महसूस की जाने वाली घबराहट भी अक्सर मुक्त होने के उनके संघर्ष के दौरान होने वाली चोटों से उत्तेजित होती है जब वे छूटने का प्रयास करते हैं । एक उदाहरण जाल के लोहे को आततायी (बेतहाशा) रूप से काटने से उनके जबड़ों को होने वाली हानि है ।

कई मामलों में, जाल पानी के नीचे छोड़ दिए जाते हैं और जानवरों को डूब जाने तक रोक के रखते हैं । इनमें फंसे हुए जानवर, जैसे कि मिंक, बेवर्स या मस्क्रेट्स डूबने के भयानक अनुभव से बचने के लिए आतंक में संघर्ष करते हैं । वे कुछ मिनटों के लिए आसपास हिंसक रूप से छटपटाते हैं । बीवर के लिए उन्हें डूबने से मरने में लगभग 15 मिनट लग सकते हैं ।3

यहां जंगल में लगाए गए जालों में बहुत थोड़ा नियंत्रण होता है, जिससे किसी भी प्रजाति के जानवर उन पर गिरने के प्रति सुग्राही होते हैं । अंगुलेट्स, गरुड़, कुत्ते, और घरेलू बिल्लियां अनचाही नियमित शिकार हैं ।

यहां अलग – अलग प्रकार के जाल हैं, जिनमें से कुछ जानवरों को मारने के लिए हैं और अन्य उन्हें रोके रखने के लिए हैं जब तक कि पाशिक (जाल में फंसाने वाला) आ न जाए । जो जानवर जालों से नहीं निकल सकते वे फंसे रहेंगे जब तक कि वे भूख, दम घुटने, ख़ून बहने, अन्य जानवरों द्वारा शिकार से मर ना जाएं, या जब तक कि पाशिक द्वारा पाए और मार न दिए जाएं ।

जाल में पाए गए एक जानवर को मारने का सामान्य तरीका उनके सिर को स्थिरीकृत करना है, आमतौर पर एक पैर से उनकी गर्दन या सिर पर चढ़ना, और दूसरे पैर से कुछ मिनटों तक उनकी छाती पर उनका दम घुटने तक दबाना । इस तरीके में, जानवर का महत्वपूर्ण फर ख़राब नहीं होता ।

जानवरों को बहुत धीमे तरीके से मारने के लिए जाल नियोजित होते हैं, जिससे वे केवल अपने जीवन से वंचित नहीं होते, बल्कि अक्सर उन्हें धीमे मरने के दौरान भयानक दर्द देते हैं, जैसा कि नीचे बताया गया है ।4

नीचे कुछ सबसे सामान्य प्रकार के जाल दिए गए हैं:

फंसाने के गड्ढे

फंसाने के गड्ढे जमीन में खोदे गए गहरे गड्ढे हैं जिसमें जानवर गिरते हैं और बाहर नहीं निकल सकते । कभी – कभी गड्ढे खाली होते हैं और फंसानेवाले जानवरों को जीवित बाहर निकालते हैं, और कभी – कभी गड्ढे पानी से भरे होते हैं जिससे जानवर डूबते और मरते हैं ।

जाल पिंजरे

जाल पिंजरे जानवरों को पकड़ने के लिए प्रयोग किए जाते हैं यह तय करते हुए कि वे दिखने योग्य किसी हानि से पीड़ित ना हों जिससे उनके फर की आर्थिक कीमत ना घटे ।

इन पिंजरों की छत लोहे की जाली, लोहे के तख्ते, प्लास्टिक, लकड़ी या यहां तक की तनों से ढ़ंके जा सकते हैं । यह इसलिए कि क़ैद रहने के दौरान जानवर मौसम के विरुद्ध सुरक्षित रहेंगे । इस कारण से, ये पिंजरे जानवरों को पकड़ने के “कम क्रूर” तरीके माने जाते हैं, किन्तु केवल इसलिए कि जाल पिंजरे जानवरों को पकड़ने के अन्य भयानक तरीकों से तुलना किए गए हैं । फंसाने का यह प्रकार भी जानवरों के लिए काफ़ी घबराहट का कारक होता है जो भाग निकलने में असमर्थ होने पर घबराते (आतंकित) होते हैं और जो अंततः अपने जीवन से दर्दनाक तरीके से वंचित हो मर जाते हैं । जानवर चारों के उपयोग द्वारा जाल के प्रति आकर्षित किए जाते हैं, जो या तो परिष्कृत भोजन या जीवित जानवर हो सकता है, जबकि वे उड़ या अपना बचाव नहीं कर सकते, बचने की बिना किसी संभावना के निगल लिए जाएंगे ।

