प्राकृतिक आपदा में जानवर

जंगल में रहने वाले पशु प्राकृतिक आपदा के समय आघात योग्य है । भूकंप,तूफान,ज्वालामुखी विस्फोट , सुनामी,जंगल की आग का पशुओं पे विनाशकारी परिणाम हो सकता है । कई जानवरों की मौत हो जाति है,कुछ डूब जाते हैं, या धूल,राख,लावा , या बर्फ़ में जि़न्दा दफ्न हो जाते हैं । कोई ढह गया हुआ या जला दिए गए बिलों में मर जाते हैं,कुछ की पेडो़ या चट्टानों से टकराव के कारण या फिर ओलों के गिरने के वजह से मृत्यु हो जाति है । उनमें से कुछ घातक चोट झेलते हैं,जैसे आँखों ,पंखों और गिल्स में छोटा घाव या घर्षन ,श्वसन और पाचन संबंधी विकार,घिसे हुए दांत,कुपोषण; और दूषित भोजन और पानी से विषाक्तता । भिषण ज्वालामुखी विस्फोट और आग ,क्षेत्रीय मौसम को अस्थायी रूप से बदल सकते हैं,हवा को ठंडा या गर्म करके , हवाओं को दिशा को बदलके या बारिश का कारण बनके । ज्वालामुखी, तूफान और बाढ़ सीधे समुद्री जानवरों को मार सकते हैं या मलबे को जमा करने और पानी के तापमान और लवणता को प्रभावित करके दीर्घकालिक समस्याओं का कारण बन सकते हैं । यह सब समुद्री जानवरों के स्वास्थ्य समस्याओं में योगदान देते हैं जबकि पानी के संचलन को बदलने से, जो पोषक तत्वों की उपलब्धता और पानी के तापमान को और प्रभावित करता है ।1

एक आपदा को हम इंसानी रुप से एसे व्याख्या कर सकते हैं कि यह एक विपत्तिपूर्ण घटना है जो कि बाहरी सहायता के बिना प्रतिक्रिया करने की समुदाय की क्षमता से अधिक है ।2 हालाँकि कुछ आपदा के वर्ण न में सिर्फ वैसि घटनाएँ शामिल है जिसमें मनुष्य प्रभावित होते हैं , अमानवीय जानवर भी बड़ी संख्या में प्रभावित होते हैं और अक्सर उनमें क्षमता और संसाधनों की कमी होती है ताकि वे आपदा के बाद समायोजित कर पाए । आमतौर पर , प्राकृतिक आपदा जो मनुष्यों को क्षति पहुँचाते हैं, उससे अमानविय जानवरों की भी हानि होति है । यहां तक ​​कि असामान्य प्राकृतिक घटनाएं जो मानव मानकों के लिए हल्के हैं, जंगल में रहनेवाले जानवरों के लिए विनाशकारी हो सकते हैं ।

प्राकृतिक आपदा में एक अमानवीय जानवर के अस्तित्व को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल हैं: प्रजातियों में विशेष अनुकूलन होना,जीवन का वह चरण जिसमें वह है,वह प्रजनन का मौसम है या नहीं,क्या वह घुमंतू है या उसके पास भागने के अन्य साधन हैं,और वह जिस विशेष आवास में रहता है । कुछ अन्य कारकों जिनसे वह जूझती है जैसे उसकी शारीरिक स्थिति से सामना या खुद की देखभाल करने की क्षमता ।3 एसे जानवर जिनकी तिव्र दृष्टि हो,सुनने कि क्षमता हो और अन्य इंद्रियां हो वे आसानी से बच सकते हैं ।4 जैसे कुछ पक्षियाँ जो उड़ जाते हैं या बढे़ जानवर जो पलायन कर जाते हैं । छोटे जानवर आसानी से डूब जाते हैं, उनके बिलों में बाढ़ या भारि बारिश के वजह से पानी भर जाता है, या फिर कुचल जाते हैं या जल जाते हैं जब वे एसी जगह फंस जाते हैं जहाँ से पलायन मुश्किल है ।

पशुओं का विस्थापन भी होता है,या तो इसलिए कि वे सुरक्षित स्थानों पर चले गए या क्योंकि वे तेज हवाओं या बाढ़ के पानी से बह गए हो । अगर विस्थापित जानवर एक छोटे जगह पर एकत्रित हो जाते हैं तब रोग और परजीवी संक्रमण का प्रमुख प्रकोप का कारण बन सकते हैं । सीमित खाद्य आपूर्ति के कारण कुपोषण और भुखमरी भी प्रमुख जोखिम बन जाते हैं । यदि उनके पास पर्याप्त आश्रय नहीं है, तो सूरज, ठंड, या हवा के संपर्क में आने से जानवर भी प्रभावित हो सकते हैं ।

 

भूकंप और सुनामी

युनाईटेड स्टेट्स जिओलोजिकल सर्वे(USGS) के अनुसार हर साल दुनिया भर में 15-20 बड़े भूकंप आते हैं जिनकी तीव्रता 7.0 से अधिक होती है और 5.0 से ऊपर मापी जाती है ।5 तूफान और ज्वालामुखी विस्फोट कि तुलना में, भूकंप बिना किसी चेतावनी से आता है ।6 हिलती हुई भूमि के अलावा, वे सीबेड को हिला और विस्थापित कर सकते हैं । द्विपें और समुद्र तट धसकति ज़मीन से विलुप्त हो सकति है या आकार में दुगनि हो सकति है क्योंकि इसके आसपास की भूमि का उत्थान होता है ।7 जब समुद्र तल विस्थापित होति है, तो वह एक सुनामी पैदा कर सकती है, जो उच्च, तेज लहरों की एक श्रृंखला है जो जल्दी से शुरू होती है, महासागरों को पार कर सकती है, और दिनों तक रह सकती है ।8 इसके बाद भूस्खलन हो सकता है जो जानवरों को जिंदा दफना देते हैं और उनके घरों को नष्ट कर देते हैं 9 या बाढ़ जो उन्हें बहा सकते है ।

2016 का एक भूकंप जो निउ जी़लैन्ड के सामने काइकुरा में हुआ था उसका वहाँ पर रहनेवाले जानवरों पर विध्वंसकारी प्रभाव था । उस समय हटन के शियरवेटर्स, सीबर्ड्स के एक कॉलोनी सबसे ज्या़दा प्रभावित हुए थे जो भूकंप के समय घोंसला बना रहे थे । बड़ी प्रजनन कॉलोनी के आधे हिस्से चट्टानों के गिरने से दफना गए थे , और अनुमान है कि 100,000 पक्षियों में से 25% की मृत्यु हो गई थी ।10 भूकंप ने सीबेड के आकार और ऊंचाई को बदल दिया, नाटकीय रूप से पानी के नीचे के वातावरण को बदल दिया जिनपे क्रेफ़िश, पौआ (एक प्रकार का समुद्री घोंघा) और अन्य समुद्री जानवरों निर्भर करते है ।11

जो भूकंप से बच गए, उन्होंने खुद को एक अपरिचित वातावरण में पाया, जिसमें वे जीवित रहने के लिए संघर्ष करते रहे । यह भी संभावना है कि भूकंप के दौरान कुछ सीलों की मौत हो गई, क्योंकि भूस्खलन से उनके प्रजनन क्षेत्र बह गए थे ।

जब सुनामी होता है ,उस समय पक्षियाँ और छोटे जानवर पानी में बह जाते हैं और सुखी ज़मीन टर नही आ पाते हैं । कुछ तो अपने घोंसले से दूर, अंतर्देशीय धकेल दिए जाते हैं । पक्षियों के घोसलें जिसमें गर्माहट होनी चाहिए वह ठंडे समंदर पानी से भर जाते है । समुद्र के किनारे उथले पानी में रहने वाले समुद्री पक्षी और मछलियां रेत या मलबे में जिंदा दफन हो जाते हैं । मछलियाँ समुद्र तट पर बह जाते हैं जहाँ पर पानी से बाहर आ जाने के कारण उनका दम घुट जाता है । जब समंदर का पानी मीठे पानी के श्रोत से मिलता है तो वह भी नमकीन हो जाता है । भोजन का श्रोत भी बह जाता है ।12