केवल एक दरवाज़े वाले पिंजरों में, पिंजरे के पीछे चारा लगाया जाता है जहां एक बटन होता है जो दरवाज़ा बंद कर देगा और पिंजरे को बंद कर देगा । दो दरवाज़ों वाले पिंजरे में, बटन और चारा पिंजरे के बीच में लगे होते हैं ।

पंजे पकड़नेवाले / पैर पकड़नेवाले जाल

ये सबसे ज़्यादा पैमाने पर प्रयोग किए जाने वाले जाल हैं और कई अलग प्रकार वाले हैं । ये जाल दो इस्पात “जबड़ों” से मिलकर बने ढांचे होते हैं जो 180′ कोण पर खुले होते हैं और जानवरों के अंग पर तुरंत बंद हो जाते हैं जैसे ही वे बटन के संपर्क में आते हैं । जो जानवर इन जालों में शिकार की तरह गिरते हैं वे हड्डी टूटने और पेशी, अस्थि – बंध और त्वचा फटने से पीड़ित होते हैं । वे ख़ुद को मुक्त करने के प्रयास से जूझते हैं और इस प्रक्रिया में अपने ख़ुद के अंग भी काट सकते हैं । दर्द के बावजूद, अपना ख़ुद का पैर नष्ट करना ही उनके निकलने का एकमात्र मौका है, हालांकि एक बार मुक्त हो जाने पर वे ज़्यादातर संभावित रूप से रक्तस्राव (ख़ून बहने) या संक्रमण के कारण मर जायेंगे । एक संक्रमित अंग आधे एक घंटे में परिगलन विकसित कर सकता है, जो तुरंत कोथ (मांस के सड़ने) में बदल (विकसित) सकता है ।

ये जाल लगभग 100 देशों में प्रतिबंधित हैं । वर्ष 1995 में यूरोपियन यूनियन के 15 देशों में इनका इस्तेमाल प्रतिबंधित था ।

कोनीबेयर

ये जाल इनमें गिरने वाले जानवरों को मारने के लिए रूपांकित (बनाए) गए हैं । ये शरीर जकड़ने वाले वाले जाल हैं जिनमें लोहे के बने संयोजित जबड़े होते हैं जो इनमें गिरने वाले जानवरों में घुटन या गर्दन या पीठ तोड़ने को प्रवृत्त कर सकते हैं । इनसे मौतें अक्सर धीमी और अतिपीड़ादायक होती हैं ।

जाल ऊर्ध्वाधर (लंबवत) लगाए जाते हैं जिससे जब जाल सक्रिय हो, तो जानवर अपने सिर या पूरे शरीर सहित इसके अंदर हों बजाय कि सिर्फ एक पैर, जैसे पैर पकड़ने वाले जाल । वे आमतौर पैर मांद (बिल) के रास्ते या उनके निकट लगाए जाते हैं ।

यह अत्यंत असंभव है कि एक जानवर कोनीबेयर जाल से बचेगा । जाल का तंत्र जानवर के लिए बच निकलने को वास्तव में असम्भव बनाता है, और यहां तक कि यदि वे बचा लिए जाएं, तो अधिकतर मामलों में घाव गंभीर होते हैं ।

फंदे

फंदे आमतौर पर शाखा या पेड़ से बंधे, जमीन पर बिछे हुए तार हैं । जब जानवर खिंचे हुए फंदे पर कदम रखते हैं, तो फंदा जानवरों को उनकी गर्दन या शरीर से फंसा लेता है और उन्हें हवा में लटका देता है । यह दम घुटने से जानवरों कि धीमी मृत्यु से पीड़ित होने का कारक होता है । इसके अलावा प्रायोजित शिकारों में, यह आकलन किया गया है कि फंसे हुए जानवरों का 21% से 69% के बीच हटा दिए गए जबकि फर उद्योग के लिए वे वांछनीय नहीं हैं ।5

सील का शिकार करना

हालांकि फंसाने या खेती किए जाने वाले अधिकतर जानवर वे है जिनके फर उपयोग में लाए जाते हैं, कुछ जैसे की सील शिकार किए जाते हैं ।6 कई उत्पाद सील के शवों से आते हैं, लेकिन फर मुख्य है । हार्प सील, ग्रे सील और हुडेड सील के व्यापारिक शिकार का मौसम नवंबर 15 से मई 15 तक रहता है । यह गतिविधि मुख्य रूप से कनाडा, ग्रीनलैंड, रूस, और नॉर्वे, साथ ही साथ अन्य जगहों जैसे दक्षिणी अफ़्रीका में घटित होती है ।7

ज़्यादातर शिकार प्रजनन (बच्चे पैदा करने) के दौरान होता है: मार्च के अंत में सेंट लॉरेंस कि खाड़ी में, अप्रैल के पहले और दूसरे हफ़्ते में टैरानोवा के उत्तर – पूर्व में । इस अवधि के दौरान युवा सील अपना पूरा समय बर्फ़ पर बिताती हैं, जहां वे काफ़ी असुरक्षित (कमज़ोर) होती है जैसे कि वे बर्फ़ पर धीरे – धीरे चलती हैं या उनके लिए भोजन लाने वाले अपने अभिभावकों (माता – पिता) का इंतजार करती हैं ।

उनकी मौतें

हर साल, विश्व भर में सैकड़ों हज़ार सील उनके फर के लिए मारी जाती हैं, अधिकतर कनाडा में ।

जिन सील्स का शिकार किया जाता है वे एक वर्ष से भी कम जी हुई होती हैं । वे उनके सिर पर आघात के द्वारा मारी जाती हैं जब तक कि उनका दिमाग संदलित (कुचल) ना दिया जाए । उनके जीवित रहने के दौरान उनकी त्वचा (ख़ाल) खींच लिया जाना भी सामान्य है ।

यहां सील्स को मारने के दो तरीके आधिकारिक तौर पर स्वीकार्य हैं: बंदूक चलाना और लकड़ी का गदा । अधिकतर शिकारी गदा को वरीयता देते हैं क्योंकि बंदूक चलाना सील के कीमती फर को ख़राब कर सकता है । पारंपरिक लकड़ी के गदा के अलावा, यहां इसके लिए ख़ासतौर पैर बनाया गया यंत्र है जिसे “हकापिक” कहते हैं । हकापिक लकड़ी के गदा हैं जिनके एक सिरे पर हथौड़े और दूसरे पर लोहे के हुक का आकार होता है । हथौड़ा सील की खोपड़ी तोड़ने के लिए होता है जबकि दूसरा सिरा जानवर के शरीर में फंसा कर बर्फ़ के ऊपर घसीटने के लिए बना होता है । अधिनियम कहते हैं कि शिकारी जानवरों को उनके रक्तस्राव और ख़ाल उतारने के पहले मार डालें, लेकिन यहां वास्तव में जांच करने का कोई तरीका नहीं है कि सील की ख़ाल नहीं उतारी जा रही है जबकि बे जीवित और सचेत (होश में) हैं । यह तथ्य से अलग है कि यहां तक कि जब अधिनियम पालन किए जाते हैं, तब भी जानवर अपने जीवन से वंचित होते हैं ।

उपयोग और प्रतिबंध

वर्ष 2009 में, यूरोपियन यूनियन ने सील उत्पादों (उनके मांस, फर, तेल, अंगों..) के व्यापारीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया, जो एस्किमो द्वारा आर्थिक निर्वाह के रूप में पारंपरिक तौर पर प्राप्त किए गए हैं उनके अलावा (हालांकि यहां तक कि उनके पास दूसरे उपाय हैं) । मानक यूरोपियन संसद के सदस्यों के बहुमत, 550 वोट पक्ष में, 49 विरोध में और 41 अनुपस्थित8 द्वारा समर्थित किया गया । वर्ष 2011 फरवरी में, कनाडा ने इस मानक के विरुद्ध विश्व व्यापार संगठन9 में अपील की, किन्तु वे मुक़दमा (केस) हार गए ।10