सुनामी का कारण बनने के अलावा, भूकंप आग का कारण बन सकता है, जिसके वजह से आगे मौत, चोट और घर भी नष्ट हो सकते हैं ।

 

ज्वालामुखी विस्फोट

दुनियाभर में करीब 20 ज्वालामुखी है जो कभी भी विस्फोटित हो सकते हैं, उसके अंतर्गत वह ज्वालामुखी नही हैं जो पानी के निचे विस्फोटित होते हैं, और वह अधिकांश में पाए जाते हैं ।13 यह विस्फोट महिनों या सालों तक चल सकते हैं , जो अपघर्षक और विषाक्त लावा उगलते हैं , जो विस्फोट का कारण बन सकते हैं जो आस पास के पानी को गर्म करके समुद्री जानवर को उबाल सकते हैं ।

जब विस्फोट किसी द्वीप में होता है , तब वहाँ के लौकिक और निकट सामुद्रिक जीवों कि मृत्यु हो जाति है या विस्थापित हो जाते हैं । द्वीपों पर स्थलीय जानवर समुद्री जानवरों की तुलना में बदतर होते हैं क्योंकि वे घोंसले के शिकार और भूमि पर अधिक निर्भर होते हैं ।14 जिस तरह पक्षियाँ जिनके घोंसले कालडेरा में होतें हैं पलायन नही कर पाते हैं वैसे ही न्नहें पक्षी भी ज्या़दा दूर तक नही उड़ पाते हैं । समुद्री जीव समुद्र से निकल पाते हैं परंतु उनके बच्चों की तट पर ही मृत्यु हो जाती है । अगर द्वीप पूरी तरह से लावा से ढक जाता है , तब दूसरे जानवरों को भागने या पलायन का भी मौका नहीं मिलता है और वे लावा या राख से ढक जाते हैं । ज्वालामुखी विस्फोट से हर एक जंतु कि मृत्यु हो सकती है जो उस द्वीप में फ़ँस गया है, और उन प्राणियों के वास को नष्ट कर देता है जो पलायन करने में सक्षम हैं , और उनको वहाँ से विस्थापित करने में दबाव डाला जाता है ।

गर्म लावा या राख जो पानी के श्रोत में बह जाता है वह ज्वारपूल के उन प्राणियों को मार सकता है जो पलायन नही कर पाते हैं । लावा और राख पानी की अम्लता और मैलापन को भी बदलते हैं, जिससे कई समुद्री जीव स्थानांतरित होने पे मजबूर हो जाते हैं । लावा और कई अन्य मलबे मछलियों के गिल्स में जाके घुटन का कारण बन सकते हैं और लावा कई छोटे कांच के टुकडे़ छोड़ जाते हैं जो बहते पानी के साथ जब मछलियों के गिल्स तक पहुँचते हैं तो हानी पहुँचा सकते हैं ।

ज्वालामुखियों के साथ भूकंप और भूस्खलन, गैस उत्सर्जन और विस्फोट हो सकते हैं, जिसमें पानी के नीचे हाइड्रोजन गैस विस्फोट भी शामिल हैं ।15 ये विस्फोट अपने चारों ओर पानी का तापमान बढ़ाते हैं, पानी को अम्लीय करते हैं, और इसे डीऑक्सीजनेट करते हैं । यह मछलियों को मार सकते हैं या उनके क्षेत्र को छोड़ने का कारण बन सकते हैं, और उनके आवासों को नष्ट कर सकते है ताकि वे वापस ना आ सकें ।16

अगर वे सुरक्षित तट पर है फिर भी वे गरम पानी से पलायन के वक्त गुमराह हो सकते हैं और गरम पानी से उबलकर उनकी मृत्यु हो सकती है । हवाई में 2018 के विस्फोट ने ज्वार के ताल को ढंक दिया, और यहां तक ​​कि हवाई की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील में पानी उबला हुआ था, जिससे वहां रहने वाले जानवरों की मौत हो गई ।17

ज्वालामुखी विस्फोट से उतपन्न राख में हानिकारक रासायनिक पदार्थ और नुकिले काँच के टुकडे़ वहाँ के जीवों को विस्फोट के बाद सालभर हानी पहुँचाते हैं । राख के तेज किनारों से आंख और त्वचा में जलन होती है, और दांत, खुर और कीट के पंखों के लिए अपघर्षक होते हैं । राख के अंतर्ग्रहण से श्वसन संबंधी समस्याएं और जठरांत्र संबंधी रुकावट होती हैं ।18 राख और गैसें भोजन और पानी की आपूर्ति को नष्ट और दूषित कर रही हैं । ज्वालामुखीय क्षेत्रों में किशोर चराई वाले जानवर गंभीर दंत फ्लोरोसिस के साथ बड़े हो सकते हैं, जो उभरते हुए दांतों को नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसमें कमजो़र तामचीनी और आसानी से टूटने या खो जाने वाले दांत शामिल हैं । दाँतों की खराब स्थीति का उनके स्वासथ्य पे नुकसान पहुँचा सकते हैं ।19

अगर राख वायुमंडल तक पहुँच जाता है तो वह आसपास के जलवायु पर प्रभाव डाल सकता है । सल्फ्यूरिक एसिड या राख के कणों की बूंदें सूरज से विकिरण को रोककर तापमान को कई डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर सकती हैं । यह अधिक सामान्य जलवायु प्रभाव है, लेकिन यदि कण काफी बड़े हो तो , वे पृथ्वी से गैसों के पलायन को रोककर शीतलन के बजाय गर्माहट का कारण बन सकते हैं ।20

 

आंधी

तूफा़न से उतपन्न तेज़ हवा,बारिश और मलबे पशुओं को हानि पहुँचा सकते हैं या मारने में सक्षम हो सकते हैं और वह उनके वास स्थान को भी काफी़ खराब कर सकते हैं , जिसके अंतर्गत उनके घर नष्ट हो सकते हैं और खाने और पानी का श्रोत भी दूषित हो सकते हैं । 2019 में तूफान डोरियन के दौरान, हवाएं प्रति घंटे 295 किमी तक पहुंच गईं थी । तेज़ हवाएँ और वर्षा के कारण टूटे हुए अंग, सिर पर आघात और श्वसन संबंधी तकलीफें और फेफडो़ं में पानी जाने से संक्रमण हो सकता है । इससे जानवर विस्थापित और अनाथ हो जाते हैं । इसमें से अधिकतर समस्याएँ घातक नहीं होतीं अगर उन्हें ठीक से देखभाल मिलती, पर ऐसा नहीं है । कुछ भाग्यशाली स्तनधारियों और पक्षियों को देखभाल मिलती है अगर वे शहरी क्षेत्रों में उड़ जाते हैं और किसी के आंगन पर अस्त-व्यस्त पाए जाते हैं ।

सुपरसेल थंडरस्टॉर्म के रूप में घूर्णी तूफान 10 मील ऊंचे और ओलावृष्टि और बवंडर का कारण बन सकते हैं । बिलिंग्स में एक तूफान, 2019 मोंटाना में 74 मील प्रति घंटे (तूफान की ताकत) तक हवाएं थीं, और हजारों पक्षी- क्षेत्र के पक्षी निवासियों में से एक चौथाई – मारे गए या घायल हो गए जब वह दांतेदार ओलों के प्रकोप में आए जिसका आकार गोल्फ की गेंद जितना है ।21

जब स्थल पर आंधी आती है तब बडे़ जानवर ऊँचे स्थान ढू़ढ़ते हैं , और कुछ पक्षी बैरोमीटर के दबाव का अनुमान लगा सकते हैं और वहाँ से उड़ जाते हैं । मछलियाँ और अन्य समुद्री जानवर या तो गहराई में या किसी सुरक्षित स्थान में चले जाते हैं । कुछ जानवर जैसे कि कृंतक, सरीसृप, मकड़ियाँ और कीड़े नदी या समुद्र में गिरे हुए पेड़ों पर चढ़ जाते हैं ।22