इस प्रतिबंध के बावजूद, वर्ष 2010 में कनाडाई सरकार ने के वैध शिकार का कोटा 336,200 से बढ़ाकर 388,200 11 जानवर कर दिया । सील उत्पादों पर यूरोपियन यूनियन के प्रतिबंध के बावजूद, सील का शिकार जारी रह सकता है; यहां चीन और कुछ अन्य देशों में सील उत्पादों की बढ़ती हुई मांग है ।12


आगे की पढाई

Banci, V. & Proulx, G. (1999) “Resiliency of furbearers to trapping in Canada”, Proulx, G. (ed.) Mammal trapping, Sherwood Park: Alpha Wildlife Research and Management, pp. 1-46.

Canada (2013 [1993]) Marine Mammal Regulations: SOR/93-56 [अभिगमन तिथि 22 फरवरी 2014].

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टिप्पणियाँ

1 United States Department of Agriculture. Animal and Plant Health Inspection Service (2008) “Wildlife Services’ 2007 Annual Tables”, Program Data Report.

2 Chalmers, G. A. & Barrett, M. W. (1982) “Capture myopathy”, Hoff, G. L. & Davis, H. W. (eds.) Noninfectious Diseases of Wildlife, Ames: Iowa State University Press, pp. 84-94. Fowler, A. (2020) “Capture myopathy”, Ozark [अभिगमन तिथि 10 अक्टूबर 2020]. Hartup, B. K.; Kollias, G. V.; Jacobsen, M. C.; Valentine, B. A. & Kimber, K. R. (1999) “Exertional myopathy in translocated river otters from New York”, Journal of Wildlife Diseases, 35, pp. 542-547 [अभिगमन तिथि 16 अप्रैल 2020].

3 Gilbert, F. F. & Gofton, N. (1982) “Terminal dives in mink, muskrat and beaver”, Physiology & Behavior, 28, pp. 835-840. Ludders, J. W.; Schmidt, R. H.; Dein, J. & Klein, P. N. (1999) “Drowning is not euthanasia”, Wildlife Society Bulletin, 27, pp. 666-670.

4 Iossa, G.; Soulsbury, C.D. & Harris, S. (2007) “Mammal trapping: A review of animal welfare standards of killing and restraining traps”, Animal Welfare, 16, pp. 335-352.

5 Kirkwood, J. K. (2005) Report of the Independent Working Group on Snares, London: Department for Environment Food and Rural Affairs, p. 8 [अभिगमन तिथि 5 नवंबर 2013].

6 सील वसा और सील तेल स्नेहक की तरह उपयोग होते हैं, साथ ही साथ साबुन बनाने, चमड़ा चमकाने और ऑर्च रेड पिगमेंट के उत्पादन में आधार की तरह । Fisheries Heritage (2020) “Red ochre”, Fisheries Heritage, March 28 [अभिगमन तिथि 29 मार्च 2020]. उनके शिश्न की एशियन बाज़ार में काफ़ी मांग है इस अजीब विश्वास के कारण कि इनमें कामोद्दीपक गुण हैं ।

7 Lavigne, D. M.; Perrin, W. F.; Wursig, B. & Thewissen, J. G. M. (eds.) (2009) Encyclopedia of marine mammals, 2nd ed., Burlington: Academic Press.

8 European Parliament (2009) “MEPs adopt strict conditions for the placing on the market of seal products in the European Union”, Press Release, European Parliament, 05-05-2009 [अभिगमन तिथि 30 जून 2013].

9 BBC News (2009) “EU seal ban challenged by Canada”, BBC, 27 July [अभिगमन तिथि 25 जून 2013].

10 Noronha, C. (2014) “European Union seal products ban upheld by WTO”, Huffpost Green, 05/23/14.

11 Government of Canada (2010) “Minister Shea increases quota for Atlantic seal harvest”, News, Government of Canada, March 15 [अभिगमन तिथि 29 जुलाई 2020].

12 केवल फर की मांग नहीं है, बल्कि अन्य सील उत्पादों की भी है । जनवरी 2011 में, कनाडा और चीन ने एक सहकारिता समझौते पर हस्ताक्षर किया को खाद्य सील उत्पादों को मान्यता देता है, ख़ासतौर से मांस, तेल अर ओमेगा 3 परिपूरक ।