तूफान की लहरें और तेज हवाएं समुद्र के तल पर इतना दबाव बना सकती हैं कि बड़ी मात्रा में तलछट और बड़ी वस्तुएं चारों ओर फेंक दी जाती हैं ।23 यह दबाव जो उत्पन्न हुआ है उससे समुद्रतल के सामने के ठंडे पानी और उथले गरम पाने का मेल होजाता है । यह ठंडे खून वाले जानवरों में हाइपोथर्मिया का कारण बन सकता है जो अपने शरीर के तापमान को विनियमित करने के लिए पानी के तापमान पर भरोसा करते हैं । पानियों के मेल के द्वारा उत्पादित तेज़ धाराएं कई छोटे और धीमी गति से चलने वाले जानवरों को मार सकते हैं जो तैरकर नहीं जा सकते ।24

कुछ जानवर या तो आंधी के कारण तैर कर चले जाते हैं या उन्हें थोडे़ भी दबाव का अनुमान लग जाता है,लेकिन प्रादेशिक जानवरों और धीमे तैराकों को तूफ़ान में पकड़ लिया जाता ह25 और वे मारे जाते हैं । जो प्राणी तैर नहीं सकते उन्हें लवणता में परिवर्तन के साथ संयुक्त पानी में ऑक्सीजन के स्तर का सामना करना पड़ता है । ये दो कारक खनिज और द्रव संतुलन को बाधित करते हैं, जिससे कुपोषण, ऑक्सीडेटिव तनाव और विकास समस्याएं होती हैं ।26

मछलियाँ एवं अन्य समुद्री जीव पानी के बहाव से काफी दूर चले या बह जाते हैं । समुद्री जीव काफी कोशिश करते हैं कि वे आंधी वाले क्षेत्र से दूर चले जाए परंतु फिर से वे तेज़ हवा से तट पर आ जाते हैं । 1992 में तूफान एंड्रयू के दौरान, लूसियाना के तट पर धोए जाने से नौ मिलियन मछलियों की मौत हो गई थी, और फ्लोरिडा के एक क्षेत्र में 182 मिलियन मछलियों को मार दिया गया था ।27 ठंडे रक्त वाले मछलियों और समुद्री जानवर तापमान और लवणता में बदलाव आने पर काफी दयनीय हो जाते हैं , जहाँ पर वह रूकते हैं ।28

तेज हवाएं पक्षियों, चमगादड़ों, टैडपोल, मछलियों और अन्य छोटे या जानवरों के बच्चों को विस्थापित कर सकती हैं ।29 घोंसलें और खाद्यों के श्रोत भी कहीं दूर फेंक दिए जाते हैं और जो बची हुई सामग्री हैं वह सड़ जाती हैं जिससे खाने और वास स्थान में कमी हो सकती है और इन संसाधनों के लिए जानवरों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है ।30 पक्षियाँ पेडो़ं के गर्त में या टहनियों को कसकर पकड़ के निम्न आँधी सहन कर सकते हैं ।31 आंधी के समय अगर वह अपने वास स्थल में रहें तो यह समस्या है कि जिन पेडो़ं पर वह रहते हैं अगर वह काट दिए जाएँ तो मृत्यु हो जाएगी,और इनमें से जो जीवित बच गए वह अपने घरों से मीलों दूर बह जाते हैं , और फिर वापिस आने की राह भूल जाते हैं , खासकर के अगर वह अपने झुंड से विछिन्न हो जाए तो ।

 

बाढ़

बाढ़ में छोटे प्राणियों का बाढ़ में या कीचड़ के धसने से डूब जाने या मर जाने कि संभावना ज्या़दा होती है ।32 बिलों में रहने वाले जानवर कुछ हद तक छोटी मोटी अशान्तियों से सुरक्षित हैं, पर मूसलाधार बारिश से उनके बिल नष्ट हो सकते हैं या उनमें पानी भरने से प्रवेश द्वार बंद हो सकता है , जिससे वे फ़ंस सकते हैं या बेघर हो सकते हैं । पानी या हवा द्वारा चारों ओर स्थानांतरित शाखाओं, पत्तों, पत्थरों और अन्य मलबे द्वारा बिलों के प्रवेश द्वार को अवरुद्ध किया जा सकता है । पत्तियां और मलबे समुद्री जानवरों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं, सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध कर सकते हैं, ऑक्सीजन के स्तर को कम कर सकते हैं क्योंकि वे उनके गलफड़ों को जाम करके मछलियों को सडा़ते और घुटाते हैं ।33

 

आग

एक जंगल की आग लाखों जानवरों को मार सकती है ।34 जंगल के आग द्वारा उतपन्न आग की लपटें और धुंआ अपने राह में आनेवाले जानवरों को मार सकते हैं जिनमें कई बिलों में रहने वाले जानवर जो ज़मीन के एकदम निकट हैं और जो नदियों और झीलों के पास है वह शामिल हैं । यहां तक ​​कि अगर वे आग से बच भी जाते हैं, लेकिन परिणामस्वरूप जानवरों को जलने, अंधेपन और सांस की समस्याओं से जूझना पड़ सकता हैं जो घातक या स्थायी रूप से उनको दुर्बल कर सकती है । तूफान बल हवाएं एक मील दूर तक आग से अंगारे और राख ले जा सकती हैं, जिससे नई आग लग सकती है ।35 मजबूत आग इतनी ऊर्जा उत्पन्न करते हैं कि वे हवा और तापमान को संशोधित करके स्थानीय मौसम को बदल सकते हैं । आग से निकलने वाली नमी बादलों को उत्पन्न कर सकती है जो बारिश का कारण बनती है ।36

विशालकाय स्थनधारी जानवर और पक्षियाँ दूसरे पशुओं कि तुलना में आसानी से बच जाते हैं । स्थनधारी जानवर भाग कर उच्च भूमि में पनाह ले सकते है ,जहां भूमि गीली है, या फिर धाराओं या झीलों में चले जाते हैं । बेहतर दृष्टि, श्रवण और गंध वाले जानवर अपना पलायन पहले से शुरू कर सकते हैं ।

कुछ जानवर, जैसे कि गिलहरी, साही37 , और कोआला38 पेड़ों पर चढ़कर दूर जाने की कोशिश करते हैं, जो आग से बचने कि अच्छी रणनीति नहीं है । दूसरे जानवर भी पलायन कि कोशिश करते हैं , परंतु डर कर अपनी गुफा़ओं में वापस आ जाते हैं ।

छोटे जानवर ज़मीन खोदकर अंदर जा सकते हैं पर अगर ज्या़दा गहराई तक नहीं गए तो वह ओवेन की गर्मी की तरह झुलस सकते हैं जब उनकी गुफा़एँ गरम हो जाती है ।39 अन्य छोटे जानवर चट्टानों के नीचे या अंदर लॉग में शरण लेते हैं ।40 छोटे और धीमी गति से चलने वाले जानवरों के बचने की संभावना कम होती है, और जो जीवित रहते हैं उन्हें शिकार होने का डर है और बदलते परिदृश्य के कारण भी समस्या हो सकती है ।41

भागने के राह में जानवर धुएँ के अंतःश्वसन से ,जलने के वजह से , थकान के कारण ,गुमराह होने के कारण या राह में शिकार होने के डर से मारे जाते है ।42 माँ और बच्चे पलायन नहीं कर पाते , और प्रादेशिक जानवर उस जगह को छोड़ने के लिए अनिच्छुक होते हैं और जब तक देरी ना हो तब तक वहीं रहते हैं । जंगलों में रहने वाले प्राणियों को जंगल की आग के लघु और दीर्घकालिक प्रभाव से जूझना पड़ता है । सबसे खतरनाक अल्पकालिक प्रभावों में से एक है, झटका, जो किसी जानवर की खाने, शरण लेने और शिकारियों या अन्य आक्रामकता से खुद को बचाने की क्षमता को बाधित कर सकता है ।

धुएँ से चोट आमतौर पर अल्पकालिक होती है और अक्सर कुछ दिनों के भीतर स्वाभाविक रूप से ठीक हो जाती है । लेकिन अगर यह काफी़ गंभीर है या काफी दिनों तक है तो ज्या़दा हानी हो सकती है जिसके अंतर्गत फेफड़ों की क्षति, दृष्टि हानि, या अंधापन हो सकता है । पक्षियों को श्वशन में ज्या़दा दिक्कत होती है क्योंकि वह अपने आकार के हिसाब से ज्या़दा श्वास लेते हैं ।43 जले हुए चमडे़ में काफी दर्द होता है, चलने पर रोक लग जाता है और वह पूर्णतया ठीक भी नहीं होता है । झुलसे हुए पंख और अन्य उपांग भी जानवरों के घूमने और संचालन करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं ।

ज़ख्मी और डरे हुए जानवरों को शिकार होने का ज्या़दा खतरा होता है । जो जानवर छाल और पत्तियों से खुद को छलावरण करते हैं, वे अधिक उजागर हो सकते हैं क्योंकि उनमें या उसके बीच में छिपने के लिए कम पेड़ होते हैं ।44

जले हुए क्षेत्र कम पानी सोखते हैं , इसलिए वहाँ बाढ़ और कीचड़धसन होने की संभावना ज्या़दा है ।45 दावानल के बाद बारिश राख को दूर तक बहा देता है , जिससे दूर रहने वाले प्राणियों का क्षेत्र ज़हरीला हो जाता है और उनके खाद्य श्रोत को भी विषैला कर देते है । जब दावानल पानी के किसी श्रोत के सामने होता है तब राख पानी के साथ मिलती है जिससे आक्सीजन की मात्रा घट जाती है और मछलियों के गिल्स और फेफ़डो़ में जा कता है ।

मनुष्यों के लिए, सार्वजनिक और निजी संसाधनों के जोखिमों को कम करने और इमारतों, आग, बाढ़, भूस्खलन, भोजन और पानी की कमी से नुकसान को कम करने के लिए खर्च किया जाता है । दुनियाभर में प्राकृतिक आपदा से मनुष्यों की अधिकतर मृत्यु इमारतों के गिरने से होती है ।46 गैर-अमानवीय जानवर अपने घरों और अपने आवास के कुछ हिस्सों को भी खो देते हैं जिसे उन्हें जीवित रखने की आवश्यकता होती है, लेकिन उनके पास आधुनिक तकनीक या आपदा नियोजन एजेंसियों की पहुंच नहीं है । कोई जानवर किसी प्राकृतिक आपदा या उसके परिणामों का सामना कर सकता है या नहीं इसके कारकों के संयोजन के साथ बहुत कुछ है जो ज्यादातर उनके नियंत्रण से परे हैं ।


आगे पढिए

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10 Morton, J. (2016) “Kaikoura quake: How has wildlife fared?”, NZ Herald, 21 Nov [अभिगमन तिथि 1 अक्टूबर 2019].

11 Roy, E. A. (2016) “New Zealand earthquake: fears for wildlife along devastated coastline”, The Guardian, Wed 16 Nov [अभिगमन तिथि 1 अक्टूबर 2019].

12 Goldman, J. (2011) “Impact of the Japan earthquake and tsunami on animals and the environment”, Scientific American, March 22 [अभिगमन तिथि 13 सितंबर 2019].

13 Global Volcanism Program (2013) “How many active volcanoes are there?”, Smithsonian Institution [अभिगमन तिथि 19 सितंबर 2019].

14 Williams, J. C.; Drummond, B. A.; Buxton, R. T. (2010) “Initial effects of the August 2008 volcanic eruption on breeding birds and marine mammals at Kasatochi Island, Alaska”, Arctic, Antarctic, and Alpine Research, 42, pp. 306-314 [अभिगमन तिथि 29 अगस्त 2019].

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21 Cappucci, M. (2019) “Montana hailstorm slaughters 11,000 birds”, The Washington Post, 21 August [अभिगमन तिथि 13 सितंबर 2019].

22 Yeager, A. (2017) “How animals and plants weather hurricanes”, TheScientist.com, Oct 6 [अभिगमन तिथि 21 अगस्त 2019].

23 Geigel, L. (2017) “During a hurricane, what happens underwater?”, op. cit.

24 National Oceanic and Atmospheric Observation (2018) “How do hurricanes affect sea life?”, National Ocean Service, 06/25/18 [अभिगमन तिथि 23 सितंबर 2019].

25 Geigel, L. (2017) “During a hurricane, what happens underwater?”, op. cit.

26 Cañedo-Argüelles, M.; Kefford, B.; Schäfer, R. (2018) “Salt in freshwaters: Causes, effects and prospects – introduction to the theme”, Philosophical Transactions of the Royal Society B: Biological Sciences, 374 (1764) [अभिगमन तिथि 7 अक्टूबर 2019].

27 National Wildlife Federation (2011) “Seven things to know about how hurricanes affect wildlife”, nwf.org, 27 August [अभिगमन तिथि 23 अगस्त 2019].

28 Ibid.

29 The Telegraph (2011) “Strange rain: Animals that have fallen from sky”, The Telegraph, 15 December [अभिगमन तिथि 22 अगस्त 2019].

30 Indiana Wildlife Disease News (2009) “Starvation and malnutrition in wildlife”, 4 (1), pp. 1-3 [अभिगमन तिथि 22 अगस्त 2019].

31 Horton, H. (2017) “What happens to wild animals in a hurricane – and which species do surprisingly well?”, The Telegraph, 09 September [अभिगमन तिथि 22 अगस्त 2019].

32 Shafeeq, M. (2018) “Kerala floods leave trail of destruction in forests; elephants, tigers among several animals killed”, Firstpost, 30 August [अभिगमन तिथि 21 अगस्त 2019].

33 Dilonardo, M. J. (2018) “What happens to animals during a hurricane?”, MNN.com, 12 September [अभिगमन तिथि 21 अगस्त 2019].

34 Phys.org (2019) “More than 2 million animals perish in Bolivia wildfires”, phys.org, 26 September [अभिगमन तिथि 5 अक्टूबर 2019].

35 Oskin, B. (2013) “Fighting fires: You’re doing it wrong”, LiveScience, 14 January [अभिगमन तिथि 19 सितंबर 2019].

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37 Campbell, M. (2016) “What will the Fort McMurray fires mean for wildlife?”, Maclean’s, May 9 [अभिगमन तिथि 28 अक्टूबर 2019].

38 Zielinski, S. (2014) “What do wild animals do in a wildfire?”, National Geographic, July 22 [अभिगमन तिथि 13 सितंबर 2019].

39 Campbell, M. (2016) “What will the Fort McMurray fires mean for wildlife?”, op. cit.

40 Zielinski, S. (2014) “What do wild animals do in a wildfire?”, op. cit.

41 Esque, T. C.; Schwalbe, C. R.; Defalco, L. A.; Duncan, R. B. & Hughes, T. J. (2003) “Effects of desert wildfires on desert tortoise (Gopherus agassizii) and other small vertebrates,” op. cit.

42 Daly, N. (2019) “What the Amazon fires mean for wild animals”, National Geographic, August 23 [अभिगमन तिथि 13 सितंबर 2019]. Zielinski, S. (2014) “What do wild animals do in a wildfire?”, op. cit.

43 Cope, R. B. (2019) “Overview of smoke inhalation”, Merck Manual: Veterinary Manual [अभिगमन तिथि 23 सितंबर 2019].

44 Daly, N. (2019) “What the Amazon fires mean for wild animals”, op. cit.

45 Tremblay, S. (2019) “Mudslides, flooding and avalanche warnings – why California had such a wet weather week”, Sciencing, January 23 [अभिगमन तिथि 23 अगस्त 2019].

46 Ritchie, H. & Roser, M. (2019) “Natural disasters”, op. cit.